Tuesday, 14 January 2014

गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2013 ( बाल गजल )

हमरा सूचित करैत इ परम हर्खक अनुभव भए रहल अछि जे अनचिन्हार आखर द्वारा प्रस्तुत गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल )बर्ख 2013 लेल ओस्ताद अमित मिश्र जीक मास जनवरीमे प्रकाशित हुनक बाल गजलकेँ देल जा रहल अछि। हुनका बधाइ। एहि सालक मुख्यचयनकर्ता छलाह ओस्ताद परमेश्वर कापड़ि । हुनका धन्यवाद।
प्रस्तुत अछि ओस्ताद परमेश्वर कापड़ि जीक टिप्पणी जे की हमरा मेलपर पठाएल गेल अछि।
बालगजल विमर्श

मैथिली गजलक कहबैका बडैता आशीषजी खूब बेसी चिन्हल–जानल काव्य–पुरुष छथि, एहन रचनाधर्मी मुखपुरुख “अनचिन्हार” कोना भ’ सकैछ? गजलके अपन खास प्राविधिक शब्द–भाव होइते अछि । उर्दू-फारसीसँ हिन्दी होइत, गजल मैथिलीक रचनाधर्मी अंगनइ धएने अछि आ शुरुमे ई प्रेम–विछोह, राग–विरोग, हास्य–रोदन, कुन्ठा–संत्रास आदिके गढने–मढने चतरल, पसरल विश्व परिभ्रमण करैत रहल । मैथिलीमे एकर भाव–भंगिमा आ विषय परिदृष्य बेछप रहल अछि । युगीन–सत्य, लोकयथार्थ आ समकालीन सन्दर्भक गुण–वानि आ लेप–रंग लागल अछि । एहनमे कहल जा सकैछ जे मैथिली गजल–संसारक ऐतिहासिकता आ रचनाधर्मीताक अपन खास व्याकरण, परिधि आ परिधान रहल अछि ।
मैथिली बाल संसारक अपन खास पहचान  आ पहुँच रहल अछि । ई बहुत मनभावन, सरस आ मधुर बोल–भासक रहने, बालसंसारमे बहुत प्रचलित रहल अछि । एते होइतो आधुनिक बालगीतक सभटा जड़ि–मूल बाल लोक–भाषा, बाल–मनोविज्ञान आ बालबोध, खेल संचेतना एकरा सङ लागल रहल अछि । इएह कारणे बाते बालगीतक अलग सिद्धान्त ओ व्याकरण खास नहि रहल अछि । बालगजलक रचना परम्परा बहुत एम्हर अस्तित्वमे आएल अछि । ईहो बहुत महत्वपूर्ण सत्य–तथ्य अछि जे बाल गजलक शास्त्रीयता आ सौन्दर्य–विज्ञानक संद्धान्तिक चर्चा–परिचर्चा एतए नहि भेल करैछ । बालगजल लेखनक जे परम्परा प्रचलनमे रहल अछि ओ गजलके अन्भुआर देखा दिखीस’ । एहनमे, काव्य विषयक हमरा सन लोथ–भोंथ भकोलके लेल बालगजल विषयपर मुह खोलब, गाल बजाएब होएत । आ अपने चिन्हार होइतो हमरा, अनचिन्हार कहि परिचय देनिहार आशीष अनचिन्हारजी ५टा गजल पठा एहिपर मन्तव्यात्मक विचार देवाक लेल कहिक’ दुबिधा, दूमाङिमे ध’ देल अछि ।
प्रेषित गजलपर चर्चा करबासँ पहिने एक दूटा बात आओर अपनेके मन पाड़ि दी । बालपन, नेनपनसँ मातल रहैत अछि । अपूर्व कल्पना शक्ति आ अपन खास भाव–जगत होइत छै । बच्चा गाछ–वृक्षसँ बतिया सकैछ । ओएह बालुएके दालि–भातक भोज खा’-खिया सकैछ । ठेङे लाठीके घोड़ा आ पिढ़ीएके मोटर, पिटने मुसराके बौआ आ लते–कपड़ाके कनिया–वर स’ खेलि सकैत अछि । चन्दामामाके खीर–पुरीके भार आ परी–निनियाके झुला मचकीस’ रमा’ अघा सकैत अछि । एकर प्रत्येक खेल लीलामय होइछ आ रसके हिसाबस’ बालगीतमे छौटा रस मात्रे होइछ । सौन्दर्य, विरह, विभत्सादि रसके ओकरा कोनो लेन–देन, माने मतलब नहि रहैछ । ओकर प्रत्येक खेल लीलामय होइछ आ सब खेलके खेल गीत होइत अछि ततबे नहि प्रत्येक वय आ विद्याक गीतके अलग–अलग शब्द भास होइछ । एहि सव कारणे शिशुगीत, बालगीत, बाल खेलगीत आ युवागीत–साहित्य होइत । हमरा जनिते ई सब गजल युवा साहित्यक अन्तरगत अबैत अछि ।
समकालीन रचनाधर्मीताक विषय–परिदृश्य आ भावमूमिक सौन्दर्य–व्याकरणमे युग–सत्य, लोकयथार्थ, सामाजिक सौन्दर्य तथा आन्दोलन परिवर्तनक आकांक्षा तथा अनुरागक ताव–तबर देएमे अबैछ । एहि क्रममे एहि पाँचो गजलके अंटकारने, परेखने बिचला तीन गजल सीझल, सपरल नहि लगैछ । पहिलुका गजल “दू टा बस सोहारी चाही माँ कम्मे त तरकारी चाही” सुन्नर आ महत्वपपूर्ण लगैत अछि । नजरि आ मूल्यांकनक दृष्टि आ दृष्टिकोण व्यक्ति, विद्या आ संस्कार–संस्कृति सापेक्ष होइछ । तएँ कोनो टिप्पणी एवं समीक्षा अन्तिम, परम नहि होइछ । तैयो एतेक त’ कहल जा सकैछ जे सांस्कृतिक उत्कर्ष, जातिए राग रंगमे मातल बोरल, पावनि अति महत्वपूर्ण आ पावन होइछ । एकरे सुन्नर सुभक रंग–भासमे साजि सीटिक’ गढल अमितक गजल बहुत उत्कृष्ट आ बाल मनभावन अछि –
उपहार लेने तँ आबै पावनि कते
हँसनाइ सदिखल सिखाबै पावनि कते

टिकरी बनै आ बनै पेड़ा परिकिया
तें लेर सबहक चुआबै पावनि कते

फूटै कतौ फट्टका आ अरिपन बनै
घरमे बगैंचा सजाबै पावनि कते

सब लोक आबैछ पावनिमे घर अपन
बिछुरल अपनकें मिलाबै पावनि कते

प्रतियोगितामे देल गेल ई ५टा गजल एना अछि---



दू टा बस सोहारी चाही
माँ कम्मे तरकारी चाही

पुरना छिपलीमे नै खेबौ
हमरो नवका थारी चाही

हमहूँ जेबै इसकुल बाबू
पूरा सभ तैयारी चाही

हाटसँ आनू पोथी-बस्ता
मौजा-जूता कारी चाही

इसकूलक जलखैमे हलुआ
पूरी आ तरकारी चाही

छीटब बीया गाछो रोपब
आँगन लग फुलवारी चाही

"नवल"सँ नै हम लट्टू माँगब
हमरो कठही गाड़ी चाही
 मात्रा क्रम : आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे

        
फेर एलै दिवाली लेबै फटक्का
फोरबै मिल कए सभ मारत ठहक्का

बड़ रमनगर बुस’ट नव अनलन्हि मामा
देखते सभ भऽ गेलै कोना कऽ बक्का

घीक लड्डू दुनू हाथे दैत भरि भरि
अपन बेटाक कोजगरामे तँ कक्का

दौड़ चलबैत सासुरकेँ फटफटिया
हरसँ भरि थालमे सौंसे फसल चक्का

आइ कुसियारक ट्रककेँ परल पाँछा
संगमे ‘मनु’क गामक छौंड़ा उचक्का

(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)


तिला संक्रातिकेँ खिच्चैर खाले रौ हमर बौआ
ल’जेतौ नै तँ कनिए कालमे ओ आबिते कौआ

चलै बुच्ची सखी सभ लाइ मुरही किन क’ आनी
अपन माएसँ झटपट माँगि नेने आबि जो ढौआ

बलानक घाट मेलामे कते घुमि घुमि मजा केलक
किए घर अबिते मातर बुढ़ीया गेल भय थौआ

कियो खुश भेल गुर तिल पाबि मुरही खुब कियो फाँकेँ
ललन बाबा किए झूमैत एना पी कए पौआ

सगर कमलाक धारक बाटमे बड़ रमणगर मेला
सभ कियो ओतए गेलै कि भेलै ‘मनु’ कुनो हौआ

(बहरे रमल, मात्रा क्रम १२२२-१२२२-१२२२-१२२२)
जगदानन्द झा 'मनु'


इमली उपर चढ़ि भूत बैसल रहै छै
की राति भरि तेँ गाछ जोरसँ बजै छै

पाथर किए उठि जाइ छै पानिमे कह
हल्लुक उतप्लावन बलसँ बड लगै छै

लागैछ खेलक बाद बड भूख सबकेँ
ई खेल सबमे बहुत ऊर्जा जड़ै छै

एना किए दिन राति सब होइ छैकह
धरती सदति सूरजक चक्कर घुमै छै

ई जाड़ गर्मी सब कखन होइ छै कह
सूरज जखन लऽग दूर जा जा बसै छै

मुस्तफइलुन-मुस्­तफइलुन-फाइलातुन
2212-2212-2122
बहरे-सरीअ


उपहार लेने तँ आबै पावनि कते
हँसनाइ सदिखन सिखाबै पावनि कते

टिकरी बनै आ बनै पेड़ा परिकिया
तेँ लेर सबहक चुआबै पावनि कते

फूटै कतौ फट्टका आ अरिपन बनै
घरमे बगैचा सजाबै पावनि कते

सब लोक आबैछ पावनिमे घर अपन
बिछुरल अपनकेँ मिलाबै पावनि कते

नव रंगमे सजल आँगन लागै "अमित"
नेनाक छुट्टी बनाबै पावनि कते

मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
2212-2122-2212

1 comment:

  1. ओस्ताज ओमप्रकाशजी आ ओस्ताज अमितजी दुनू गोटेकेँ बहुत-बहुत शुभकामना आ बधाइ.......

    ReplyDelete

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों