Wednesday, 12 December 2012

गजल


गजल-४१

आब मिथिलाराज चाही
मैथिली के ताज चाही

बाढ़ि आ रौदीसँ मारल
मैथिलो के काज चाही

बड़ रहल बेसुर इ नगरी
सुर सजायब साज चाही

गर्जना गुंजित गगन धरि
दम भरल आवाज चाही

संयमित सहलौं उपेक्षा
नवल नव अंदाज चाही    

*बहरे रमल/मात्राक्रम-२१२२
(तिथि-०७.१२.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

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