Tuesday, 31 January 2012

गजल


जखन सँ खसल आँचर देखलहुँ हम
तखन सँ बुझू सबटा  बिसरलहुँ हम

होस रहल नै कतय छी कनिको अपन
आब तs अहीं में पूर्णतय रमलहुँ हम

दोख आँचरक नै ई  खुसनसीबि हमर
मोन में अहाँ कए अपन बनेलहुँ हम

अहाँ मानु नै मानु आँचर हमहि राखब
खसै छै कतेक खसै दियौ ठानलहुँ हम

सुकोमल काया बदन सुन्नर चन्दन सँ
आँचरक बहाने अहाँ केँ  जानलहुँ हम

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल संख्या -१४



मजहर इमामक मृत्यु


मजहर इमाम- जन्म १९३० ई. दरभंगा (बिहार)मे आ मृत्यु २०१२ ई. दिल्लीमे। आजाद गजल लिखैबला (ओना बेशी गजल ओ बहरयुक्त लिखलन्हि) श्री मजहर इमामकेँ हुनकर काव्य संग्रह "पिछले मौसम का फूल" लेल उर्दूमे साहित्य अकादेमी पुरस्कार १९९६ ई. मे देल गेल। ओ "आजाद गजल"केँ स्थापित केलन्हि। "पिछले मौसम का फूल"मे ५५ टा बहरयुक्त आ ३ टा आजाद गजलक संकलन अछि। ओ १९८८ ई.मे श्रीनगर दूरदर्शनमे केन्द्र निदेशकक पदसँ अवकाश ग्रहण केने रहथि।

(साभार समदिया http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_4386.html )

गजल

अहां सों भेल भेंट निश्चय भाग नै फुटत आब
लाख करै कोशिश जमाना खुशी नै लुटत आब

नीक भेल जे हम बनलहु नहि अहॉक छाया
अनहार भेने संग अहॉक नहि छुटत आब

बनल करेज पाथर आब देख लोकक रंग
कोशिश कय देख लिय दिल नहि टूटत आब

अहां सों मिलि जेना रोशनाई घोरायल पानि मे
कोशिश करब कतबहु प्राण नै छुटत आब

जिनगी भारि ताकि छवि अहां क निन्न नई भेल
चिर निद्रा केर कय आलिंगन ई सुतत आब

गजल


प्रेम-गाछ पर बैसल वो चिड़ै , कुन दिशा में उड़ि गेलई
मोनक बात मोने में रहिके अंकुरित भकअ गड़ि गेलई ।

दूर उड़ान हरि लेलक प्राण, हर्खक बरखी लागै भय गेल
बनिके ठूठ ठाड़े मोन रहिगेल, हरियर फ़ुनगी झड़ि गेलई ।

मन उपवन छल स्वच्छ सुवासित चाहक छाया बड गंभीर
हॄदयक वेदना सं तप्त त्रस्त, सुखायलओ जड़ि जड़ि गेलई ।

कानै आंखि दुनु झड़ि झड़ि, ककरा सं कहब ई प्रेमक पीड़
प्रेयसी प्रेम पीड़ित प्रियतम के अनंत पीड़ा में छोड़ि गेलई ।-
भास्कर झा 31/01/2012

गजल



आब कहिया तक रहतै, हमर मोन उदास यौ पिया
होलीमें गाम एबैय,तोड़ब नै हमर विस्वास यौ पिया

अहांक ईआद में तर्सल जिया,बरसल नैना सं नीर
बैषाखी बीत बरषलै सावन,बुझलै नै प्यास यौ पिया

सुकसुकराती दियाबाती, बितगेल दष्मी दशहरा यौ
छैठो में गाम नै एलौं, तोड़ी देलौं मोनक हुलास यौ पिया

मोन भ S गेल आजित, कहिया भेटत अहाँक दुलार यौ
एबेर फागुमें अहाँ आएब,मोन में अछि आस यौ पिया

जौं गाम नै आएब, हमर मुइलो मुह देख नै पाएब
फेर ककरा संग करब, प्रीतक भोग विलास यो पिया
....................वर्ण:-२१..............................
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

Monday, 30 January 2012

गजल


कुशल आबि देख लिअ, एतऽ सबटा आँखि नोर सँ भरल छै।
विकास कतऽ भेलै, विकासक दिस इ बाट चोर सँ भरल छै।

चिडै सभ कतौ गेल की, मोर घूमैत अछि गाम सगरो,
इ बगुला तँ पंख अछि रंगि कऽ, सभा वैह मोर सँ भरल छै।

सब नजरि पियासल छल तकैत आकाश चानक दरस केँ,
निकलतै इ चान कहिया, आसक धरा चकोर सँ भरल छै।

उजाही उठल गाम मे, नै कनै छै करेज ककरो यौ,
हमर गाम एखनहुँ खुश गीत गाबैत ठोर सँ भरल छै।

कहै छल कियो गौर वर्णक गौरवक एहन अन्हार इ,
सब दिस तँ अछि स्याह मोन जखन इ भूमि गोर सँ भरल छै।
फऊलुन(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)- ६ बेर प्रत्येक पाँति मे

गजल



मिथिलाक पाहून भगवान श्रीराम छै
जग में सब सं सुन्दर मिथिलाधाम छै

मिथिलाक मईट सं अवतरित सीता
जग में सब सं सुन्दर हुनक नाम छै

मिथिलाक शान बढौलन महा विद्द्वान
कवी कोकिल विद्यापति हुनक नाम छै

भS जाएत अछि सम्पूर्ण पाप तिरोहित
मिथिला एकटा पतित पावन धाम छै

भेटत नै एहन अनुपम अनुराग
प्रेम परागक कस्तूरी मिथिलाधाम छै

घुमु अमेरिका अफ्रीका लन्दन जापान
जग में नै कोनो दोसर मिथिलाधाम छै

मिथिला महातम एकबेर पढ़ी जनु
मिथिला सं पैघ नै कोनो दोसर धाम छै

जतय भेटत कमला कोशी बलहान
अयाचिक दलान,वही मिथिलाधाम छै

गौतम कपिल कणाद मंडन महान
प्रखर विद्द्वान सभक मिथिलाधाम छै
.
ऋषि मुनि तपश्वी तपोभूमि अहिठाम छै
"प्रभात"क गाम महान मिथिलाधाम छै


.............वर्ण:-१५...........
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

Saturday, 28 January 2012

गजल




हम अहां केर प्रीतम नहि बनी सक्लहूँ
मुदा अहांक करेजक दर्द बनी गेलहुं

अहां हमर प्रेम दीवानी बनल रहलौं
हम अहांक दीवाना नहि बनी सक्लहूँ

अहां हमर प्रेम उपासना करैत गेलौं
हम आनक वासना शिकार बनी गेलहुं

अहांक कोमल ह्रदय तडपैत रहल
हम बज्र पाथर केर मूर्ति बनी गेलहुं

हम अहांक निश्च्छल प्रेम जनि नै सकलौं
अनजान में हम द्गावाज बनी गेलहुं

आब धारक दू किनार कोना मिलत प्रिये
मजधार में हम नदारत बनी गेलहुं
................वर्ण:-१६ ...............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

Friday, 27 January 2012

गजल


कहि कऽ नै मोनक हम तँ बड्ड भेल तबाह छी बाबू।
कहब जे मोनक, अहीं बाजब हम बताह छी बाबू।

हुनकर गप हम रहलौं जे सुनैत तँ बनल नीक छलौं,
गप हुनकर हम नै सुनल, कहथि हम कटाह छी बाबू।

सदिखन रहलथि मूतैत अपने आगि सभ केँ दबने,
हम कनी डोलि गेलौं, ओ कहै अगिलाह छी बाबू।

बनल छल काँचक गिलास हुनके मोनक विचार सुनू,
इ अनघोल सगरो भेलै हम तँ टुनकाह छी बाबू।

सचक रहि गेल नै जुग, सच कहि कऽ हम छी बनल बुरबक,
गप कहल साँच तऽ अहीं कहब "ओम" धराह छी बाबू।
(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)--- ४ बेर

कता





जे जतेक बड़का पाखंडी
ओ नमहर टीका लगबैए
बकथोथीमे प्रवीण मुदा
काजमे गदहोकेँ लजबैए

Wednesday, 25 January 2012

‎गजल

कोनो परी जकाँ लागै छी अहाँ
पुनिम कए राति सन चमकै छी अहाँ

आइ राति खसतै अहाँक बिजुरी कतs
सागर कए लहर जकाँ खसै-उठै छी अहाँ

गुलाब सन अहाँक ठोर आँखि झिल लागए
सावन कए मेघ घेरल जखन केश खोलै छी अहाँ

वियहुती साड़ी सींथ सिनुर अनुपम छटा देखाबै यै
चँदा लाजा कs भागल मुस्की जखन मारै छी अहाँ

कखनो कतबो ककरो क्रोध सँ होई काँपैत तन
मिठ बोल मे अमृत मिला परसै छी अहाँ ।

नैन मिलल तs हटै कए नाम नइ लै यै
हमर दिल कए सब कोन मे बसै छी अहाँ

किछु और लिखत "अमित " मुदा शब्द नइ भटल
ककरो सोच सँ बेसी सुन्नर लागै छी अहाँ . .

गजल



अहाँ तँ सभटा बुझैत छी हे माता
सुमरि अहाँकेँ कनैत छी हे माता 

दीन हीन हम नेना बड़ अज्ञानी
आँखि किए अहाँ मुनैत छी हे माता

अहाँ तँ  जगत जननी छी भवानी
तैयो नहि किछु सुनैत  छी हे माता 

श्रधाभाव किछु देलौं अहीँ  हमरा
अर्पित ओकरे करैत छी हे माता

नहि हम जानी किछु पूजा-अर्चना
जप तप नहि  जनैत छी हे माता

जगमे आबि    ओझरेलहुँ एहेन
अहाँकेँ नहि सुमरैत छी हे माता

छी मैया हमर हम पुत्र अहीँकेँ
एतबे तँ हम बजैत छी हे माता

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)
जगदानन्द झा 'मनु'

रुबाइ

गणतंत्र दिवसक शुभकामना



रुबाइ


लोक तँ विश्वास रखैए एहि मंत्रमे
कि पाइए बड़का छै एहि गणतंत्रमे
करबै की छब्बीस-पंद्रह मना कए
आजादी तँ बान्हल छै जनतंत्रमे

गजल



आइ हमर मोन एतेक उदास किएक
पानि लग रहितो मोनमे पिआस किएक

प्रभात संग पूनम आएत आस किएक
नै आएत से सोचि मोन उदास किएक

सिनेहक सागरमे हम नहेलहुँ नहि
तखन मिलन लेल मोन उदास किएक

हम प्रगाढ़ प्रेमक पराग लेलहुँ नहि
आइ प्रीतम मोन एतेक हतास किएक

हम मधुर मुस्कान संग हँसलहुँ नहि
आइ दिवा-स्वपन एतेक मिठास किएक



वर्ण--१६

Tuesday, 24 January 2012

गजल


लाल-दाईकेँ  ललना लाले लाल लगैत छथि
लाली अपन माएकेँ चोरा कs नुकाबैत  छथि

छैन आँखिमे हिनकर काजरक बिजुडिया
माइयोसँ सुन्नर झिलमिल झलकैत छथि

लटकल माथपर सुन्नर लट हिनकर
देखियौंह  चंद्रमाकेँ आब ई  लजाबैत छथि

सुनि-सुनि बहिना सब हिनकर किलकाडि
कियो खेलाबैत कियो हिनका झुलाबैत छथि

रंग-रूप चाल-चलन सबटा निहाल छैन
मुस्कीसँ इ तँ अपन 'मनु'केँ लुभाबैत छथि


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)
जगदानन्द झा 'मनु'  :  गजल संख्या - ११

गजल

गजब तोहर रूप गजब तोहर सिंगार गे छौंड़ी
कोना के करियौ हम चेहरा तोहर दीदार गे छौंड़ी


कामरूप के कय वरण एतेक इतराईत छे़ तू
ठुमकि ठुमकि जाइ छे कतय तोहर अभिसार गे छौंड़ी


वसंत ऋतु मे भेल वासन्ती गमकैत तोहर काया
इन्द्र देव के मोहित कय के गबै छे मल्हार गे छौंड़ी


सर्वस्व लुटेलौ तोरा पर अप्पन किछु नहि बांचल
आस तकबौ जिनगी भरि नै कर तू इन्कार गे छौंड़ी


रुक्मणी देखल रंभा देखल देखल शहर क छौंड़ी
पासंगो भरि नहि छौ कोई आई एहि संसार गे छौंड़ी

गजल

प्रस्तुत अछि इरा मल्लिक जीक इ गजल


गजब तोहर रूप गजब तोहर सिँगार गे छौँरी,
तैपर तिरछी नजरिया मारै सौ सौ कटार गे छौँरी।


एहन बालि छौ उमिरिया कोना लचकै छौ कमरिया,
एना चलभि बीच बजरिया मरतै सँसार गै छौँरी।


छौ ठोर गुलाबी बसँती तोहर गाल गुलाबी बसँती,
सुँदर बदन तोहर छौ गुलाब के भँडार गै छौँरी।


गोरिया रँग तोहर बेजोड़ केहन मारै छौ इजोर,
चकाचक चढ़ल जुआनी पर मिटौ सँसार गै छौँरी।

गजल

टूटल छी तें गजल कहैछी
भूखल छी तें गजल कहैछी ।


ऑफिस-ऑफिस गेलौं हमहूं
लूटल छी तें गजल कहैछी ।


घरमे बैसल दुनिया देखू
गूगल छी तें गजल कहैछी ।


खूब जनैछी खापडिकें हम
भूजल छी तें गजल कहैछी ।


ऊखडि आर समाठ जनैए
कूटल छी तें गजल कहैछी ।


यात्रीजीक अहां बलचनमा
सूतल छी तें गजल कहैछी ।


हम खट्टर कक्का के तबला
फूटल छी तें गजल कहैछी ।

Monday, 23 January 2012

गजल


टूटि-टूटि क' हम त' जोडाइत रहै छी।
मोनक विचार सुनि पतियाइत रहै छी।

गौरवे आन्हर पडल अपने घरारी,
सदिखन मुँह उठा क' अगधाइत रहै छी।

हाट मे प्रेमक खरीद करै सब किया,
बूझि नै, आब त' हम बिकाइत रहै छी।

फहरतै झंडा हमर सब दिस हवा मे,
एहि आसेँ खूब फहराइत रहै छी।

"ओम"क कपार पर कानि क' की करत ओ,
फूसियों हम ताकि औनाइत रहै छी।

गजल


टीस उठैए करेज में कोना कहु बितैए की
कोन लगन लगेलौं अहाँ सँ याद अबैए की


जतय देखु जिम्हर देखु अहीँ केँ देखै छीक 
कोना बितत दिन-राति कोना कए बितैए की


की करू कोना करू आब नै किछ फुराईए 
रहि-रहि  क ' याद अहुँ  केँ  हमर आबैए की


प्रियतम 'मनु' केँ  किएक इना तरपाबै छी
मोन में लहर उठल से अहुँ केँ  लगैए की 


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल संख्या-१० 

2012 केर "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान"क लेल मुख्यचयनकर्ता

आधिकारिक रूपसँ बर्ख 2012 केर "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान"क लेल मुख्यचयनकर्ताक रूपमे ओस्ताद जगदीशचंद्र ठाकुर "अनिल" जीक सहमति भेटि गेल अछि। एहि सम्मानक घोषणा हरेक सालक तिला-संक्रांति दिन कएल जाइत अछि। ओस्ताद "अनिल" जी मैथिली गजल-गीत साहित्य केर माँजल छथि। एक समयमे हिनक गीत " तोरा अँगनामे बसंत नेने आएब" बहुत धूम मचा देने रहए।

Sunday, 22 January 2012

मैथिली गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

मैथिली गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

मैथिली गजल (बहरे मुतकारिब)- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

मैथिली गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

Saturday, 21 January 2012

गजलकार सियाराम झा "सरस"सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अन्तर्वार्ता

गजल

लोक जिबैए सुविधामे
हम रहैछी दुविधामे।


अहां घुमैछी काबा काशी
हम घुमैछी कवितामे।


आसमानमे मेघ कहां
हम भीजैछी बरखामे।


बाबू कक्का भाए बहिन
देखू सगरो दुनियामे।


यात्री हरिमोहन कत्तऽ
हम तकैछी अपनामे।


सभके हिस्सामे सुख हो
कोन कमी छै बसुधामे।

नात

इस्लाममे कुरानक बाद सभसँ पवित्र काव्य रूप छै इ नात



तँ प्रेमसँ कहू सुभानअल्लाह

मिथिलाकेँ बना देबै मदीना हम
दुनियाँकेँ देखा देबै मदीना हम


पापी-नरकी सभहँक स्वागत छै
सभकेँ तँ घुमा देबै मदीना हम


पहिने जोड़ू सए कमलकेँ
तैमे जोड़ू हजार गुलाब
तकरा बाद जे बनि जाएत
से निशानी हएत प्यारकेँ
डेगे-डेग बसा देबै मदीना हम

गजल



प्रस्तुत अछि स्वाती लाल जीक इ गजल







सीता के गुण गान करै छि केलहुँ हुनके कात किनार

चिर हरण देखैत रहलौं बैसल रहलौं भs लाचार


घोघ काढि सभ बात मानि हम तै मे करबै गर्व अहां
नारी शिक्षा के बात उठल जौं त अहां भडब फूफकार


घर अफिस काज करु हम छटबै छुच्छे कि गप्प अहां
अहां के बात सँ ज्ञान लिएै हम कहलहुँ त मिथ्याचार


बाट चौबटिया जत्तै देखू आदर्श के छि प्रतिरुप अहां
स्त्री जाती सँ धर्म अपेक्षित कर्म करै त होय प्रहार


कहब हम सुनू ध्यान सँ हम्मर गप्प आई अहां
तोडू निंद भोर भेलै दियौ बराबर के दर्जा सरकार I

गजल

देह-हाथ, मूँह-कान कमाल थिक बाबू
बीसम चढ़ैत छौंड़ी बबाल थिक बाबू

चुभकैत रहू उत्तर केर पोखरिमे
बेरोजगारी बड़का सवाल थिक बाबू

अहाँ कतबो करबै इ नारी आरक्षण
बेटी एखनो मोनक जपाल थिक बाबू

इ जे दिनक परेशानी रातुक बैचेनी
इ तँ केकरो आँखिक उत्फाल थिक बाबू

इ खालिओमे सैतान भरलोमे सैतान
पेट सभसँ बड़का मताल थिक बाबू



सरल वार्णिक बहर --- हरेक पाँतिमे 15 अक्षर|

गजल

जेम्हरे देखबै देखाएत समस्याग्रस्त लोक
अपने जकाँ तँ बुझाएत समस्याग्रस्त लोक

देखू ओ तँ बैसल कुर्सी पर विश्वामित्र बनि
रोहिते जकाँ तँ बिकाएत समस्याग्रस्त लोक

एतै जखन बिहाड़ि सत्ता, धन आ बल केर
पाते जकाँ उड़िआएत समस्याग्रस्त लोक

सोचै छलै पाइ भेटने इ करब ओ करब
हाथेंपर दही जन्माएत समस्याग्रस्त लोक

ओकरा बुझल छै जे गलती के करै छै तैओ
अपनेपर खिसिआएत समस्याग्रस्त लोक



सरल वार्णिक बहर --- हरेक पाँतिमे 17 अक्षर|

गजल

फुटानी केर धंधा ई
भए गेलैक मंदा ई

बहैए नोर तैओ हम
उठेलहुँ सुखक झंडा ई

पिसा जाएत ओ एना
कहू केहन तँ फंडा ई

बहुत सुख संग बैसल छै
जहलमे बंद पंडा ई


मूल रुक्न मफाईलुन ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) केर एक पाँतिमे दू बेर प्रयोग।
बहर- बहरे हजज मुरब्बा सालिम

गजल

बेटा छलै पोता छलै
खाली तँ ओ खोंता छलै

काजर छलै खोपा छलै
जादू छलै टोना छलै

कतबो तँ पूजा केलकै
पापक तँ ओ मोटा छलै

जेबी भरल हरखित छलहुँ
खाली मुदा झोड़ा छलै

जानल इ गप्प मानल इ गप्प
मीता तँ नै पोआ छलै



मूल रुकन- मुस्तफइलुन ( दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ) केर एक पाँतिमे दू बेर प्रयोग।

बहर--- बहरे रजज मुरब्बा सालिम

Friday, 20 January 2012

गजल

जिनगी कें अखबार बनौने बैसल छी
हम घरकें बाजार बनौने बैसल छी।


श्रद्धा,ममता,स्नेह,प्रेम,आनंद कतय ?
हम सबकें ऐंठार बनौने बैसल छी।


सोझां केर संसारकें माया कहैछी हम
हम मायाकें संसार बनौने बैसल छी।


ईष्या,चिन्ता,क्रोध मनुक्खक दुश्मन थिक
हम सबकें परिबार बनौने बैसल छी।


गांधी जितलनि दुनिया सत्य, अहिंसासं.
प्रेमकें हम व्यापार बनौने बैसल छी ।


थिक विवाह दू अन्तरात्माकेर मिलन
हम जातिक ओहार लगौने बैसल छी ।


जीवनक सब दुख हरती शिक्षा मैया
हम मूर्तिक अंबार लगौने बैसल छी ।


अछि विधान तं भ्रष्टाचार सं लडबालेऽ
हम सबकें लाचार बनौने बैसल छी।

Thursday, 19 January 2012

बन्द

चंचल यौवन लैत उफान छैक
कुंदन वसन भरै गुमान छैक
अंजन रंजित नयन वाण
हरि लेलक ई सभक प्राण
शस्त्र एहेन केलहु निर्माण
त्राहिमाम हे देव करू त्राण
चाह नहि ई त विधि विधान छैक

Wednesday, 18 January 2012

गजल

लहरि उठल छै सगर देहमे, आगि थुकरने की हेतै
तेजक धाहे जरल जाइए, बिनु रोग कुहरने की हेतै

विनाश काले विपरीत बुद्धि:, से लिखलाहा के मेटतै
राज पाटके छै मोह जकड़ने, आँखि गुरड़ने की हेतै

अंटसंट नहि बाजि ज' कनिको, प्रेमक बाट बनेने रहितै
सम्हरक अवसर एखनहुं छै, पछाति सुधरने की हेतै

उत्तर मूंहे भुकला स' की , पर्वतराज पघलि जेतै
सब दिन जे स्वीकार्ये रहलै, आब मुकरने की हेतै

अपना बुद्धिक परिचय द'क', आगाँ-आगाँ बढिते रहतै
सबहक़ सम अधिकार जतय छै, एक हुकरने की हेतै

Tuesday, 17 January 2012

गजल


मुस्की सँ झाँपि रखने छी जरल करेज अपन।
सब सँ नुकेने छी दुख भरल करेज अपन।

दिल्लगी करै लेल चाही एकटा जीबैत करेज,
ककरा परसियै हम मरल करेज अपन।

मोहक जुन्ना मे बान्हल हम जोताईत रहै छी,
देखैत रहै छी माया मे गडल करेज अपन।

कियो देखै नै, तैं केने छी करेज केँ ताला मे बन्न,
देखबियै ककरा आब डरल करेज अपन।

कोनो गप पर नै चिहुँकै आब करेज "ओम"क,
अपने सँ हम घोंटै छी ठरल करेज अपन।
---------------- वर्ण १८ ---------------

गजल


विरह हमर सताएत अहाँके,
इ बात बादमे बुझाएत अहाँके

ठुकरेलौ कियाक पिआर हुनक,
गलती कएल सुझाएत अहाँके

जहिना हमर इ प्रीत मिझाएल,
करेज कियो झरकाएत अहाँके

मधुकुसुम बनि एना नहि घूमूँ,
मर बहुते सताएत अहाँके
हाथ धरै लेल बहुते छैथ ठाढ़,
"रौशन" सित सजाएत अहाँके

Monday, 16 January 2012

गजल




निर्धन जानि कऽ छोरि गेलहुँ  माँ     
कोन अपराध हम केलहुँ माँ

केहनो छी तँ हम पुत्र अहींकेँ
सभ सनेश अहींसँ पेलहुँ माँ   

मूल्यक तराजुमे नै एना जोखू 
ममताकेँ  पियासल भेलहुँ माँ

दर-दर भटकि खाक छनै छी
दर्शन अपन नै दखेलहुँ माँ

मनु’केँ अपन सिनेह नै देलहुँ
सोंझाँ सँ दूर आब भगेलहुँ माँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)
जगदानन्द झा मनु

गजल

मरण अतs अटल छै
जीवन कतs सरल छै

बुझि जे इ मर्म गेलैक
जन्म हुनक सफल छै

कर्म के पुजैत दुनिया
लोकक भाग्ये प्रबल छै

बाँहि स कतौ बुत्ता होय
दर्द सहै से सबल छै

मजबूर के लूटि लिअ
कतsक बाहुबल छै

"रौशन"बना लिअ गुट
अतs सबहक दल छै

Sunday, 15 January 2012

"गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख २०११



हमरा सूचित करैत इ परम हर्खक अनुभव भए रहल अछि जे अनचिन्हार आखर द्वारा प्रस्तुत "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख २०११ लेल ( जे की पहिल सेहो अछि) ओस्ताद सदरे आलम गौहर जीक मास फरवरीमे प्रकाशित हुनक गजलकेँ देल जा रहल अछि। हुनका बधाइ। एहि सालक मुख्यचयनकर्ता छलाह ओस्ताद सियाराम झा "सरस"। हुनका धन्यवाद।


प्रस्तुत अछि ओस्ताद सियाराम झा "सरस" जीक टिप्पणी जे की हमरा मेलपर पठाएल गेल अछि।


हम सियाराम झा "सरस" उपरोक्त पुरस्कार योजनाक नियमावलीसँ पूर्ण वाकिफ छी। एहि योजनाक अंतर्गत १२ मासक १२ गोट चुनल बीछल गजल सभकेँ पुनः-पुनः पढ़ि कए देखल। तहिमेसँ कोनो एकटाकेँ चुनब बेस कठिन काज थिक। तथापि हम अंतरिम रूपें फरवरी मासक गजल जे की ओस्ताद सदरे आलम गौहर जीक गजल छन्हिकेँ पहिल स्थान पर रखैत छी। जदि दोसर आ तेसर केर चयनक बात हो तँ हम ओस्ताद ओमप्रकाश जीक गजलकेँ जे की मास सितम्बरमे प्रकाशित भेल तनिका देब। आ ओस्ताद श्रीमती इरा मल्लिक जीक गजल के तेसर स्थान पर राखए चाबह जे की मास दिस्मबरमे प्रकाशित भेल। संत्वाना सम्मान वा चारिम स्थान ओस्ताद मिहिर झाक गजलकेँ जाइछ जे की मास नवम्बरमे प्रकाशित भेल। अंतमे हम कहब जे गजलक बहर वा मीटर पर खास धैआन देल जएबाक चाही। गजलक मतला-मकता सेहो कसल रहबाक चाही। इ कोनो एक दिनक काज नहि छी। लगातार अभ्याससँ, नीक-नीक गजलकारक रचनाक मनन-चिंतनसँ गजलमे निखार आबै छै| अंतमे हम अपने एकटा गजलक किछु पाँति कहैत विदा लेब---


खरा-खरी कहबाकेँ नाम छी गजल
आबामे रहबाकेँ नाम छी गजल

क्यूरी-दंपति जकाँ मानवताक लेल
रेडियमकेँ चखबाकेँ नाम छी गजल

अनचिन्हारजीकेँ इ प्रतियोगिता आयोजन मैथिली साहित्य लेल मीलक पाथर सिद्ध हएत। सभ प्रतिभागीकेँ मंगलकामना नव वर्ख २०१२ लेल।

सियाराम झा "सरस"
राँची

09/01/12


Friday, 13 January 2012

गजल



की -की  बनब चाहै छलौं हम की बनि गेलौंह
सुगँधा   अहीँ केँ  सनेह  में हम सनि गेलौंह

आस हमर करेज केँ करेजे में रहि गेल
अहाँक  पिआर में परि सबके जनि गेलौंह

रहल नहि होश हमरा दुनियाँक दुख केँ
अहाँक  लोभ में हम  भटकैत कनि गेलौंह

सैदखन ख्याल में अहीं कए बसेने रहै छी
सब कुछ हम अपन अहीं केँ मनि गेलौंह

हमर स्नेह जे अहाँ सँ स्नेह नहि रहि गेल
हमर मोन में बसि अहाँ प्राण बनि गेलौंह

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)
जगदानंद झा 'मनु'

बन्द

एक मास एक दिनकेँ बाद वेलेन्टाइन डे आएत। हमर शेरो-शाइरी लिखबाक इहो उद्येश्य अछि जे प्रेमी-प्रेमिका मैथिली शेरकेँ माध्यमें प्रेमकेँ स्वीकार करथि। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीएकटा बन्द जे शायद मैथिलीक पहिल बन्द हएत। ओना इ पाँति सभ अरबी बन्दकेँ लक्षण पर प नै आएत मुदा हमरा उम्मेद अछि जे आरो लोक सभ नीक बन्द लिखता। तँ कल्पना करू वेलेन्टाइन डे केर--------


पहिने जोड़ू सए कमलकेँ
तैमे जोड़ू हजार गुलाब
तकरा बाद जे बनि जाएत
से निशानी हएत प्यारकेँ

Thursday, 12 January 2012

गजल


कखनो छूबि दियौ हमरो फुलवारीक फूल बूझि क'।
किया केने छी यै कात हमरा करेजक शूल बूझि क'।

हमरा सँ नीक झूलनियाँ, जे बनल अहाँक सिहन्ता,
हमरो दिस फेरू नजरि झूलनियाँक झूल बूझि क'।

अहाँक नैनक मस्ती बनल प्रेमक पोथी सब लेल,
हमहुँ पढब प्रेम-पाठ अहाँ सँ इसकूल बूझि क'।

बहत प्रेमक पवित्र धार, करेज बनत संगम,
प्रेम छै पूजा, नै छोडू एकरा जिनगीक भूल बूझि क'।

प्रेमक घर अहाँक अछि किया फूजल केवाडी बिना,
ठोकि लियौ "ओम"क प्रेम ओहि केवाडीक चूल बूझि क'।
----------------------- वर्ण २० -----------------------

गजल


मैथिलीकेँ नुकेलासँ किछु नै हएत
उर्दूसँ खिसिएलासँ किछु नै हएत

समां लिअए सभकेँ, भाषा ओ बढ़त आगू
किनको हल्ला मचेलासँ किछु नै हएत

बुत्ता हुअए तँ खोंट अपनामे ताकू
छुच्छे आँगुर चमकेलासँ किछु नै हएत

जँ कवि छी जनमानसक कविता लीखू
प्रीतमक आँचरमे ओझरेलासँ किछु नै हएत

जँ बदलाव चाहैत छी, आगाँ बढ़ू "रौशन"
बाट अनकर जोहलासँ किछु नै हएत

रुबाइ



जनिका खाली सपनेमे देखै छलहुँ
जनिका लेल हम पाँति-पाँति लिखै छलहुँ
ओ से चलि गेलथि दूर आइ हमरासँ
जनिका लेल हम फूल-काँट बिछै छलहुँ

गजल

प्रेमिक नोर छै गजल
प्रेमक शोर छै गजल

भगवानक चर्च कखनो
कखनो प्रीतमक ठोर छै गजल

बसातक कादो नहि बुझू
सावनक मोर छै गजल

तुकबंदी जौ सही बइठा
तखैन चितचोर छै गजल

आन भाषा में जे कहियौ
मैथिली में माछक झोर छै गज़ल

रस-रूप श्रद्धा औ समर्पण
देखू सबहक घोर छै गजल

समाजक सभ रूढ़ी केर
बुझियौ त तोड़ छै गज़ल

बान्है छि त बान्हू "रौशन"
मुदा सागरक छोर छै गजल

Wednesday, 11 January 2012

गजल


हम सब पूछी अहाँ सँ एकेटा सवाल, किछ बाजू ने।
अहाँ केलियै किया देशक एहेन हाल, किछ बाजू ने।

आसक धार मे हेलैत मनुक्खक कोनो हेतै कछेर,
आस पूरत, कहियो एतै एहन साल, किछ बाजू ने।

भूखल आँखिक नोर सुखा केँ बनि गेल अछि यौ नून,
वादाक अचार चटा, करब कते ताल, किछ बाजू ने।

कदम ताल करै सँ कतौ देशक भ्रष्टाचार मेटेतै,
गुमस बेसी हेतै त' भ' जैत यौ बवाल, किछ बाजू ने।

राशन होय की शासन अहाँ सभ ठाँ पेंच लगौने छी,
कर जोडि कहै ए "ओम", तोडू इ जंजाल, किछ बाजू ने।
------------------- वर्ण २० ---------------------

रुबाइ




इयाद करब नीक एहि संसारमे
पिआर करब नीक एहि संसारमे
मुदा मिट्ठो भेने चुट्टी लगै छै
अचार बनब नीक एहि संसारमे

गजल


जिनगीक गीत अहाँ सदिखन गाबैत रहू।
एहिना इ राग अहाँ अपन सुनाबैत रहू।

ककरो कहै सँ कहाँ सरगम रूकै कखनो,
कहियो कियो सुनबे करत बजाबैत रहू।

खनकैत पायल रातिक तडपाबै हमरा,
हम मोन मारि कते दिन धरि दाबैत रहू।

हमरा कहै छथि जे फुरसति नै भेंटल यौ,
घर नै, अहाँ कखनो सपनहुँ आबैत रहू।

सुनियौ कहै इ करेजक दहकै भाव कनी,
कखनो त' नैन सँ देखि हिय जुराबैत रहू।
------------- वर्ण १७ ---------------

Tuesday, 10 January 2012

गजल

भैया यौ खाली फोने करै छी
हम एत भुखले मरै छी

मिथिला चित्र अहां मंगै छी
खर्चा ओकर नहि करै छी

विदेशी गॅप नै सोहाइय
पैंच हम कहुना भरै छी

मिथिला चित्र अहां मंगै छी
खर्चा ओकर नहि करै छी

नून रोटी पर आफद छै
नौ तिमना के गॅप करै छी

मिथिला जे पाछू अछि भाय
किया नै एत' काज करै छी

गजल

छुपि -छुपि  दिन राति  हम अहाँक छवि निंघारै छी 
एक अहाँ छी की  नइँ हमरा करेजा सँ लगबै छी 


एक दिन पूरा होयत हमरो करेजक कामना 
अहुँ कि याद करब की ककरा सँ नेह लगाबै छी 


एक दिन ओहो एतै जहिया हमर स्नेहिया एबै
तखन अहीँकेँ निंघारब एखन छबि निंघारै छी 


नहि मिलन कए ओ घडी आब अहाँ रोकल करू 
ओ मधुर घडी जल्दी आबे हम इंतजार करै छी 


हमर जे चाहत अछि से सुनायब हम जरुर 
नै रोकने अहाँ हमरा आब कहै सँ रोकी सकै छी 


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९)
जगदानन्द झा 'मनु'  : गजल  संख्या-७ 

Monday, 9 January 2012

अपने एना अपने मूँह-3

बर्ख 2011मे जे अनचिन्हार आखरमे जतेक पोस्ट भेल तकर विवरण मासिक रुपें देल जा रहल अछि-------
मास जनवरीमे कुल सातटा पोस्ट भेल जाहिमे------
शिव कुमार झा "टिल्लु" द्वारा चारिटा पोस्ट भेल जाहिमे कालीकांत झा"बुच"जीक एकटा गजल, नरेश कुमार विकलक दू टा, आरसी प्रसाद सिंहक एकटा गजल प्रस्तुत भेल।
आशीष अनचिन्हारक टूटा पोस्टमे दूटा गजल आएल।
त्रिपुरारी कुमार शर्माक एकटा पोस्टमे एकटा गजल आएल।
जनवरी मासमे अनचिन्हार आखरक दुराग्रहक कारणें त्रिपुरारी कुमार शर्मा जी मैथिली गजलमे एलाह


मास फरवरीमे कुल आठटा पोस्ट भेल जाहिमे------
आशीष अनचिन्हारक सातटा पोस्टमे एकटा आलेख आ छहटा गजल आएल।
डा. शेफालिका वर्माक एकटा पोस्टमे एकटा गजल आएल।


मास मार्चमे कुल अठारहटा पोस्ट भेल जाहिमे------
आशीष अनचिन्हारक छहटा पोस्टमे छहटा गजल।
गजेन्द्र ठाकुरक छहटा पोस्टमे छहटा गजल।
सुनील कुमार झाक दूटा पोस्टमे दूटा गजल।
अभय दीपराजक दूटा पोस्टमे दूटा गजल।
तारानंद वियोगी जीक एकटा पोस्टमे चंद्रभानु सिंह द्वारा गीत-गायनक विडीयो प्रस्तुति।
सदरे आलम गौहरक एकटा पोस्टमे एकटा गजल आएल।
मार्च मासमे सुनील कुमार झा अनचिन्हार आखरक माध्यमें मैथिली गजलमे एलाह।



मास अप्रिलमे कुल पचासटा पोस्ट भेल जाहिमे------
आशीष अनचिन्हारक एकतीसटा पोस्टमेसँ पच्चीसटा रुबाइ, दूटा कता, तीन टा गजल आ एकटा पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि।
सुनील कुमार झाक चौदह टा पोस्टमेसँ तेरहटा रुबाइ आ एकटा गजल अछि।
विकास झा "रंजन" केर टूटा पोस्टमे दूटा गजल।
रोशन केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल।
गजेन्द्र ठाकुरक दूटा पोस्टमे दूटा गजल आएल।
मास अप्रिलमे विकाश झा रंजन आ रोशन जी अनचिन्हार आखरक माध्यमे मैथिली गजलमे एलाह


मास मइमे कुल बासठिटा पोस्ट भेल जाहिमे------
आशीष अनचिन्हारक सत्ताइसटा पोस्टमे बाइसटा रुबाइ,तीनटा गजल, एकटा कता आ एकटा पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि।
सुनील कुमार झाक तैस (२३)टा पोस्टमे छहटा गजल,सोलहटा रुबाइ आ एकटा कता अछि।
किशन कारीगर जीक एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
गजेन्द्र ठाकुरक दूटा पोस्टमे एकटा गजल आ एकटा मैथिली गजल शास्त्र आलेख आएल।
विकास झा "रंजन" केर नौटा पोस्टमे सातटा रुबाइ आ दूटा रुबाइ अछि।


मास जूनमे कुल बत्तीसटा पोस्ट भेल जाहिमे------
आशीष अनचिन्हारक बीसटा पोस्टमे तीनटा गजल, नौटा रुबाइ, सातटा कता आ एकटा पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि।
सुनील कुमार झाक छहटा पोस्टमे तीनटा गजल आ तीन टा रुबाइ अछि।
दीपनारायण "विद्यार्थी"क दूटा पोस्टमे दूटा गजल अछि।
अरविन्द ठाकुरक एकटा पोस्टमे एकटा गजल आएल।
गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा पोस्टमे तीनटा गजल आएल।
मास जूनमे ऋषि वशिष्ठ आ अनचिन्हार आखरक माध्यमें दीप नारायण विद्यार्थी जी मैथिली गजलमे एलाह

मास जुलाइमे कुल पैंतीसटा पोस्ट भेल जाहिमे------
आशीष अनचिन्हारक उनतीसटा पोस्टमे सोलहटा गजल,आठटा रुबाइ, एकटा कता, मैथिली गजलक संक्षिप्त नामक आलेखक दू भाग, छंदक जरुरति नामक एकटा आलेख, आ पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि।
गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा पोस्टमे तीनटा गजल आ एकटा पोस्टमे एकटा कुंडलिया अछि।
अरविन्द ठाकुरक एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
रोशन केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।


मास अगस्तमे कुल तैंआलीसटा पोस्ट भेल जाहिमे------
रोशन केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
सुनील कुमार झा केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
अरविन्द ठाकुर केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
सदरे आलम गौहर केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
प्रवीन चौधरी "प्रतीक" केर चारिटा पोस्टमे चारिटा गजल अछि।
दीप नारायण "विद्यार्थी" केर दूटा पोस्टमे दूटा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक तैंतीसटा पोस्टमे एकैसटा गजल, दूटा रुबाइ, गजलक संक्षिप्त परिचय नामक आलेखक सात भाग, एकटा पोस्टमे विदेह भाषा पाक रचना आ दूटा पोस्टमे पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि। मास अगस्तमे प्रवीन चौधरी प्रतीक जी अनचिन्हार आखरक माध्यमें मैथिली गजलमे एलाह।

मास सेप्टेम्बरमे कुल चौसठिटा पोस्ट भेल जाहिमे------
उमेश मंडल केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
संजीव केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
विकास झा "रंजन" केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
सुनील कुमार झा केर एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
मिहिर झाक सातटा पोस्टमे सातटा गजल अछि।
ओमप्रकाश केर एगारहटा पोस्टमे एगारह टा गजल अछि।
गजेन्द्र ठाकुरक आठटा पोस्टमे चारिटा गजल, कुंडलिया दूटा, राजेन्द्र विमलक साक्षात्कारक एकटा विडीयो आ एकटा पोस्टमे आशीष अनचिन्हारक पोथी केर डाउनलोड लिंक देल गेल अछि।
दीपनारायण "विद्यार्थी" केर दूटा पोस्टमे दूटा गजल अछि।
सदरे आलम गौहरक तीनटा पोस्टमे तीनटा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक उनतीसटा पोस्टमे दसटा गजल, गजलक संक्षिप्त परिचय नामक आलेख सतरह भागमे, रुबाइ एकटा आ पुरस्कार संबंधी घोषणा एकटा अछि।
मास सेप्टेम्बरमे डबल धमाका। मिहिर झा एवं ओमप्रकाश जी अनचिन्हार आखरक माध्यमें मैथिली गजलमे एलाह।


मास अक्टूबरमे कुल पचपनटा पोस्ट भेल जाहिमे------
ओमप्रकाश जीक एगारहटा पोस्टमे एगारहटा गजल अछि।
सुनील कुमार झाक एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
विकास झा "रंजन"क एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
अभय दीपराज जीक एकटा पोस्टमे एकटा गजल अछि।
समयलाइ सलाम केर नामसँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक दूटा पोस्टमे राजेन्द्र विमलक साक्षात्कार विडीयो आ एकटा गजल "एक मिसिया"क विडीयो अछि।
गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा पोस्टमे मैथिली गजल शास्त्र केर एकटा भाग आ तीन टा गजल अछि।
मिहिर झाक एग्यारहटा पोस्टमे दसटा गजल आ एकटा गजल पर कविता अछि (इ कविता अपवाद स्वरुप अछि)
शांतिलक्ष्मी चौधरीक सातटा पोस्टमे सातटा गजल अछि।
सदरे आलम गौहर केर दूटा पोस्टमे दूटा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हार केर सोलहटा पोस्टमे चौदहटा गजल, एकटा आलेख आ एकटा पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि।
मास अक्टूबर अनचिन्हार आखर लेल गौरवक दिन रहत। कारण ऐ मासमे शांतिलक्ष्मी चौधरी जी अनचिन्हार आखरक माध्यमसँ मैथिली गजलमे एलीह आ ऐ तरहें शेफालिका वर्मा जीक बाद शांति जी मैथिली दोसर महिला गजलकार बनि गेलीह।


मास नवम्बरमे कुल सनतावनटा पोस्ट भेल जाहिमे------
ओमप्रकाशक उन्नीस पोस्टमे उन्नीसटा गजल, शांतिलक्ष्मी चौधरीक तीनटा पोस्टमे तीनटा गजल, मिहिर झाक आठटा पोस्टमे आठटा गजल,विकास झा "रंजनक" दूटा पोस्टमे दूटा गजल, त्रिपुरारी कुमार शर्माक एकटा पोस्टमे एकटा गजल, विनीत उत्पलक दूटा पोस्टमे दूटा गजल, भावना नवीनक चारिटा पोस्टमे चारिटा गजल, भाष्कर झाक एकटा पोस्टमे एकटा गजल, जगदीश चंद्र "अनिल" जीक छहटा पोस्टमे छहटा गजल, रवि मिश्रा "भारद्वाज"क दूटा गजल, जगदानंद झा "मनु"क तीनटा पोस्टमे तीनटा गजल, अजय ठाकुर"मोहन"जीक तीनटा पोस्टमे तीनटा गजल, सदरे आलम गौहरक एकटा पोस्टमे एकटा गजल आ आशीष अनचिन्हारक एकटा पोस्टमे पुरस्कार संबंधी घोषणा अछि।
मास नवम्बरमे जे सभ अमचिन्हार आखरक माध्यमसँ मैथिली गजलमे एलाह तिनक नाम अछि---विनीत उत्पल, श्रीमती भावना नवीन, भाष्कर झा, रवि मिश्रा "भारद्वाज", जगदानंद झा "मनु", अजय ठाकुर"मोहन"। मने सिक्सर धमाका।

दिसम्बर मासमे कुल पचहत्तर टा पोस्ट भेल जाहिमे------
श्रीमती शांतिलक्ष्मी चौधरीक एगारहटा पोस्टमे एगारहटा गजल अछि।
जगदानंद झा "मनु" केर चारिटा पोस्टमे चारिटा गजल अछि।
ओमप्रकाश जीक अट्ठारहटा पोस्टमे सोलहटा गजल आ दूटा रुबाइ अछि।
प्रभात राय "भट्ट" केर नौटा पोस्टमे आठटा गजल आ एकटा रुबाइ अछि।
अजय ठाकुर मोहन केर आठ टा पोस्टमे आठ टा गजल अछि।
अनिल जीक तीन टा पोस्टमे तीन टा गजल अछि।
रवि मिश्रा "भारद्वाज" केर तीन टा पोस्टमे तीन टा गजल अछि।
मिहिर झाक आठ टा पोस्टमे आठ टा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हार केर एगारहटा पोस्टमे रुबाइ दूटा, पुरस्कार संबंधी घोषणा दूटा, एकटा गजल अछि। संगहि संग श्रीमती इरा मल्लिक आ मनोहर कुमार झा एक-एकटा गजल, प्रवीन नारायण चौधरीक एकटा रुबाइ प्रस्तुत कएल गेल अछि। दूटा पोस्ट अपने एना अपने मूँह सँ अछि। आ एकटा पोस्टमे विदेह द्वारा चलाओल परिचर्चा अछि।
मास दिसम्बरमे अनचि्हार आखरक माध्यमसँ जे मैथिली गजलमे एलाह तिनक नाम छन्हि--- प्रभात राय "भट्ट", अनिल, श्रीमती इरा मल्लिक आ मनोहर कुमार झा। मने चारि गोटा।

इ आलेख नीक जकाँ देखि-सूनि कए बनाएल गेल अछि तथापि बहुत संभव जे कतहुँ गलती होइक पाठक आ शोधार्थीसँ आग्रह जे तकरा सुद्धि करबामे योगदान करथि।


(श्रीमती रुबी झा जीक सभ पोस्ट हटा देल गेल अछि। हुनक रचना अ-मौलिक सिद्ध भेल अछि। हमर ई कहब नै जे हुनक सभ रचना एहने सन हेतन्हि मुदा ई हुनक अधिकांश रचना लेल अछि।

सादर
सम्पादक
 22/1/2013)

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों