शनिवार, 15 सितंबर 2012

गजल

गजल

फेर गजलक धार चलतै
खेत परती फार चलतै

शब्दकेँ जे बाण बनतै
भावकेँ तलवार चलतै

पूल जखने मोन जोड़त
नेह भरि पेटार चलतै


देह टूटल पेट भूखल
दर्द कऽ स्वीकार चलतै

बाप देखू हारि गेलै
पूतकेँ अधिकार चलतै

टाट खसलै बाट बनलै
राति कतऽ ओहार चलतै*

राति रानी जागि जेतै
फेर ओ श्रृंगार चलतै

फाइलातुन
2122 दू बेर
बहरे-रमल

* जतऽ सरकार घर तोड़ि सड़क बनबैत अछि ओतऽ ओहि घरक लोक लेल ई शेर अछि ।

गजल

बाल गजल-52

नै खाएब रमतोरइ लस लस करै छौ
नै चाही करैला ओ तीते रहै छौ

भांटामे तँ बड बीया तेँ नीक नै छौ
नै दे ओलकेँ सन्ना कब कब लगै छौ

झिमनी नै चिबेबौ घिउरा नै पचेबौ
कोबी आब नै खेबौ बाँतर करै छौ

ई सोहिजन गाछक फुनगीपर फड़ै छौ
बालूकेँ परोरो बड कच कच करै छौ

खेबौ मात्र तरकारी मीठगर जे छौ
भेटै बारहो महिना आलू पचै छौ

2221-2222-2122

रूबाइ

रूबाइ-126

बोखारसँ हम मरि रहल छी यै सजनी
तैयो हम तँ अखरि रहल छी यै सजनी
परदेशक काज हम तँ केलौँ साल भरि
छै छुट्टी तँ झगड़ि रहल छी यै सजनी

गजल

गुरूवर आ पाठकक अभारी छी ।आशीषक आशाक संग प्रस्तुत कऽ रहल छी पचासम बाल गजल

बाल गजल-50

हरियर भांगकेँ घोटलनि खट्टर कका
केलनि मेहनत तेँ तऽ छथि छरहर कका

भोजक नाम सुनि गप करै छथि अजगुते
दतमनि आनलनि छोट सन कोपर कका

गाछक तोड़ि लेलनि कते कटहर नरम
हमरा लेल बड तोड़लनि बरहर कका

पढ़बै छथि गणित भेद इतिहासक अपन
पाड़ै मोन मिथिलाक सब सोहर कका

झटपट चलब जखने खसब चुप्पे हँसथि
तखने "अमित" कोरा धरथि सुन्नर कका

मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन
2221-2212-2212
बहरे-कबीर

अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-51

झटकिकेँ चलल बुचिया भरि अंगनामे
मीठ बाजै पयलिया भरि अंगनामे

आँखि चंचल दुनू काजर सजल कारी
माँथपर ठोप करिया भरि अंगनामे

चानकेँ रूप सूरजकेँ तेज देखू
ठोरकेँ रंग ललिया भरि अंगनामे


पकड़ि लै छै कते तितली पाँखि चाही
खाइ छै माँटि बुचिया भरि अंगनामे

दूधमे मीठ आ मुँहमे भात चाही
"अमित" छै मीत बछिया भरि अंगनामे

फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन
2122-1222-2122
बहरे-असम

अमित मिश्र

गजल


बाल गजल-49

आइ बौआ चलेँ जंगल घुमै लेए
शेरके राजपर पोथी लिखै लेए

डरक नै बात ओकर मन सजीबक छै

चलब हाथीक साक्षात्कार लै लेए

बाल एखन भविष्यक शेर छेँ बौआ
स्वर्ण आखरसँ इतिहासो रचै लेए

बाटमे छै पहाड़ो पैघ वर्फक रौ
चल तऽ वर्फक अजब खेला करै लेए

बैसले घर अपन जंगल घुमब एखन
बैस जो "अमित" तूँ चंपक पढ़ै लेए

फाइलातुन-मफाईलुन-मफाईलुन
2122-1222-1222
बहरे-मुशाकिल

अमित मिश्र

रुबाइ

बाल रूबाइ-13

दुर्गा माँकेँ पूजा आबि गेलै माँ
तोहर पूजा आब कहिया हेतै माँ
जननी नाम तोरो तँ छै लिखल देखेँ
मुर्ती तोहर बनि कऽ कहिया सजतै माँ

रुबाइ

बाल रूबाइ-12

बौआ आँगनक माँटिमे लेटाइ छै
कखनो चोरा कऽ माटिये खा जाइ छै
खपटाकेँ नोँक जखन गड़लै देहमे
जोरसँ छटपटाइत तखन चिचियाइ छै

रुबाइ

बाल रूबाइ-11

पानक लाली लगै पाकल ईटा सन
नाङरि छै पतंगक केशक फीता सन
बाबा जी जे बच्चाकेँ पकड़ि लऽ जाइ
हुनकर केश-दाढ़ी अनमन खोँता सन

रुबाइ

बाल रूबाइ-10

छुट्टी भेलै चल खेलब खेल कबड्डी
उठ्ठा बजरम नै करेँ टूटत हड्डी
खेलेमे नाम करब हम अकाशमे
माए गै कमाएब खेलोसँ गड्डी

रुबाइ

बाल रूबाइ-9

चन्ना मामा लऽग किए नै आबै छै
खोआ संगमे पुआ नै बनाबै छै
बाबू छथि विदेशमे तैयो फोन करै
तारा नाना सब दिन मुँह देखाबै छै

रुबाइ

बाल रुबाइ-8

तरकारीमे नोन नै चिन्नी दे ने
भातक संगे माँड़ भरि बाटी दे ने
पाकल कटहरक कुआ फसलै कंठमे
काँचे बरहर काँच नारंगी दे ने

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

चंदन कुमार झा जीक गजल हुनक अपनहि स्वरमे

गजल


भीख नै हमरा अपन अधिकार चाही
हमर कर्मसँ जे बनै उपहार चाही

कान खोलिकऽ राखने रहऽ पडत हरदम
सुनि सकै जे सभक से सरकार चाही

प्रेम टा छै सभक औषध एहिठाँ यौ
दुखक मारल मोनकेँ उपचार चाही

सभ सिहन्ता एखनो पूरल कहाँ छै
हमर मोनक बाटकेँ मनुहार चाही

"ओम" करतै हुनकरे दरबार सदिखन
नेह-फूलसँ सजल ओ दरबार चाही
बहरे-रमल
दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ (फाइलातुन) - प्रत्येक पाँतिमे तीन बेर

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

भोथ हथियार



श्री सुरेन्द्र नाथक कहल मैथिली गजलक संग्रह अछि "गजल हमर हथियार थिक"। ऐ पोथी मे हुनकर अडसठि टा गजल प्रकाशित भेल अछि। ई संग्रह २००८ मे आएल अछि जकर आमुख श्री अजीत आजाद जी लिखने छथि। ऐ पोथी केँ आदि सँ अन्त धरि पढबाक बाद हमर यैह अभिमत अछि जे गजलक व्याकरणक दृष्टिसँ ऐ संग्रह मे अनेको कमी अछि, जाहि सँ बचल जा सकैत छल।

पृष्ठ संख्या १३, ६७ आ ७० परहक गजल मे चारिये टा शेर छै, जखन की कोनो गजल मे कम सँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही। संग्रहक कोनो गजल बहर मे नै अछि। हमर ई स्पष्ट मनतब अछि जे गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे बहरक उल्लेख करबाक चाही आ जँ आजाद गजल कहने छथि तँ इहो स्पष्ट रूपेँ लिखबाक चाही।

ऐ पोथी मे काफियाक गलती भरमार अछि। कतौ कतौ तँ ई बूझना जाइ छै जे गजलकार बिना काफिया आ रदीफक मतलब बूझने गजल कहबा लेल बैस गेल छथि। एकर उदाहरण पृष्ठ १५ परहक गजल पढबा पर भेंट जाइ छै। ई तँ हम एकटा उदाहरण कहि रहल छी। आरो गजल ऐ दोख सँ प्रभावित छै, जतय काफियाक नियमक धज्जी उडा देल गेल अछि। जेना पृष्ठ १८, १९, २०, २१, २७, २९, ३१, ३४, ३५, ३६, ३९, ४०, ४१, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ५२, ५३, ५६, ५७, ५८, ६६, ६७, ६८,७०, ७१, ७२, ७४, ७५,७७, ७९ आदिमे काफिया तकलासँ नै भेंटैत अछि आ ऐ खोजमे मोन अकच्छ भऽ जाइत छै। ओना आनो पृष्ठ काफिया दोखसँ ग्रसित अछि, मुदा ई उदाहरण हम ओइ पृष्ठ सभक देने छी, जतय काफियाक झलकियो तक नै भेंटै छै। मैथिली गजल आइ जाहि सोपान पर चढि चुकल अछि, ओइ हिसाबेँ ऐ तरहक रचना गजलक नामसँ स्वीकृत होइ बला नै अछि। कियाक तँ बिना दुरूस्त काफियाक गजल नै भऽ सकैत अछि। ई संग्रह "अनचिन्हार आखर" युगक शुरूआत भेलाक बाद लिखल गेल अछि, तैँ हमरा ई आस छल जे गजलकार कमसँ कम काफिया आ रदीफक नियमक पालन ठीकसँ केने हेताह, कियाक तँ "अनचिन्हार आखर" जुग मे आब गजलक व्याकरणक सभ नियम चिन्हार भऽ चुकल अछि। मुदा गजलकार काफिया आ रदीफक नियम पालन करबामे पूरा असफल रहलथि। ओना ऐ संग्रहक काफिया दोखकेँ पोथीक आमुख लेखक श्री अजीत आजाद पोथीक आमुखमे दाबल आवाजमे स्वीकार करैत कहै छथि जे कतेको ठाम काफिया "गडबडायल सन" बुझना जाइत अछि। ओना ई अलग गप थिक जे काफिया "गडबडायल सन" नै अपितु पूरा पूरी गडबडायल अछि। फेर श्री आजाद ऐ गलतीकेँ झाँपबा लेल इहो कहैत छथि जे "रचनाकारकेँ अपन सीमासँ बाहर आबि शब्द-व्यापार करबाक चाही"। मुदा गजलक अपन व्याकरण छै, जकर पालन केने बिना रचना गजल नै भऽ कऽ पद्य मात्र रहि जाइत छै। गजल आ कविताक बीचक अंतर जे अंतर छै, से ऐ तरहक तर्कसँ समाप्त नै भऽ जाइ छै। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक अनुपालन नै हेबाक कारणेँ श्री सुरेन्द्र नाथक ई संग्रह गजल संग्रह नै भऽ कऽ एकटा पद्यक संग्रह भऽ कऽ रहि गेल अछि।

संवेदनाक स्तर पर किछु रचना नीक अछि आ जँ गजलकार गजलक व्याकरण पर धेआन देने रहतथिन्ह, तँ नीक गजल लिखि सकैत छलाह। गजलकारक ई पहिलुक मैथिली गजल संग्रह बहुत आस तँ नै जगबैत अछि, मुदा हुनकर संवेदनात्मक प्रतिभा देखैत हम ई आस जरूर करै छी जे ओ गजलक व्याकरणक पालन करैत आगू नीक गजल कहताह आ "गजल हमर हथियार थिक" केँ चरितार्थ करताह। गजल तँ हथियार होइते अछि, मुदा बिनु काफिया, रदीफ आ बहरक नियमक पालन केने रचना गजल नै होइत अछि आ भोथ हथियार भऽ जाइत अछि। पद्यक हथियार पर काफिया आ बहरक सान चढल हुनकर नब गजल-हथियारक प्रतीक्षा रहत।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

गजल


मनुखक एहि दुनियाँमे कोनो मोल नहि रहल 
हमरा लेल केकरो लग  दूटा बोल नहि रहल 

बजाएब  कतए ककरा  सभटा साज टूटिगेल 
छल एकटा फूटल ओहो आब ढोल नहि रहल 

सभतरि घुमैत अछि   मनुखक भेषमे हुडार
नुकाबै लेल ओकरा लग कोनो खोल नहि रहल  

रातिक भोजन ओरिआनमे माएक मोन अधीर 
छल हमर बाड़ीमे एकटा से ओल नहि रहल 

हँसैत आ मुस्काइत रहए जतएकेँ लोकसभ   
मिथिलाक गाममे 'मनु' आब ओ टोल नहि रहल 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९) 

शनिवार, 8 सितंबर 2012

गजल


होए मोन हरखीत ढोलो सोहाइ 
नै बिनु कारने मीठ बोलो सोहाइ 

प्रियगर भेट नवकी कनियाँ गेलै जँ 
हाथक हुनकर नोनगर ओलो सोहाइ 

जेबीमे जखन भरल रुपैया होइ
तहने महग सस्ताक मोलो  सोहाइ 

सिम्बर तूरकेँ नीक गदगर मसलंग 
सुन्नर ओहिपर आब खोलो सोहाइ 

भरि सन्दूक घर जाहिमे भेटै सोन 
एहन घरक महकैत झोलो सोहाइ 

(बहरे हमीद, २२२१-२२१२-२२२१)

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

गजल

बाल गजल-48

बाबू पाँच टाका अछि जँ खैनी ठोर तऽर दै लेल
तैयो आनलौँ नै रंग पोथी टास बनबै लेल

हमरा कहब गणितक सूत्र नव तै लेल नै अछि समय
बाँचै लेल खिस्सा बड समय अछि ताश खेलै लेल

लेलौँ अपन कोरा की इयादो अछि कने सोचू तँ
महिसेमे रमै छी नै तँ गेलौँ घास काटै लेल


भानसमे तँ माए ओझरेलै हमर नै छै ध्यान
बाबा स्वर्ग बाबी छै सिमरिया मास मनबै लेल

रोटी दिअ बरू एगो हमर ई रंग नै दिअ आनि
आबू आब बाबू "अमित" संग प्रेम बाँटै लेल

मफऊलातु[ 2221] चारि बेर सब पाँतिमे

अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-47

भूक भूका रहल छै ई भगजोगनी
पाकरिक गाछपर छै जगमग ओढ़नी

लटकि गेलै हमर गुड्डी ऐ गाछपर
दे खसा धीरेसँ गै जाड़न तोड़नी

पेँचमे बड पेँच लड़तै आकाशमे
कटि कऽ खसतै नाचिते जेना मोरनी

आगि लागल रातिमे बड़का बाधमे
पैघ सिरकट्टा छलै वा छल भूतनी

भाइ रै काजर कते पैडर भरल छै
देख ने माएक टीनक मुँहपोछनी

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
2122-2122-2212
बहरे-जदीद

अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-46

डम डम कऽ डमरू जखन बाजऽ लागल यौ
हल्ला कऽ नेना सड़कपर तऽ दौड़ल यौ

शाइत मलाईवर्फके लऽ एलै यै
तेँ बालि मकईके लऽ आइ भागल यौ

खेला बला भालूक संग एलै यै
वा कपड़िया कपड़ा लऽ फूल पाड़ल यौ

बाबा चलू बाबी चलू किनब घोड़ा
झाँसीक रानी पूतके लऽ बैसल यौ

गरमी बहुत छै कंठ सूखि गेलै यै
कोला पियब चल "अमित" भरल बोतल यौ

मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-मफाईलुन
2212-2212-1222

अमित मिश्र






गजल

गजल

सुख भरल संसार चाही
हमर सब अधिकार चाही

धार शोणित संग बहतै
बायुमे टंकार चाही

नै महल गाड़ी नम्हर नै
छोट सन ओहार चाही

नै दहेजक माँग राखब
बस मखानक भार चाही

दैव नै देखै मनुख केँ
भगतकेँ गोहार चाही

चुल्हि अलगे भाइ केलक
माइ के पेटार चाही

नीक कनियाँ संग लुरि बुधि
दोखदर नै सार चाही

फाइलातुन
2122 दू बेर

बहरे रमल

अमित मिश्र

गजल

गजल

अपहरण भेल अछि हमर किस्मतकयौ
नीक नै भेल छै लिखल पाथरक यौ

भेँटकेँ मीठ लाबा बनल छै मनुख
पेट कतबो भरै काज लेबरक यौ

तुच्छ नै होइ छै छोट सब बस्तु यौ
मोल कखनो बहुत गरल विषधरक यौ

छै मलेमास लागल अपन देशपर
कोयला नोट छीनैछ धारकक यौ

क्रोधमे दुर्दशा देख लिअ ने "अमित"
घेँट अपने कटल धार शोणितक यौ

फाइलुन चारि बेर
212-212-212-212
बहरे-रमल

अमित मिश्र

गजल

गजल

चुपचाप बैसल छी एकातमे
छै मोन मारल हमर प्रातमे

भेलै लऽ कर्जा बेँउँत भोजकेँ
भीड़सँ पड़ल किछुओ नै पातमे

खैनी चुना मिथिला बुधियार छै
बेचलक घर भांगसँ लऽकऽ भातमे

आलस कने छोरु देखू तखन
केहन मजा घामक बरिसातमे

चुप्पा बनू नै चुप्पी तोड़ि दिअ
साहसक संगे चल निर्यातमे

पार्टी खसै फेरो हँसिते उठै
आचरण खसतै लोकक बातमे

2212-22-2212

अमित मिश्र

गजल

गजल

अपहरण भेल अछि हमर किस्मतकयौ
नीक नै भेल छै लिखल पाथरक यौ

भेँटकेँ मीठ लाबा बनल छै मनुख
पेट कतबो भरै काज लेबरक यौ

तुच्छ नै होइ छै छोट सब बस्तु यौ
मोल कखनो बहुत गरल विषधरक यौ

छै मलेमास लागल अपन देशपर
कोयला नोट छीनैछ धारकक यौ

क्रोधमे दुर्दशा देख लिअ ने "अमित"
घेँट अपने कटल धार शोणितक यौ

फाइलुन चारि बेर
212-212-212-212
बहरे-रमल

अमित मिश्र

गजल

गजल

ट्रेन चलि चुकल अछि
समय नै थम्हल अछि

मास कोनो मुदा
ज्वार बड उठल अछि

दोष नै हमर दिअ
किस्मते जड़ल अछि 


धार उलटे बहल
नाह नै चलल अछि

बेँग छै साँप छै
दोस्त के बनल अछि

माँटिमे प्राण नै
गाछ नै फड़ल अछि

मोनमे मीत नै
बैर बड भरल अछि

फाइलातुन दू बेर
212-212
बहरे-रमल

अमित मिश्र

रुबाइ

बाल रुबाइ-7

पीठपर झोरा और हाथमे बोरा
बौआ चलल इस्कूल लऽ पोथी जोड़ा
कारी सिलेट चारि टा उजरा पेन्सिल
संगी बनि नीक पेन्सिल देतौ तोरा

रुबाइ

बाल रूबाइ-6



हे गै करिकी गाय गरम दूध दे ने
तोरो दऽ दै छी हरियर जनेर ले ने
देबेँ दूध तऽ दही पेड़ा घी खेबौ
मानेँ मैया नै तऽ उपास भेले ने

गजल


बाल गजल-45

बेटी हम अपन गामकेँ
भूखाएल नै नामकेँ

पवनसँ गप करै छी हमहुँ
जानी हाल आसामकेँ

शेयर खेल मंडी जते
घटना पढ़ल सब ठामकेँ

अपने मनसँ हाथो पियर
बंधन तोड़लौँ झामकेँ

कतबो हमर छोटे उमरि
सोती ज्ञानकेँ धामकेँ

मफऊलात-मुस्तफइलुन
2221-2212
बहरे-मुक्तजिब

अमित मिश्र



रुबाइ

बाल रुबाइ-5

बौआ रे चोरी नै करबाक चाही
सदिखन पैघक बात मानबाक चाही
बुचिया तोहर नाम हेतौ दुनियाँमे
अपनामे कखनो नै लड़बाक चाही

रुबाइ

बाल रूबाइ-4

भोरक नव लाल इजोत छेँ तूँ बुचिया
देशक जीत लेल खेलाड़ी तूँ बौआ
माँ बाबूक लाठी साँस तूँहीँ तऽ छेँ
उड़िया नै मातल हवामे तूँ बेटा

रुबाइ

बाल रूबाइ-3

पोथी पढ़ब इस्कूलमे मोनसँ आइ
खेबै खूब इमली तोड़ि गाछसँ आइ
खेलब साँझमे कबड्डी खूब दौड़ब
ज्ञानक बात सीखब हमहुँ खेलसँ आइ

गजल

बाल गजल-44

बौआ हमर छै कमौआ
कहिया कमाओत चौआ

फैशन बढ़ल बाल मनमे
कपड़ा किनै चमचमौआ

चटनी अचारक अमल नै
खाली दियौ दूध पौआ

जागल लगै फूल सन ओ
सूतल कली बनल बौआ

हिम्मत ककर लेत कोरा
छै वयस जे जल पटौआ

मुस्तफइलुन-फाइलातुन
2212-2122
बहरे-मुजास

अमित मिश्र






रुबाइ

बाल रूबाइ-2

बड़का पोखरि पोखरिमे बड माँछ छै
मलहा जालसँ बौआ बंशी लऽ मारै
बड़का माँछ फँसै छै महाजालेमे
बौआ मात्र टेँगरा पोठिये पकड़ै

रुबाइ

बाल रूबाइ-1

बौआ कान नै चोरबा आबि जेतै
चन्ना गेलै सूतऽ फेर काल्हि एतै
बौए लेल जागल छै आब तरेगण
भोरे सूर्यक संग गीत नाद हेतै

रूबाइ

रूबाइ-125

हमरा अपन करेजक झपना बना लिअ
कोनो सिनेह पात्रक नपना बना लिअ
दिनमे पड़ब मोन नै तऽ की भेल मुदा
एते करु जे रातिक सपना बना लिअ

गजल


बेलगोबना नहि सुनलक गप्प
ओकर माथसँ बेल खसल धप्प

बरखा बुनि ल' क' एलै कारी मेघ
पएर तर पानि करे छप्प छप्प

बोगला भेल देखू कतेक चलाक
एके पएरे करे दिन भरि जप्प

बुढ़िया नानीकेँ दुनू काने हरेलै
चाह पीबे भरि दिनमे दस कप्प

बैस 'मनु' झोँटा छटा ले चुपचाप
नै तँ काटि देतौ कान हजमा खप्प

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)

गजल


सुख भरल संसार चाही
दुखक नै अंबार चाही

मोन सदिखन खूब हरखे 
बमक नै टंकार चाही

भरल घर मिथलाक ज्ञानसँ 
अन्नकेँ भंडार चाही 

डोलि अम्बर फूल बरखे 
भक्तकेँ झंकार चाही  

सभ कियो 'मनु' हँसिक' भेटे 
एहने संसार चाही  
 
बहरे रमल, (२१२२-२१२२)  

बुधवार, 5 सितंबर 2012

मास अगस्त 2012क लेल गजल सम्मान योजनाक पहिल चरण



हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक पहिल चरण बर्ख-2012 ( मास अगस्त लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास अगस्त लेल जगदानन्द झा 'मनु'जीक एहि रचना के चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ।


रुबाइ

कोन बिधि मरि कs हम रुपैया कमेलहुँ
सुख चेन निन्न रातिकेँ अपन हरेलहुँ
जन्मक अपन सभ सम्बन्ध तियागि
बिन कसुरे बाहर वनवास बितेलहुँ

सोमवार, 3 सितंबर 2012

गजल


 दड़ड़िते खेसारी     बखाडी बनेलक
बीच तरहत्थीपर दही ओ जमेलक

बिसरि रौदी दाही   अपन कष्ट सभटा
कर्म पथपर खेतिहर चलि हर चलेलक

केखनो नहि पढ़ि रहल मड़राति सगरो 
राजमंत्री बनि    जीनगी भरी कमेलक

पहिर चश्मा दिन राति जे खूब पढ़लक
घूस दय चपरासी      किरानी कहेलक

देख आगाँ इस्कूलकेँ   घुरि परेए
बनि कवी 'मनु' सभकेँ गजल ओ सुनेलक

(बहरे खफीक, मात्राक्रम- २१२२-२२१२-२१२२)

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

गजल

नहि हमरा सागक तोडन चाही
नहि हमरा पातक छोडन चाही 

नव मिथिला निर्माणक बल लेने 
शुभ मिथिला राजक जोडन चाही 

सूपक भाँटा सन डोलति लोकक 
मोनक बदलति नै मोरन चाही 

बिनु जानक भय केने छोरै नहि 
घर घर बिषबिश्षी घोडन चाहि 

हक हमरा  एखन अप्पन चाही
सभटा तीमन नहि फोडन चाही  

(वर्ण-१३, मात्रा- नअ नअटा दीर्घ सभ पाँतिमे)

बुधवार, 29 अगस्त 2012

गजल


सिह्कैत हवा पर सिसकैत अछि मोन,
हम छी पाथर,आ ओ पाथर,से भेल सोन,...

कनैत रही छी असगर एकात बैसल,
हँसब से ऐहन बाते अछि बचल कोन,.....

चली गेल ओ संग ल' मुइर-सुईद सब,
देलहुं हम जकरा अपन स्नेहक लोन,......

खोले चाहै छी रंग-रभसक बात सब,
मुदा कोना खोलियैक ,मोने भेल अछि मौन,....

'गुंजन' छै लोढ़ैत,गजल बहार बैसल,
आहां रहू अहिना ऐकात,कानि करू होम,...... गुंजन श्री

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

गजल

रंग देखू भरल अछि सभतरि तँ खूनसँ 
देश गेलै गैल बैमानीक घूनसँ 

 साग तरकारी कते भेलै महग यौ 
आब छी पोसैत नेना भात नूनसँ 

नामकेँ लत्ता गरीबक देहपर अछि  
लदल कबिलाहा कते छै गरम ऊनसँ 

छैक भिसकी रम बहै भरपूर सबतरि
एखनो हम गुजर केलौं पान चूनसँ 

मारि गर्मी लेल 'मनु' बेबस कते छी 
ओ तँ अछि पेरीसमे पोसाति जूनसँ     

(बहरे रमल, मात्राक्रम-२१२२)
जगदानन्द झा 'मनु'     > गजल संख्या- ७६ 

सोमवार, 27 अगस्त 2012

हजल


लाल धोती केश राँगि समधि चुगला बनला ना 
बेटा बेचि आनि बरयाती ई पगला बनला ना 

सभ बिसरि आँखि मुनि ध्यानसँ ताकथि रुपैया 
भीतर कारी बाहर उज्जर बोगला बनला ना 

खेत खड़ीहान बेच बेच पीबथि बभना तारी 
आब लंगोटा खोलि खालि ई तँ हगला बनला ना 

तमाकुल चूनबैत पसारने  दिनभरि  तास
घर आँगनक चिंता नहि ई खगला बनला ना 

जेल छोरि बाहर आबि हाथ जोरि माँगथि भोट
जितैत देरी 'मनु'केँ बिसरि दोगला बनला ना 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)  

रुबाइ

घाटे-घाट बैसल कतेको गोहि अछि 

साउध लोककेँ मोन लेने मोहि अछि 

धर्मक नामसँ खुजल कतेको दोकान

टाका लऽ छनमे सभटा पाप धोहि अछि 

                 ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


गजल


घर घरमे चक्कू पिजाबैत देखलौं
नेनाकेँ तमाकुल चूनाबैत देखलौं   

बेगरता निकालि कs आजुक घड़ीमे
नीक नीककेँ ठेंगा देखाबैत देखलौं

मोनक दोष मोनेमे नूका कs सबटा 
कपटसँ करेज लगाबैत  देखलौं

दियादक फसादमे अपने मोलमे 
घरमे धिया पुता नुकाबैत देखलौं 

पाईकेँ जमाना छै पाईकेँ हिसाबमे 
पानिमे मनुखता डुबाबैत देखलौं

नहि रहिगेल मोल प्रेम आ स्नेहकेँ 
प्रेमकेँ डबरामे बहाबैत   देखलौं

"मनु" मन कोमल सहि नहि सकलौं 
किए माएकेँ नोर खसाबैत देखलौं

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४)

शनिवार, 25 अगस्त 2012

गजल


गीत आ गजलमे अहाँ ओझराति किएक छी 
हुए मैथिलीक विकास अंसोहाति किएक छी 

परती पराँत जतए कोनो उपजा नहि है 
तीन  फसल ओतएसँ फरमाति किएक छी 

जतए सह सह बिच्छू आ साँप भरल होई
ओतए बिना नोतने अहाँ देखाति किएक छी 

अप्पन चटीएसँ नै   फुरसैत भेटे अहाँकेँ
सिलौटपर माथ फोरि कs औनाति किएक छी  

आँखि पथने बरखसँ अहीँक रस्ता तकै छी 
प्राणसँ बेसी 'मनु' मनकेँ सोहाति किएक छी     

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १७)

गजल


हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै 
मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै 

मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि
चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज  तँ आरा लेबै 

छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी 
अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै 

गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ 
विश्व मंचपर एकबेर  फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै 

उठू 'मनु' जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू 
फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै      

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२)  
  

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

गजल

ई गजल शब्द साधक रामविलास साहू जीकेँ समर्पित छन्हि।


गजल



हम तँ भेल छी तबाह यौ
मीत छथि हमर कटाह यौ


मोन केर गप्प आँखिमे
प्रेम केर गजब धाह यौ


देखतै किए गरीब दिस
संविधान छै बताह यौ


राजनीतिमे फँसल धसल
लोक ताकि रहल थाह यौ


बेर बेर मारि पीट सन
एहने तँ छै सलाह यौ




दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ हरेक पाँतिमे

गजल

बाल गजल-43

मसल्ला देल छै चल खोँटब अदौरी

चमेली सीख कोना बनतै तिलौरी

अपन खेतक लऽ आलू पापड़ बनेबै

बगल के खाटपर चल खोँटब मुरौरी

तरूआ लेल बुचिया पीसेँ पिठारो

लगै छै नीक खस्ता फूलल कचौरी

नहा ले आब गरमसँ हेतौ घमौरी

भरल छै पानि भरलक भोरेसँ नौरी

जँ रहतौ लूरि नै भूखब रहब कहियो

रहै छै मान सासुरमे तखन छौड़ी

मफाईलुन-मफाइलुन-फाइलातुन

1222-1222-2122
बहरे-करीब

अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-42

एलै हमर गाममे नव खेला बला
डमरू बजाबैत एलै बेला बला

छै भीड़ लागल बहुत भारी उमस छै
मिल छोड़बै जाम के सब मेला बला

छै ढोल बजबैत बानर बुधियार छै
खिस्सा कहै छै गुरू आ चेला बला

नै देब टाका तऽ देखाबै पेट छै
माँगै जलेबी रसिक गुड़ ढेला बला

उजरा कुकुर छोट डिब्बापर चढ़ल छै
लुझलक अनारस दबारै ठेला बला

मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
2212-2122-2212

अमित मिश्र

गजल

आइ हम कतऽ छी देखऽ चाहै छी घुमि कऽ जमानामे देखू
नवका भारत कतऽ बसल छै जा कऽ मयखानामे देखू

केउ किए कहै छी जे हमर देश गरीबक देश अछि
अमिरी देखबाक अछि तऽ मंदिरक तहखानामे देखू

जुनि कहू जनता भोजनक अभावमे भूखल सुतै छै
भोजन देखबाक अछि तऽ वियाहक समियानामे देखू


जुनि कहू लोक दुखमे मरै छै , खुशी देखबाक अछि तऽ
श्मशानमे शराब उड़ैत अबीर बाजैत गानामे देखू

केउ किए कहै छी कश्मीर एहि धरती परक स्वर्ग छै जँ नरक देखबाक अछि तऽ गोली कए निशानामे देखू

भारत भूतकालसँ सोना कए चिड़ियाँ कहल जाइ छै
कोयलाक चिड़ियाँ देखबै राजनीतिक घरानामे देखू

जे किछु देखबाक भेटल एहि ठाम वएह लिखने छी
अमित दर्द देखबाक अछि किसानक ठिकानामे देखू

वर्ण-21
अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-41

पातर मोर पोथी मोटगर छै शब्द
करबै मेहनत तखने हमर छै शब्द

सुन्ना पैघ छै पाकल पियर छै आम
जामुन मीठ एप्पल सुअदगर छै शब्द

असँ हेतै अदौरी फूल फल छै लिखल
मिरचाई मसल्ला चहटगर छै शब्द

लागू गोर भोरे भोर नै कर शोर
कवितामे लिखल सब रमनगर छै शब्द

हम भाषा पढ़ै छी और जोड़ल जोड़
लागै हमर मन बड मीठगर छै शब्द

2221
मफऊलातु तीन बेर

अमित मिश्र

गजल

गजल

जँ करबै विश्वास भेटत दर्द सगरो
खसल लोकक नेत संगे नेह नजरो

गजल माँगै भाव संगे शब्द हल्लुक
अपन भाषा संग राखू मोन बहरो

सिनेहसँ छै भरल पति-पत्नी जगतमे
मुदा ओतौ होइ छै कखनो कऽ झगड़ो

बरसि जेतै मेघ रौदी भागि जेतै
खसै छै अमृत बहै ठनकाक नहरो

कते मोनक बात मोनेमे रहै छै
हुनक चुप्पी अमित देलक तोड़ि हमरो

मफाईलुन-फाइलातुन-फाइलातुन
1222-2122-2122

बहरे-सरीम

अमित मिश्र

गजल

 गजल

नैन खोलिकऽ कने देखू ने भवानी
काँट पसरल सगर सोचू ने भवानी

बाट दरबार के माँ देखल तऽ नै अछि
अंगुरी पकड़ि देखाबू ने भवानी

राति कारी बनल दिन तऽ स्याह भेलै
घोर युग समय फरिछाबू ने भवानी

झूठ छल हम कऽ मिझरेलौँ आगि पेटक
आब की करब किछु बाजू ने भवानी

एतऽ नेता पड़ल हिँसा ओतऽ भड़कल
"अमित" थाकल कहै जागू ने भवानी

फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन
2122-1222-2122
बहरे-असम

अमित मिश्र

रूबाइ

रूबाइ-124

अपने नजरमे हम खसल जा रहल छी
भीतर भीतर आब मरल जा रहल छी
अपने जे आगि लगेलौँ टाका लऽ कऽ
ओ दहेजक लुत्तीसँ जड़ल जा रहल छी

रूबाइ

रूबाइ-123

एखन जागि रहल देश अपन माँटि लेल
टूटल कमजोर भेष अपन माँटि लेल
मिथिला बनत मैथिल फूल फूलाएत
किछुए दिन आब शेष अपन माँटि लेल

रुबाइ

रुबाइ-122

कोनो भोथ हाँसूसँ घेँट काटि देलौँ
केलक मोन तऽ नोनक ढेला साटि देलौँ
सभ किसिमक दर्द देबऽ चाहै छी तेँए
जहरक बोतल अहाँ अपने चाटि देलौँ

गजलक इस्कूल भाग-62

खा ले रे बौआ दूधे भात
· · · 23 July at 21:13 via Mobile
    • Ashish Anchinhar ‎22-222-2221
    • Amit Mishra खा ले रे बौआ दूधे भात
      देबौ हम काल्हि व्यंजन सात

      माछी छौ कौआ देतौ चोँच
      देने छीयौ केला के पात

      देबौ खेलौना साँझे आनि
      मानेँ रे सोना हमरो बात

      देखै छौ हजमा तोरे देख
      देबौ लड्डू चल ने एकात

      नै खेबेँ लागत बड़का पाप
      गैया मैया देथुन जे श्राप

      खा बनलेँ बढ़ियाँ बौआ "अमित"
      फेरो हम देबौ दूधे प्रात
      22-222-2221
      24 July at 11:03 via Mobile · · 2
    • Ashish Anchinhar नै खेबेँ लागत बड़का पाप
      गैया मैया देथुन जे श्राप
      ehi me kafiya................??????? ona aar sher sabh neek achi...
      24 July at 11:05 · · 1
    • Amit Mishra पाँचम शेर मे काफिया गलत भ' गेल छल तेए एकरा आब एना पढ़ल जाए

      नै खेबेँ लागत बड़का पाप
      रे नै हेतै दूधक बरिसात
      24 July at 11:27 via Mobile · · 1
    • मिहिर झा खा ले रे बौआ दूधे भात
      ठुनकि नै हो ठाढ कात
      पढि बनबे तू बी डी ओ
      मोन राख हमर बात
      पैघे के सब दै छै ध्यान
      तोंही पेबें पहिल पात
      छौ जे दुत्कारैत एखन
      कान पाथि सुनतौ बात
      मोन लगा जॉं पढबे तू
      टाका के हेतौ बरसात
      24 July at 15:44 · · 4




तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों