रविवार, 29 मार्च 2015

गजल

अहाँ बिनु नै जी सकब हम
अलग रहि करि की सकब हम

बिछोड़क ई नोर नैनक
बहल कोना पी सकब हम

जरल मोनक वेदना ये
कते सहि सजनी सकब हम

मिलत जे प्रेमक सुईया
हिया फाटल सी सकब हम

विरहमे नित आब कुन्दन
बिता नै जिनगी सकब हम

बहरे-मजरिअ (1222-2122)

© कुन्दन कुमार कर्ण

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

गुरुवार, 5 मार्च 2015

गजल

होलीक शुभकामना


नेह सिनेह बरसै अनचिन्हारक आँगनमे
देह हमर से भिजलै अनचिन्हारक आँगनमे

सैंत कऽ गेल रहियै आँचर तैयो गे बहिना
बेर कुबेर खसलै अनचिन्हारक आँगनमे

आब कनी मनी चिन्हारे सन हुनका लेल
सीथ सिनूर पड़लै अनचिन्हारक आँगनमे

ठोरसँ ठोर धरि नहुँ नहुँ धीरे आस्ते आस्ते
मौध मिठाइ परसै अनचिन्हारक आँगनमे

छूबि कऽ देह केहन केलक ई अनचिन्हरबा
मोन करेज भरछै अनचिन्हारक आँगनमे


सभ पाँतिमे  21121+222+222+222 मात्राक्रम अछि
मतलाक दोसर पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।
तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृतक अनुसार दीर्घ मानल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

सम्मान

मैथिली सिने संसार पत्रिकाक तेसर वार्षिकोत्सव आ अन्तराष्ट्रिय मातृ भाषा दिवसक अवसर पर मधेस मिडिया हाउस, काठमाण्डूमे आयोजित समारोहमे मैथिली गजलमे हमर योगदानक कदरस्वरूप नेपाली फिल्मक बरिष्ट कलाकार नीर शाह द्वारा मैथिली सिने संसार दिससँ प्रदान कयल गेल सम्मान ग्रहण करैत






शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

गजल

चाहलौँ जकरा हम जान परानसँ
छोड़ि हमरा से चलि गेल गुमानसँ

जे कहै जिनगी भरि संग रहब हम
से करेजा देलक चीर असानसँ

एखनो टटका अछि दर्द हियामे
व्यक्त कोना शब्दक करब बखानसँ

हम त पुजलौँ प्रेमक बनि कऽ पुजगरी
सत धरम पूरा निस्वार्थ इमानसँ

जीविते बनि गेलौँ लास जकाँ हम
हम त गेलौँ कुन्दन आब जहानसँ

मात्राक्रम : 2122-2221-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

अन्तरवार्ता

प्रस्तुत अछि लोकप्रिय पत्रिका  मैथिली सिने संसारक अगहन–पुष अंकमे प्रकाशित हमर पूरा अन्तरवार्ता


सप्तरी जिल्लाक एक साधारण परिवारमे जन्मल गजलकार कून्दन कुमार कर्ण कम समयमे बेसी चर्चित भेनिहार युवा गजलकार छी । कनिये टासँ मैथिली साहित्यमे कमल चला रहल कुन्दन अत्यन्त प्रतिभाशाली व्यक्ति छथि । श्री जनता माध्यमिक विद्यालय, खुरहुरीयासँ विद्यालय शिक्षा आर्जन कऽ श्री महेन्दविन्देश्वरी बहुमुखी क्याम्पस, राजविराजसँ ब्यवस्थापनमे स्नातक केनिहार ई नेपाल सरकारक निजामती सेवामे सेहो कार्यरत छथि ।

विद्यालय जीवन कालसँ गजल रचना सुरु कऽ एखन धरि दर्जनौ गजल रचना कऽ चूकल अछि । हुनकर गजल आ शाइरीसँ मिथिलाक हजारौ युवा प्रभावित छथि । पछिला किछु बरिससँ सामाजिक सञ्जालमे बेसी सकृयताक संग अपन रचना सभ सार्वजनिक करैत आबि रहल हुनकर नेपाल आ भारत दुन्नू देशेमे प्रशंसक सभ छथि । मुदा हनुका एतऽ धरि आबैमे की ? केहन ? कतेक ? संघर्ष करऽ पडलै एहि सम्बन्धमे सुनी “मैथिली सिने संसार”क प्रतिनिधि कमल मण्डल संग भेल हुनकर गप्प सप्प ।

▶ अहाँ गजल रचनाक क्षेत्रमे कोना प्रवेश केलहुँ ?
– कनिये टासँ साहित्य, गीत आ संगीतमे हमर रुची रहि आयल अछि । स्कूल पढैत काल हम अतिरिक्त कृयाकलामे बेसी सहभागी हएत रहिये । विद्यालय जीवनसँ हमर रचना सभ विभिन्न रुपे पत्र–पत्रिकामे प्रकाशित हएत रहै । दर्जनौ पत्र–पत्रिकामे हमर रचना सभ प्रकाशित भऽ चूकल अछि । गजल आ शेर–ओ–शाइरी हम कनिये टासँ पसन्द करै छी । स्कूल आ कलेजक समयमे मैथिलीमे गजल रचना कऽ हम संगी सभकेँ सुनाबैत रही । सभ हमर प्रशंसा करेैत रहै । हमरा प्रोत्साहन करैत रहै । मुदा जहियासँ हम फेसबुक आ ट्वीटर लगायत सामाजिक सञ्जाल मार्फत अपन रचना सार्वजनिक केनाइ सुरु केलहुँ तहियासँ हमर साहित्यिक बाटमे नवका मोड आबि गेल । हम अपन रचना सभ बेसीसँ बेसी लोक धरि पहुँचाबमे सफल भेलहुँ । ढेर रास साहित्यकार सभसँ जुटबाक अवसर सेहो प्राप्त केलहुँ । एहि क्रममे फेसबुक पर हमर भेंट प्रसिद्ध मैथिली गजलकार आशीष अनचिन्हार जीसँ भेलै । ओ हमरा हुनकेँ द्वारा सञ्चालित हुनक ब्लग http://anchinharakharkolkata.blogspot.com सँ जोडलनि । जे कि पूर्ण रुपेन मैथिली गजलसँ सम्बन्धित लेख, आलेखसँ भरल छै । तकर बाद हम गजलक विषयममे गहन अध्ययन केनाइ सुरु कऽ देलहुँ आ पहिल बेर निअमपूर्वक अरबी बहरमे गजल रचना करबामे सफल भेलहुँ । फलस्वरुप आशीष जी द्वारा जानकारी भेटल जे हम मैथिलीमे अरबी बहरमे गजल कहनिहार नेपालक पहिल गजलकार छी । जैसँ हमरा एहि क्षेत्रमे समर्पित भऽ लगबाक लेल आर प्रेरणा प्राप्त भेल ।

▶ “अरबी बहर” की छी ?
– गजल मुख्तः अरबी शब्द छी आ एकर जननी सेहो अरबी साहित्य छी । जेना संस्कृत काव्ज्य परम्परामे “छन्द” हए छै तहिना उर्दू आ फारसी गजल परम्परामे “बहर” हए छै । जेना छन्द कविताक लय निर्धारण करै छै तहिना बहर गजलक लय निर्धारण करै छै । सामान्य भाषामे हम सभ बहरकेँ छन्द बुझि सकै छी मुदा बहर निर्माणक अपने पृथक निअम सभ छै । गजल प्राय कोनो नै कोनो बहरमे कहल जाइ छै । बिना बहरकेँ गजल भै भऽ सकैछ । गजल गीत आ कवितासँ एक अलगे विधा रहलाक कारण अरबी बहरमे गजल रचना करऽ चाहै वला सभकेँ समय खरचा कऽ अध्ययन केनाइ जरुरी छै ।

▶ गजल रचनाक क्षेत्रमा प्रवेश करऽ लेल प्रेरणा किनकासँ प्राप्त भेल ?
– हम महाकवि विद्यापति रचित गीत सभ सुनबालेल बहुत पसन्द करै छी । हुनकासँ प्रभावित सेहो छी । मुदा खास कऽ गजल क्षेत्रमे लगबाक कारण केओ एक व्यक्ति प्रेरक नै छथि । हमर अन्तर आत्मासँ जागल रुची आ मैथिली भाषा एवं संस्कृति प्रतिक प्रेम नै एहि क्षेत्रमे लगबाक प्रमुख कारण छी । एखन हम बहुत लोकसँ ढेर रास सहयोग, शुभकामना आ सिनेह पाबि रहल छी जैसँ हमर मनोबल वृद्धि भऽ रहल छै ।

▶ की अहाँ मैथिलीकेँ अलाबा आन भाषा दिस सेहो कलम चला रहल छी ?
– हम अंग्रेजी, हिन्दी आ नेपालीमे सेहो गजल सभ रचना केने छी ।

▶ वर्तमान समयमे विभिन्न विधाक मैथिली पोथी सभ निरन्तर प्रकाशित भऽ रहल छै मुदा एकर उचित बजारीकरण भेल अवस्था नै छै । अर्थात् मैथिली साहित्य व्यावसायीकरण नै भऽ पाबि रहल छै । की एहन अवस्थामे आब आबै पीढी मैथिली साहित्मे अपन योगदान दऽ सकत ?
– धन्यवाद । बहुत नीक सन्दर्भ उठेलहुँ अहाँ । सभसँ पहिने त छिरीयाल मैथिली गजलकार, साहित्यकार आ कलाकार सभकेँ एक ठाम संगठित भेनाइ जरुरी छै । मिथिलामे एखनो बहुत रास लोक सभ नीक जकाँ मैथिली पढ आ लीख लेल नै जानै छै । एकर मुख्य कारण छी विद्यालय शिक्षा मैथिलीमे प्राप्त नै भेनाइ । मैथिली भाषा आ साहित्यमे गति प्रदान करबा लेल मिथिलामे अनिवार्य रुपमे विद्यालय शिक्षा मैथिलीमे प्रदान केनाइ जरुरी छै । नेपालमे एखन संविधान बनबाकेँ क्रममे अछि । तेँ आब बनै वला संविधानमे विद्यालय शिक्षा मातृभाषामे करबाक प्रावधान लेल हम सभकेँ अपन–अपन क्षेत्रसँ अवाज उठाब पडतै । खुशीक बात त ई छी जे वर्तमान समयमे मिथिलाक बहुत रास युवा युवती सभ मैथिली साहित्य, गीत, संगीत आ कलाक क्षेत्रमे सकृय रुपसँ लागि रहल अछि ।

▶ हम अहाँ द्वारा हमल गजल सभ सुनलहुँ । किछु प्रमे आ वियोगक गजल सभ बहुत मार्मिक अछि । की एहन गजल सभमे रहल ब्यथा सभ अहाँकेँ वास्तविक जिनगीसँ सम्बन्धित त नै अछि ।
– हम हजल, वाल गजल आ भक्ति गजल सेहो रचना केने छी । तहिना राजनीति, दर्शन तथा विभिन्न सामाजिक जीवनसँ जूडल विषय पर सेहो रचना केने छी । समय सन्दर्भ देखिक श्रोता सभकेँ केहन रचना पसन्द आबि सकै छै तै हिसाबे रचऽके प्रयास करै छी । जैमे हमर कल्पना शक्तिक महत्वपस्र्ण भूमिका खेलै छै । अतः हमर कहल गजल सभकेँ हमर वास्तविक जिनगीसँ कोनो सम्बन्ध नै छै ।

▶ एखन बजारमे पाप, ¥याप आ आइटम गीत सभ धूम मचा रहल छै । लोक सभ एकरे पसन्द सेहो कऽ रहल छै । एहन अवस्थामामे गजलक औचित्य की ?
– संसार कतबो बदलतै मुदा सूर्य, पृथ्वी आ चान कहियो नै बदलि सकै छै । तै सूर्यक ठाम पृथ्वी लऽ सकै छै नै त पृथ्वीक ठाम चान । बजारमे बहुत चीज सभ आबै छै आ जाइ छै मुदा किछु चीज लोकक हिया आ दिमागमे सदति लेल बसि जाइ छैक । गजल लोकक भावना आ आत्मासँ जूटल रहै छै । संसार रहला धरि एकर औचित्य कहियो समाप्त नै भऽ सकै छै । हमर कहल गजल सभ एखनो हजारौ लोक सभ पसन्त कऽ रहल छै ।

▶ भविष्यक योजना की अछि ?
– गजल रचनाक निरन्तरता दैत विभिन्न विषयवस्तु पर रचना कऽ मैथिली पाठक सभको मनोरञ्जन प्रदान केनाइ आ जिनगी भरि मैथिली आ मिथिलाक सेवा केनाइ ।

▶ वर्तमान युवा पीढी अर्थात नव प्रतिभाक की कहऽ चाहबै ?
– कहल जाइ छै लोक जतऽ जन्मे छै तै ठामक माटिक ऋण ओकरा पर रहै छै । तै अपन भाषा, संस्कृति, कला आ साहित्सँ प्रेम करु । प्रबर्धन करु । युवा अवस्था एहन अवस्था छी जे लोकक भविष्य निर्धारणक आधार तय करै छै । एहि अवस्थाक सदूपयोग करु । मिथिलाक युवा युवती सभ मेहनी हए छै । प्रतिभा सम्पन्न हए छै । ई बात सारा संसार जानै छै । तेँ मैथिली आ मिथिलाक लेल महान् कार्य करि अपन प्रतिभाक देखाउ ।

▶ अहाँ एक युवा गजलकार छी । एहि उमेरमे बहुत प्रशंसक कमा चूकल छी । मुदा एखन धरि सिङ्गल छी । अहाँकेँ डबल भेल कहिया देख सकै छी ?
– हा हा हा हा ....... ई प्रशन त हमरा संसारक सभसँ खतरनाक प्रशन बुझाइत अछि । एखन सोचने नै छी । सही समय एलापर डबल हेबै ।

▶ तपाई अपन प्रशंक सभकेँ “मैथिली सिने संसार” मार्फत की कहऽ चाहबै ?
– सर्वप्रथम त हुनका सभकेँ हम हार्दिक धन्यवाद देब चाहब । हुनका सभक सिनेहक कारणे हम गजल रचनाक क्षेत्रमे निरन्तर आगू बढि रहल छी । खास कऽ मैथिल युवा युवती सभकेँ “मैथिली सिने संसारक” माध्यमसँ कहब चाहब जे एखन बहुत संख्यामे अहाँ सभ मैथिली गजल गजल, शेर–ओ–शायरी आ साहित्यिक क्षेत्रमे कलम चला रहल छी । ई खुशीक बात छी । मुदा अहाँ सभ कोनो क्षेत्रमे लागैसँ पहिने तैसँ सम्बन्धित विस्तृत ज्ञान हाँसिल केलाक बाद लागी । एहिसँ अहाँके यात्रा सहज भेलाक संगे अपन लक्ष्य धरि असानसँ पहुँच सकै छी । जेना साहित्य लोककेँ सभ्य बनाबै छै तहिना गजल लोककेँ गुनवाण बनाबै छै । जँ अहाँ सभमेसँ केओ मैथिली गजल क्षेत्रमे सकृयताक संग आबऽ चाहै छी त हम अपन दिससँ जे कऽ सकब से सहयोग करऽ लेल सदिखन तयार छी ।

▶ अपन प्रशंकहरु सभक लेल कोनो सम्पर्क नं. या
– अवश्य । वहाँहरुले मलाई मेरो यो ई–मेल आईडी मार्फत सम्पर्क गर्न सक्नुहुन्छ E-mail : kundankumarkarna145@gmail.com

धन्यवाद !

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

गजल



तोरा लग तोरा सन
मोरा लग मोरा सन

मोन कुमोनसँ घुमलहुँ
हम फाटल झोरा सन

हुनकर मुस्की लागै
बस अनमन कोरा सन

ओकर नोर बुझाएल
अगबे अंगोरा सन

ओ गुड्डी सन बनतै
आ हमहूँ डोरा सन


सभ पाँतिमे 222+222 मात्राक्रम अछि।
दू टा अलग-अलग लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।
चारिम सेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि।
मतला मैथिलीक पारंपरिक कहबी अछि।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

गजल


हारल थाकल ओकरे सपना
जागल सूतल ओकरे सपना

जिम्हर देखी तिम्हरे देखी
छीटल छाटल ओकरे सपना

खटगर मिठगर लागि रहलै खूब
काँचो पाकल ओकरे सपना

जुट्टी खोपा सन बनल आँखि
बान्हल गूहल ओकरे सपना

सिंदुर टिकुली मेंहदी अलता
काजर लागल ओकरे सपना

सभ पाँतिमे 22222+1222 मात्राक्रम अछि।
तेसर शेरक अंतिम लघु अतिरिक्त जकाँ छूट लेल गेल अछि।
चारिम शेरक अंतिल लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

बाल गजल

बाल गजल


छै ईसू बीसू जीसू मीसू
हम्मर बौआकेँ बड़का बूझू

जीबू जाबू आ ढनढन पादू
खिलखिल झिलमिल चुनमुन सन लागू

बौआकेँ नानी सुंदर सुंदर
हुनकर गालेपर हरदी पीसू

उपटन पिसतै बौआकेँ मौसी
हुनकर नाम कनी जल्दी बाजू

बाबाकेँ धोती कुरता गमछा
नानाकेँ ढेका जल्दी घीचू

सभ पाँतिमे 222+222+222 मात्राक्रम अछि।
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।
संबंध बदलिते संबंधवाची शब्दकेँ बदलल जा सकैए। उदाहरण लेल तेसर शेरमे नानी बदला दादी, बाबी, पीसी, मौसी काकी सेहो आबि सकैए। तेनाहिते चारिम आ पाँचम शेरमे सेहो बदलल जा सकैए।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

गजल

चाही आश नै कनिको चमत्कारकेँ
मेहनतसँ बसायब अपन संसारकेँ

आजुक नवयुवक हम डरब धमकीसँ नै
छोरब नै अपन कनिको तँ अधिकारकेँ

बुझि अप्पन कियो छनमे करेजा ल' लिअ
टेढ़ीमे जँ छी नै सहब सरकारकेँ

धरतीपर जते बासन पकल काँच छै
एक्के हाथ सगरो गढ़ल कुम्हारकेँ

सहलों चोट सय भरि जन्म सोनारकेँ
'मनु'  के सहत एक्को चोट लोहारकेँ

(बहरे कबीर, मात्रा क्रम; २२२१-२२२१-२२१२)
जगदानन्द झा 'मनु'

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

गजल:


गजल:
गप्प पिबै छी मुखपोथी पर​
गप्प छटै छी मुखपोथी पर​

संग रहै से बिछुरल मीता ​
मीत तकै छी मुखपोथी पर​

गाम​-घरक हम बिसरल​ बोली
बोल सिखै छी मुखपोथी पर​

डाक घरक हम बाटो बिसरल​
पत्र लिखै छी मुखपोथी पर

पंच रहल नञ पनचाइत घर​
पंच बनै छी मौखपोथी पर​

भेंट हमर नञ किनको संगे
कुशल पुछै छी मुखपोथी पर​

कहब गजल से मंचो उजरल​
गजल कहै छी मुखपोथी पर​
सभ पाँतिमे मात्राक्रम –21-122-2222        

© राम कुमार मिश्र

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

गजल

देश दशा नीके हेतै
देह दशा ठीके हेतै

जनताके खूनक कीमत
बस पानक पीके हेतै

जी कहने हाँ जी कहने
लोको सभ जीके हेतै

ऐठाँ मरबा काल सखी
टोपी ने टीके हेतै

अनचिन्हारक डेग कनी
बढ़ि गेने लीके हेतै

सभ पाँतिमे 22+22+22+2 मात्राक्रम अछि।
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

शनिवार, 31 जनवरी 2015

गजल

आब सहब नै दाबन ककरो
जोर जुलुम आ चापन ककरो

गेल जमाना क्रूरक सभकेँ
घर त हमर छल आसन ककरो

भेल बहुत जे भेलै काइल
लोक सुनै बस भाषण ककरो

पूत मधेसक छी स्वभिमानी
सहि कऽ रहब नै शोषण ककरो

दर्द विभेदक भारी कुन्दन
माथ हमर अछि चानन ककरो

मात्राक्रम : 2112-222-22

© कुन्दन कुमार कर्ण

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

गजल

नानी गेलै देखै लेए बारीमे आलू
लाइ उठा क' ओकर भगलै लालू

आँखि मुनि चारमे बेंग नुकाबै छै
कालू कौआ बनल कतेक छै चालू

केहेन होइ छै ई भोटक नाटक
बनि गेलै राज मंत्री चोरबा कालू

झट पट नेना सभ दौड़ क' आबै
देखही देखही कते नचै छै भालू

द' दे नानी आब 'मनु'केँ दू रुपैया
नै सोचै मनमे कोना एकरा टालू

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण १३)
जगदानन्द झा 'मनु'

सोमवार, 26 जनवरी 2015

गजल

बाल गजल


चिन्नी खेलहुँ चोरा चोरा
आरो धेलहुँ चोरा चोरा

भैया छै बड़का तँइ हमहूँ
बड़का भेलहुँ चोरा चोरा

हमरो जे कनियाँ रहितै से
खुब्बे गेलहुँ चोरा चोरा

गेल छलहुँ गाछी पिकनिक लेल
आँगन एलहुँ चोरा चोरा

जे भेटल जत्ते भेटल से
सभटा लेलहुँ चोरा चोरा

सभ पाँतिमे 22+22+22+22 मात्राक्रम अछि
चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अलग-अलग लघुकेँ मिला कऽ दीर्घ मानल गेल अछि। एही पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

शनिवार, 24 जनवरी 2015

भक्ति गजल (सरस्वती पूजा)

हे शारदे दिअ एहन वरदान
हो जैसँ जिनगी हमरो कल्याण

पूजब सदति हे माए बनि पूत
अपना शरणमे दिअ हमरा स्थान

निष्काम हो मोनक सभ टा आश
सुख शान्ति आ जगमे दिअ सम्मान

जिनगी समाजक लागै शोकाज
हमरा बना दिअ तेहन गुणवान

लिअ प्रार्थना कुन्दनकेँ स्वीकारि
बल वुद्धि विद्या आ दिअ ने ज्ञान

मात्राक्रम : 2212-222-221

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

भक्ति गजल




शारदे शारदे शारदे
नीक बनबाक आधार दे

जय विजय केर संगे कनी
बेबहारक सुखद हार दे

नै महल नै अटारी मुदा
एकटा नीक सन चार दे

दूर बैसल हमर लोक वेद
नीक छै से समाचार दे

लोक छै आब अनचिन्हरबा
किछु दे की नै दे चिन्हार दे



सभ पाँतिमे 212+212+212  मात्राक्रम अछि।

मक्ताक अंतिम पाँतिमे दू ठाम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि

चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि।

बुधवार, 21 जनवरी 2015

गजल

छाती लगा सुतलहुँ सुतली रातिमे
घामे नहा उठलहुँ सुतली रातिमे

संसार कहलक हमरा दुख नै मुदा
बेसी अहीँ कहलहुँ सुतली रातिमे

बाते छलै एहन जे चुपचाप हम
मूड़ी झुका कनलहुँ सुतली रातिमे

सभ थाकि गेलै तकरा बादे सखी
हमहूँ कनी नचलहुँ सुतली रातिमे

पौआ पसेरी संगे एलै तखन
मुस्की अपन बटलहुँ सुतली रातिमे

सभ पाँतिमे मात्राक्रम 2212+222+2212 अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि। 

शनिवार, 17 जनवरी 2015

रुबाइ

करीब तीन सालक बाद ई काँच रुबाइ लिखाएल


ओना तँ रातुक सिंगार बड्ड नीक
अजोह ठोरक पिआर बड्ड नीक
नै नै नै नै नै कहलक बहुत बेर
मुदा मोनमे अनचिन्हार बड्ड नीक

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

गजल

तोरा आदर कि केलियौ तूँ त हमरा सस्ता बुझि लेलही
बस अपनाकेँ गुलाब हमरा सुखल सन पत्ता बुझि लेलही

मोनक कुर्सी कि देलियौ बैस तोरा एके छन लेल हम
हमरे जिनगीक तूँ अपन राजनीतिक सत्ता बुझि लेलही

गजलक गंभीरता मधुरता असलमे तोरा की मालूम
हमरा शाइर त बात दूरक अपन तूँ भगता बुझि लेलही

शारीरिक हाउ भाउ तोहर बुझाइत रहलहुँ एना सदति
जेना नेहक रहै पहिल बेर हमरे खगता बुझि लेलही

नै छै जै मोनमे रहल चाह नेहक कोनो कुन्दन हमर
तै मोनसँ हम किएक जोडब अधूरा नाता बुझि लेलही

मात्राक्रम : 22221-212-2122-222-212

© कुन्दन कुमार कर्ण

शनिवार, 10 जनवरी 2015

गजल

आइ फेरो एलै अनचिन्हार हमर सारापर
आइ फेरो जरतै अनचिन्हार हमर सारापर

ताग सन झटपट टुटि गेलहुँ लोभमे पड़ि से ऐठाँ
आइ फेरो कहतै अनचिन्हार हमर सारापर

कमला कोशी गंगा जमुना बागमती छै तैयो
आइ फेरो डुबतै अनचिन्हार हमर सारापर

असगरें बड़ जड़लै जरिते रहलै मुदा हमरा संग
आइ फेरो जरतै अनचिन्हार हमर सारापर

हाथपर लिखने छल कहियो नाम सिनेहक नेहक
आइ फेरो लिखतै अनचिन्हार हमर सारापर



सभ पाँतिमे 2122+22+2221+12222 मात्राक्रम अछि।
दोसर, तेसर आ चारिम शेरमे लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। संगे-संग चारिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा अतिरिक्त लघु अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

गजल

बाल गजल

मोजा दे जुत्ता दे सीड़क दे सुइटर दे
बड़ ठंडा लागै बस चद्दरि दे मफलर दे

सुनि ले हमहूँ करबै खूब तमाशा सौंसे
तंतर दे अंतर दे जंतर दे मंतर दे

बड़ भूकै छै करिया कुक्कुर जोरे जोर
टुटतै एक्कर हड्डी बस लाठी नमहर दे

कफ जमि गेलै छातीमे खोंखीपर खोंखी
तँइ तरकारी बेसी कड़ुगर दे झँसगर दे

चिन्नी दे गूड़ो दे कुच्चा संगे दूधो
खट्टा खेबौ कम हमरा बेसी मिठगर दे

सभ पाँतिमे बारहटा दीर्घ अछि।
दू टा अलग-अलग लघुकँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।
तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृतक हिसाबें दीर्घ मानल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

शनिवार, 3 जनवरी 2015

गजल

साँचमे शायद ओ नै चाहैत रहै
मोन झुठ्ठे सदिखन पतिआबैत रहै

फुलि हमर आगू ओ सुन्नर फूल जकाँ
बाग पाछू अनकर गमकाबैत रहै

हम हियामे बैसेलहुँ बुझि नेह अपन
तेँ सदति हमरा ओ तड़पाबैत रहै

साँच नेहक दुनियामे अछि मोल कहाँ
लोक जैमे जिनगी बीताबैत रहै

जाइ छल मन्दिर नित कुन्दन संग मुदा
प्राथनामे दोसरकेँ माँगैत रहै

मात्राक्रम : 212-222-2221-12

© कुन्दन कुमार कर्ण

अपने एना अपने मूँह-33



दिसम्बर २०१४मे "अ.आ"पर कुल १५ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--

जगदानंद झा मनुजीक कुल ४टा पोस्टमे २टा गजल आ १-१टा बाल ओ भक्ति गजल अछि।
कुंदन कुमार कर्णजीक कुल ३टा पोस्टमे २टा गजल आ १टा बाल गजल अछि।
अमित मिश्रजीक २टा पोस्टमे १टा गजल अछि आ १टा पोस्टमे  शिव कुमारजी द्वारा लिखल आलोचना प्रस्तुत केने छथि।
रामकुमार मिश्रजीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक कुल ५टा पोस्टमे २टा गजल, २टा बाल गजल आ १टा पोस्टमे अपने एना अपने मूँह अछि।

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

गजल

(मिथिला आन्दोलन विशेष)


बहराउ यौ मैथिल घरसँ मोनमे ई ठानि कऽ
लेबे करब मिथिलाराज्य आब छाती तानि कऽ

हे वीर मैथिल देखाक वीरता अभिमानसँ
आजाद मिथिलाकेँ लेल सब लडू समधानि कऽ

हो गाम या शहर छी कतहुँ मुदा सब ठामसँ
आबू करू आन्दोलन रहब जँ मिथिला आनि कऽ

मेटा रहल अछि पहचान देखिते भूगोलसँ
अस्तित्व ई धरतीकेँ बचाउ माए जानि कऽ

इतिहास मिथिलाकेँ दैत अछि गवाही कुन्दन
ई भूमि छी विद्वानक सदति चलल सब मानि कऽ


मात्राक्रम : 2212-2221-2122-211

© कुन्दन कुमार कर्ण

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

गजल

गजल
हरियर कचोर​
पटुआक झोर

छुटलइ कतेक​
पेटक ​मड़ोर​

रोपल जजात​
भेटल चिचोर

मनसा बिदेश
पहिरब पटोर​

प्रेमक सनेश​
चकबा चकोर​

लागल बकोर
पाकल परोर​

फ़ेकू निहूँछि
तामस अघोर​

बातक​  नछोर
जिनगी कठोर​

‘राम’क भरोस​
भेटत इजोर

सभ पाँतिमे मात्राक्रम - 22121

©राम कुमार मिश्र

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

गजल

गालपर तिलबा कते सान मारैए

निकलु नहि बाहर सभक जान मारैए

 

देखलौं जतए अहींपर नजरि लोकक

सभ तरे तर  आँइखक बाण मारैए

 

तीर्थमे पंडित तँ मुल्ला मदीनामे

सभ अहींकेँ राति दिन तान मारैए

 

आइ सुन्नरि मोहमे बूढ़ नव डूबल

देखिते मुँह फारि मुस्कान मारैए

 

काज कोनो नहि बनेए जँ जीवनमे

‘मनु’ अहीं लग फूल आ पान मारैए

 

(बहरे कलीब, मात्राक्रम - 2122-2122-1222, दोसर शेरक दोसर पाँतिमे “आँखि” केर उच्चारण “आँइख” जकाँ लेवक छूट लेल गेल अछि।)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

गजल

बाल गजल


खेने रहियै आमक कुच्चा
चिनियो लागै खट्टे खट्टा

हमरा नामे कोड़ो बाती
हमरे नामे खुट्टा खुट्टा

हमरा सन के छै उकपाती
सभके मारी घुस्से घुस्सा

छै झिल्ली कचरी आलूचप
मुरही फाँकी फक्के फक्का

नै नीक लगैए मस्टरबा
नीक लगैए अट्टा पट्टा


सभ पाँतिमे 22+22+22+22 मात्राक्रम अछि।

अंतिम शेरक दूनू पाँतिमे अलग-अलग लगूकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

गजल

शिव केर महिमा के नै जनैत अछि
सबहक मनोरथ  पूरा करैत अछि

दिन राति भोला पीबैत भांग छथि
हुनकर चरणकेँ के नै गहैत अछि

पति ओ उमाकेँ सबहक पतित हरन
भोला हमर सबकेँ दुख हरैत अछि

बसहा सवारी बघछाल अंगपर
शमशानमे रहि दुनियाँ हँकैत अछि

नै मूँगबा खाजा चाहिएनि जल
‘मनु’ आक धथुरसँ हिनका पबैत अछि

(मात्रा क्रम : २२१२-२२२१-२१२)

© जगदानन्द झा 'मनु'

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

गजल

सपना हमर हम वीर बनी
करतब करी आ धीर बनी

जे देशकेँ अपमान करै
ओकर करेजक तीर बनी

सबहक सिनेहक मीत रही
ककरो मनक नै पीर बनी

आबी समाजक काज सदति
धरतीक नै हम भीर बनी

किछु काज ‘मनु’ एहन तँ करी
मरियो कऽ  आँखिक नीर बनी
(
मत्रा क्रम : २२१२-२२१-१२)
© जगदानन्द झा 'मनु'

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल: नव अंशु

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल : नव अंशु




भावक स्पष्ट प्रवाहक बहन्ने साहित्यमे पद्य विधा अतुकांत रूपेँ पसरि रहल अछि ।पद्य विधाक विकास हेतु एकर अनिवार्यता भने देखऽमे आबय मुदा वर्तमान पद्य चिरकालिक आ कतिपय लोकप्रिय रहत, ई भविष्यक गर्तमे, मुदा प्रश्न-चिन्ह धरि अवश्य अछि ।

एहि परिपेक्ष्यमे मैथिली साहित्यमे किछु काँच वयसक गीत-गजलकारक प्रवेश भेल छन्हि जे लय, राग, गतिक संग साहित्य आड़िमे बान्हल छथि, ओहिमे 21 वर्षक गजलकार अमित मिश्रक नाओं महत्वपूर्ण अछि । ओना तँ साहित्यक सब सरल विधा यथा- गीत, गजल, कथा, लघुकथा, नाटक, एकांकी, कविता, बाल-साहित्य आदिमे हिनक लेखनी गत किछु वर्खसँ प्रवाहमय अछि मुदा हिनक लोकप्रियताक पहिलुक प्रस्तुति गजल संकलन "नव अंशु"सँ भेल ।नव अंशु मने नव किरण, मने नव भोर, मने नीक दिनक पहिल आभास, मने नव ऊर्जाक संपूर्ण संसारमे पहिल संचरण ।एहि पोथीक नाओंक पाछु गजलकारक एहने सन भाव रहल हेतनि ।

अनचिन्हार आखरसँ प्रेरित भऽ कऽ लिखल गेल एहि गजल, हजल आ रुबाइ संकलनमे प्रेमी-प्रेयसीसँ आगाँ बढ़ि कऽ जीवन आयामक बहुत रास अवस्थाकेँ विविध रूपेँ प्रदर्शन कएल गेल जे निश्चय द्रव्यमूलकसँ बेसी विचारमूलक  अछि । गजल लेखनक मौलिक सीमा एकर व्याकरणक संग-संग सरल वार्णिक बहरसँ लऽ कऽ अरबी बहरमे लिखल गेल गजल मानक आ पूर्ण मानल जाए । सबटा गजलमे शेर, रदीफ, काफिया, मकता आ मतलाकेँ सरस बनयबासँ बेसी बीजगणितीय आ अंकगणितीय बनाओल गेल जे जनप्रियतासँ ऊपर उठि कऽ एहि विधाक मैथिलीमे विकासक लेल उचित आ अनुकरणीय प्रयोग मानल जाए ।

व्याकरण गजलक मौलिक मानकतासँ बान्हल अछि , कुश ठामक काससँ उखाड़ल अछि  मुदा शब्द-शब्दक प्रवाह तँ शायरक स्वत: स्फूर्त प्रतिभाक प्रदर्शन अछि -

" चान देखलौं तँ सितारा की देखब
अन्हारक रूपकेँ दोबारा की देखब "

पहिल गजल सरल वार्णिक बहरमे छन्हि, मुदा मकताक प्रयोग नहि, ओना मकता गजलक कोनो अनिवार्य अंश सेहो नहि अछि ।

कतहु-कतहु गजलकार अपन वयसे जकाँ काँच लगैत छथि तँ कतहु-कतहुँ परिपक्व प्रेमी सन झंकारयुक्त उदवोधन हिनक नैसर्गित नहि तँ आशुत्व भरल दैहिक गुणक अनुलोम जकाँ लगैत अछि-

" जे किछु कहब हँसि क ऽ कहू
प्रेमक जालमे फँसि कऽ कहू

खसा दिअ आइ बिजुरी अहाँ
रूपक चानन घसि कऽ कहू "

लयात्मक गजलमे ई भाव आ बान्ह मैथिलीमे बहुत अल्प ठाम भेटल अछि ।एहि रूपेँ शायर अभिवादन आ धन्यवादक पात्र छथि मुदा व्याकरणकेँ क्रमवद्ध आ अनुशासित करबाक क्रममे कतहु-कतहु भाव झुझुआन सेहो भऽ गेल छन्हि जेना-

" बना लेब दुलहिन अपन
अमित कने खखसि कऽ कहू"

ई तँ मात्र एकटा उदाहरण परञ्च जौं सम्पूर्ण संकलनक मनोवाचन कएल जाए तँ एतबा धरि कहल जा सकैछ जे शायर गजल विधाक भविष्यक अपन जनमाषामे एकटा अंश धरि अवश्य छथि ।एहि संकलनक पश्चात बहुत रास परिपक्व आ अरबी बहरयुक्त गजल मैथिलीमे लिखने छथि जे अप्रकाशित छन्हि ।

अरबी बहरमे लिखल एकटा गजल विविध रूपक जीवनान्दकेँ सिनेहक आवरणसँ संघोरि कऽ कऽ प्रदर्शित कएल गेल जे अनुखन आ रोचक मानल जाए-

" गजल नै, नै गीत लिखलौं
जँ लिखलौं तँ प्रीत लिखलौं

बरसबै नै मेघ बनबै
ढहल आँगन भीत लिखलौं"

एकटा रुबाइ जे समर्पण आ प्रेमक अद्भुद छटा देखबैत अछि-

"अहाँ सन मीतसँ एतबे प्रीत चाही
जे नै बिसरि सकी एहन अतीत चाही
हारब हम मजा हमर आएत मुदा
सदिखन अहाँक सब मोड़पर जीत चाही "

संपूर्ण संग्रहकेँ देखलाक बाद एकटा बात अनसोहाँत लगैत अछि जे गजलकारक पूर्ण परिचय कतौ नै देल अछि, पोथीसँ गजलकारक बारेमे नामक अलावे और कोनो जानकारी नै भेटैत अछि जे प्रकाशनक कमी/गलती वा मुद्रणक कमी लगैत अछि ।

बहरे तबील, बहरे मुतकारिब, बहरे जदीद, बहरे मुजास, बहरे काफिर आदि बहरमे संजोगल संकलन आकर्षक छन्हि ।पाठक प्रभावित हेताह ई विश्वास कएल जा सकैछ मुदा जाहि सरल पाठककेँ आनंदक अनुभूति कम ओ एकरा घृत मानि सुआद लऽ सकैत अछि, किएक तँ मंचक लेल लिखल गेल चालू पद्यसँ ई ईतर एकटा साहित्यिक कृति अछि ।
एहिमे भावक संग संग व्याकरणक बान्ह बहुत दृढ़ अछि मुदा सब गजल गेय तेँ मंचक लेल सेहो अनुगामिनी आ प्रयुक्तक संग-संग उपयुक्त मानल जाए ।व्याकरणक ज्ञान छन्हि, भावक आत्मस्फूर्त प्रतिभा छन्हि आवश्यकता छन्हि तँ मात्र परिपक्व संयोजनक जे भविष्य निर्धारण करतनि आ ओहिपर विशेष ध्यान दैत अगिला संकलनकेँ प्रदर्शित करताह, एहि विश्वासक संग युवा प्रतिभाकेँ साधुवाद ।

पोथी- नव अंशु
विधा- गजल, हजल, रुबाइ
गजलकार- अमित मिश्र
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन,  दिल्ली
संस्करण- 2012
दाम- 200 टाका

समीक्षक- शिव कुमार झा"टिल्लू"





सोमवार, 15 दिसंबर 2014

गजल

गजल-2.51

अहीँ कलम अहीँ कगज हमर गजल छी अहीँ
अहीँ मिजाज हमर भावमे बसल छी अहीँ

धसय धरा खसय गगन कतौ वा अन्हर उठय
हियाक घरक बीच लोह बनि गचल छी अहीँ

चलय बसात सगर गाममे गमक बोरि तेँ
कहय गुलाब सब परागमे रमल छी अहीँ

उठैत अछि हमर कलम मुदा लिखा नै रहल
सबसँ सुनर सबसँ अलग निशा चढ़ल छी अहीँ

जरैत तेल अछि मुदा जरा कऽ बाती "अमित"
उठय दरद तँ लगय चोट सहि चुकल छी अहीँ

1212-1212-1212-212

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

गजल

हमरो मोन पियासले रहि गेलै
हुनको मोन पियासले रहि गेलै

चुप्पेचाप बहुत पिया देलक ओ
तैयो मोन पियासले रहि गेलै

तोरा देखि कऽ धन्य बुझलक जे जे
तकरो मोन पियासले रहि गेलै

अप्पन लोक तँ सहजें अगियासल छै
अनको मोन पियासले रहि गेलै

ठोपे ठोप चुबै छलै रस तैयो
सगरो मोन पियासले रहि गेलै

चारिम शेरमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सभ पाँतिमे 2221+12+12222 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

गजल




उज्जर धरती पीयर रौद
हरियर गाछी सुन्दर रौद

नँहिए एलै खिड़की फानि
हुनके सन छै पाथर रौद

भुतला गेलै बाँटल घरमे
लागै बड़का भुच्चर रौद

जे देबै से लैए लेत
पसरल सौंसे आँचर रौद

अजगर गहुमन धामन संग
डँसने घूमै साँखर रौद

सभ पाँतिमे 22+22+22+21 मात्राक्रम अछि।
तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघुमानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 7 दिसंबर 2014

गजल

दुख केर मारल छी ककरा कहू
केहन अभागल छी ककरा कहू

हम आन आ अप्पनकेँ बीचमे
सगरो उजारल छी ककरा कहू

नै जीत सकलहुँ आगू नियतिकेँ
जिनगीसँ हारल छी ककरा कहू

बनि पैघ किछु नव करऽकेँ चाहमे
दुनियाँसँ बारल छी ककरा कहू

कुन्दन पुछू संघर्षक बात नै
दिन राति जागल छी ककरा कहू

मात्राक्रम : 221-222-2212

© कुन्दन कुमार कर्ण

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

गजल



छोट्टे सनकेँ हम्मर बौआ
नमहर नमहर ता ता थैया

उज्जर बगुला हरियर सुग्गा
ललका मैना कारी कौआ

थारी बाटी भरले सनकेँ
खत्मे छै तिलकोरक तरुआ

दूधक पौडर तोरे लेल
चिन्नी खेतै पौआ पौआ

हम्मर बौआ बेली सनकेँ
सुंदर सुंदर गेंदा गेंदा

सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ मात्राक्रम अछि
चारिम शेरक पाहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत काव्यशास्त्रानुसार दीर्घ मानल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

अपने एना अपने मूँह-32


अनचिन्हार आखरपर http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/ नवम्बरमे कुल १९ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--

कुंदन कुमार कर्णजीक ५टा पोस्टमे कुल ५टा गजल अछि।
जगदानंद झा मनुजीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
ओमप्रकाशजीक २टा पोस्टमे २टा गजल अछि।
अमित मिश्रजीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक कुल १०टा पोस्टमे ७टा गजल, १टा दू गजला, १टा बाल गजल, १टा अपने एना अपने मूँह, अछि।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

गजल

अहाँ बिनु नै सुतै नै जागैत छी हम 

कही की राति कोना काटैत छी हम

 

सिनेहक मोल नै बुझलहुँ संग रहितो

परोक्षमे कते छुपि कानैत छी हम

 

करेजा केर भीतर छबि दाबि रखने

अहीँकेँ प्राण अप्पन मानैत छी हम

 

बुझू नै हम खिलाड़ी एतेक कचिया 

अहाँ जीती सखी  तेँ हारैत छी हम

 

अहाँ जतए कतौ जगमे खुश रही ‘मनु’

इहे वरदान सदिखन माँगैत छी हम

 

(बहरे करीब, मात्राक्रम  1222-1222-2122) 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गजल



टूटल फूटल चेहरा छै
हारल थाकल चेहरा छै

झड़कल सनकेँ कर्म हेतै
झाँपल झाँपल चेहरा छै

कनियेँ छूलहुँ ठोर ओकर
गमकल गमकल चेहरा छै

पाथर फेकू सभ विचारक
जमकल जमकल चेहरा छै

खुब्बे पड़लै मोन हमरा
बिसरल बिसरल चेहरा छै

सभ पाँतिमे 2222+2122 मात्राक्रम अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 24 नवंबर 2014

गजल



अगम अथाह छथि नेताजी
विकट बताह छथि नेताजी

बचा बचा कऽ जानो लेलथि
असल बिखाह छथि नेताजी

दवाइ संग टीका राखब
कने कटाह छथि नेताजी

अहाँ कनी किए चाहै छी
सुलभ सलाह छथि नेता जी

विकास लेल अपने देखथि
लगै कनाह छथि नेताजी

सभ पाँतिमे 12+12+12222 मात्राक्रम अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 23 नवंबर 2014

गजल

की जिनगीमे आउ की दूर जाउ
बिनु मतलबकेँ राति दिन नै सताउ

बोली मिठगर सन अहाँ बाजि फेर
हमरा प्रेमक जालमे नै फँसाउ

आगूमे देखाक मुस्की अपार
पाछूमे सदिखन छुरा नै चलाउ

सुच्चा अछि जँ प्रेम साँचे अहाँक
सब किछु बुझि हमरे हियामे सजाउ

राखू नित कुन्दन जँका शुद्ध मोन
बस झूठक कखनो हँसी नै हँसाउ

मात्राक्रम : 2222-21-221-21

© कुन्दन कुमार कर्ण

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

गजल

पहिल बेर दू गजला कहबाक प्रयास केलहुँ अछि। देखल जाए--



कुरता सौंसे पसरल छै
झगड़ा सौंसे पसरल छै

गाछक पातक आ फूलक
चरचा सौंसे पसरल छै

जीबछ कोशी बागमती
कमला सौंसे पसरल छै

मंदिर मस्जिद गिरजा हो
भगता सौंसे पसरल छै

दिल्ली भेटत बाटेपर
पटना सौंसे पसरल छै

खादी भागल काते कात
चरखा सौंसे पसरल छै

बेंगक टर टर सुनि सुनि कऽ
बरखा सौंसे पसरल छै

पानिसँ बेसी मटिया तेल
धधरा सौंसे पसरल छै

मंझा चाहै गुड्डी तँइ
धागा सौंसे पसरल छै

ताड़ी लबनी पासी भाइ
चिखना सौंसे पसरल छै

सीता जनमै एकै गो
रामा सौंसे पसरल छै

पाचक भागै दूरे दूर
कर्ता सौंसे पसरल छै

चोरी लूट डकैतीके
खतरा सौंसे पसरल छै

छिटलहुँ खाद मुदा तैयो
खखरा सौंसे पसरल छै

लोटा थारी बाटी चुप्प
तसला सौंसे पसरल छै

सूदिक सुख मूरे जानै
कर्जा सौंसे पसरल छै

अनचिन्हारक संगे संग
फकड़ा सौंसे पसरल छै


जकरा मारल मरलहुँ से
पुछलक तोरा मारल के

मूनल रहतौ आँखि हमर
तइ के बदला हमरो दे

देलक चिन्हासी प्रेमक
कहबे करबे खिस्सा गे

श्वासक आसक विश्वासक
टूटल अत्मा तोंहू ले

बाड़ी झाड़ी छोड़ल हम
उर्सी कुर्सी भेटल जे


सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल छै। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु सेहो छूटक तौरपर अछि। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत व्याकरणानुसार दीर्घ मानल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि। 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

अपने एना अपने मूँह-31

अनचिन्हार आखरपर http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/  अक्टूबरमे कुल 18 टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
कुन्दन कुमारक कर्णजीक कुल 4टा पोस्टमे 3टा गजल ओ 1टा भक्ति गजल अछि।
अमित मिश्र ओ जगदानंद झा मनुजीक 2-2टा पोस्टमे 2--2टा गजल आएल।
आशीष अनचिन्हारक कुल 10 टा पोस्टमे 6टा गजल, 1टा अपने एना अपने मूँह, 1टा हजल, 1-1टा बाल ओ भक्ति गजल अछि।

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों