अलग रहि करि की सकब हम
बिछोड़क ई नोर नैनक
बहल कोना पी सकब हम
जरल मोनक वेदना ये
कते सहि सजनी सकब हम
मिलत जे प्रेमक सुईया
हिया फाटल सी सकब हम
विरहमे नित आब कुन्दन
बिता नै जिनगी सकब हम
बहरे-मजरिअ (1222-2122)
© कुन्दन कुमार कर्ण
गालपर तिलबा कते सान मारैए
निकलु नहि बाहर सभक जान मारैए
देखलौं जतए अहींपर नजरि लोकक
सभ तरे तर आँइखक बाण मारैए
तीर्थमे पंडित तँ मुल्ला मदीनामे
सभ अहींकेँ राति दिन तान मारैए
आइ सुन्नरि मोहमे बूढ़ नव डूबल
देखिते मुँह फारि मुस्कान मारैए
काज कोनो नहि बनेए जँ जीवनमे
‘मनु’ अहीं लग फूल आ पान मारैए
(बहरे कलीब, मात्राक्रम - 2122-2122-1222, दोसर शेरक दोसर पाँतिमे “आँखि” केर उच्चारण “आँइख” जकाँ लेवक छूट लेल गेल अछि।)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
अहाँ बिनु नै सुतै नै जागैत छी हम
कही की राति कोना काटैत छी हम
सिनेहक मोल नै बुझलहुँ संग रहितो
परोक्षमे कते छुपि कानैत छी हम
करेजा केर भीतर छबि दाबि रखने
अहीँकेँ प्राण अप्पन मानैत छी हम
बुझू नै हम खिलाड़ी एतेक कचिया
अहाँ जीती सखी तेँ हारैत छी हम
अहाँ जतए कतौ जगमे खुश रही ‘मनु’
इहे वरदान सदिखन माँगैत छी हम
(बहरे करीब, मात्राक्रम 1222-1222-2122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’