Wednesday, 12 December 2012

गजल


गजल-३५

दू आंगुर के बीच फंसल सिगरेट जड़ै छै जड़बै लेल
जर्दा गुटखा करै गमागम लोकक अंतरी सड़बै लेल

लोलक तर छै गुल तमाकुल धूकि रहल छै बीड़ी गाँजा
धुकैत-धुकैत भट्ठी बनलै नै चाही जाड़णि जड़बै लेल

जे खराप से ओहिना नांगट मदिराक बहन्ना नञि चाही
मधुशालामे शीशी टकड़ेलै नीकसँ नीक के लड़बै लेल

पी क' बोकरै भोकरै कानै आब नञि पीबै सभदिन ठानै
भरलो जेबी करैत छै खाली देह मे दुर्गुण भरबै लेल

घर - घरारी ध' क' भरना वैद्द हकीमक घर ओगरने
भगता के चौखठि धएने छै जंतर खातिर, झड़बै लेल

सौंसे शोणित बिक्ख पसरलै कानै पड़ल मृत शैय्या पर
नोतल मृत्यु आबि रहल छै जिनगी के लड़ि हरबै लेल

आंखि रहैत छै आन्हर भेल कान रहैत ओ भेल बहीर
सौंसे पसरल छै विज्ञापन जकरा चेतबै डरबै लेल

पढ़ल-लिखल काबिल के देखू टाका बूकि क' रोग बेसाहै
भांति-भांति के अवगुण पोसै देहमे पिलुआ फरबै लेल

"नवल" करू संकल्प अहाँ जे एहि कुकर्मसँ दूर रहब
किएक कांट पर पैर धरब जानि बूझि क' गड़बै लेल

*आखर-२२ (तिथि-०९.१०.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

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