Thursday, 8 September 2011

गजलक संक्षिप्त परिचय भाग-14

खण्ड-14

बहर

छन्दकेँ अरबीमे बहर कहल जाइत छै। गजल सदिखन कोने ने कोने बहरमे होइत छैक। बिना बहरक गजलक कल्पना असंभव। ई स्पष्ट करब जरूरी जे गजल लेल छंद वर्णिक होइ छै मने गजलक हरेक पाँति एक समान मात्राक्रममे रहए। किछु लोक "एकसमान मात्राक्रम" आ "एक समान मात्रा" दूनूकेँ एकै बूझि लै छथि से गलत। जेना छन्दक आधार लय होइत छैक तेनाहिते बहरक आधार अऱूज वा अऱूद होइत छैक। अऱूज वा अऱूद मने शेर मे निहित मात्राक्रम होइत छैक। अऱूज वा अऱूदके वज़न सेहो कहल जाइत छैक। बहरक चर्च आगाँ बढ़एबासँ पहिने एकटा गप्प आर। एहिठाम हम अरबी बहर केर वर्णन कए रहल छी आ मैथिली गजलमे ई बहर सभक प्रयोग मैथिली गजलक 100 सालक इतिहासमे खूब भेल । प. जीवन झा, कविवर सीताराम झा आदि-आदि प्राचीन गजलकार सभ अरबी बहरपर गजल लिखलथि। मुदा बादमे मायानंद मिश्र जी ई कहि सभकेँ बताह बना देलखिन्ह जे मैथिलीमे गजल लिखब सम्भव नै... जखन की मायानंद जीसँ पूर्वेमे बहर युक्त गजल छल। 1980 केर समयसँ  योगानंद हीरा आ विजयनाथ झा अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। मुदा हालहिमे फेरसँ (ई बात 2009 केर थिक) गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि। ओना एहि बहरक चर्चा हम बादमे सेहो करब पहिने अरबीक बहर देखी।
अऱूज वा अऱूदक अविष्कार हिजरीक दोसर सदीमे खलीले इब्ने अहमद बसरी केने छलाह। हुनका ई विचार मक्काक ठठेरा बजारमे बर्तन बनेबाक अवाज सूनि अएलन्हि। ऐ ठाम कने बिलमि भारतीय पक्षकेँ देखी- ध्वनि मुख्यतः तीन ठामसँ निकलैत छै मूँह, हृद्य आ ढ़ोंड़ी । साधारण लोक मूँहसँ बजैए, साधक हृद्यसँ आ महा साधक ढ़ोंड़ीसँ। ढ़ोंड़ीसँ ॐ शब्द निकलल छै। ॐ शब्दमे तीन टा ध्वनि छै अ, , म।
सभसँ पहिने कने संस्कृतक मूल वर्णमाला दिस चली। संस्कृतमे कुल 16 टा स्वर आ 36 टा व्यंजन अछि मने 52 टा वर्ण ( 52 टा ध्वनि साधरण मनुख द्वारा मूँहसँ बाजल जाइए, साधक आ महासाधक किछु वर्णक ध्वनि हृद्य आ ढ़ोंड़ीसँ निलाकैत छथि )। बहुत रास प्रतीक ऐ स्वर आ व्यंजनक उद्घोषणा करैए। सनातन धर्मक हरेक मत एक स्वरसँ ई स्वीकार करैत अछि जे शंकर भगवानक डमरूसँ लघु-दीर्घ ध्वनि निकलल छै। जँ कने गौर करबै तँ डमरूमे पहिने कम जोरगर अवाज आ तकर बाद जोरगर अवाज आबै छै। कम जोरगर अवाज लघु केर आ जोरगर अवाज दीर्घक प्रतीक भेल। जखन ध्वनि विकसित भए गेलै तखन रैखिक प्रतीकक जरूरति बुझना गेल (ओना गुणाकर मुले जी अपन पोथीमे ध्वनि आ अक्षरक विस्तृत चर्चा केने छथि)। आब कने काली जीक जीहपर आउ काली जीक जीह बाहर निकलल आ गरामे 52 नरमुंडक माला। इएह विग्रह आ फोटो भेटत काली जीक। कने रूकि कऽ मतलब बूझू। जीह ध्वनि लेल अनिवार्य अंग थिक। जँ जीह नै रहत तँ केओ बाजि ने सकत। तेनाहिते नरमुंड जे की गरा, मूँह, जीह आदिकसँ बनल अछि ध्वनि निकालबाक प्रमुख द्वार अछि। 52 टा नरमुंड मे 16 टा स्वर आ 36 टा व्यंजन। शायद अहाँ सभ बूझि गेल हेबै हमर विवेचना।
प्राचीन कालमे मक्काके अऱूज वा अऱूद सेहो कहल जाइत छलैक तँए बसरी ओहि मात्रा क्रमके अऱूज वा अऱूदक नाम देलथि। अरबी साहित्यमे 16 बहरक प्रयोग भेल। बादमे इरानमे तीन टा बहरक अविष्कार भेल। आब हम एहिठाम बहरक संक्षिप्त परिचय दए रहल छी।
अरबी साहित्यमे बहर तीन खण्डमे बाँटल गेल अछि 1) सालिम मने मूल बहर, 2 ) मुरक्कब मने मिश्रित बहर आ 3) मुदाइफ वा मुजाइफ मने परिवर्तित बहर।
अरबीमे सालिम मने मूल बहर मे 7 टा बहर अबैत अछि। आ मुरक्कबमे 269 टा। मुदा ऐ 269मेसँ मात्र 20टा प्रचलित अछि। हम अपना सुविधा लेल मुरक्कब बहरकेँ दू खण्डमे बाँटि देने छी। संगहि-संग सालिम बहरके हम "समान बहर" नाम देने छिऐक। आ मुरक्कब बहरक पहिल खण्ड (जाहिमे कुल सात टा बहर अछि) तकरा अर्धसमान बहर नाम देलिऐक आ मुरक्कब बहरक दोसर खण्ड जाहिमे तेरह टा बहर अछि तकर नाम "असमान बहर" देलिऐ। तँ आब एकर विवरण निच्चा देखू।


1 comment:

  1. अपना के अपने से प्यार करब अखरैत अछि
    अपना के अपने से चिन्हब आब अखरैत अछि

    जिंदगी भरि अहां के चाहलहुं बिना सोचने हम
    अहां के चाहनाई आब सोचियो के अखरैत अछि

    समय छलैक लिखलहु नाम अहां के हाथ पर
    आब मिटल नाम देखि हाथ पर अखरैत अछि

    अहां छलहुँ त जिंदगी छल से बुझै छलहुँ हम
    मोहक पर्दा हटला पर जिंदगी अखरैत अछि

    --वर्ण १९*****

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