सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

पहरा-अधपहरा

आइ हम पढ़लहुँ बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " जे की 1989मे प्रकाशित भेल आ ऐमे कुल मिला तीस टा गजल अछि। धेआन देबै विभक्ति शब्दमे सटल अछि आ ई गजलकारे द्वारा कएल गेल अछि आ हमरा लोकनि सेहो ऐ परम्पराक अनुयायी छी। तीसटा गजलकेँ छोड़ि ऐ संग्रहमे आरसी प्रसाद सिंह, गोपाल जी झा गोपेश, सोमदेव, मार्कण्डेय प्रवासी, जीवकान्त, रमानंद झा रमण, छात्रानंद सिंह झा ओ विभूति आनंद जीक संक्षिप्त टिप्पणी सेहो अछि। ई गजल संग्रह मात्र 32 पन्नाक अछि। आश्चर्य ऐ गप्पक जे 1989मे प्रकाशित भेलाक बाबजूदो ओहि समयक आन गजलकार ( जे की एखनो जीवित आ रचनारत छथि ) ऐ गजल संग्रह कोनो चर्चा नै केने छथि। जँ गौरसँ अहाँ 1989-2008 बला कालखण्ड देखब तँ बहुत कम्मे ठाम हिनक वा हिनकर पोथीक चर्च भेटत आ ओहूमे अधिकांश चर्च अ-गजलकार ( मुदा अपना विधामे प्रतिष्ठित ) रचनाकार द्वारा भेल अछि।
की कारण छै जे एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करए चाहैत अछि। खराप वा नीक बादक विषय भेल मुदा चर्चा तँ हेबाक चाही। हमर गजल एहन, हमर गजल ओहन ऐ तरहँक चर्चा बहुत भेटत मुदा एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करत। आखिर किए ? वा एना कहू जे गजलकारक चर्चा के करत कथाकार की नाटककार  आ की आन। जँ ई सभ करबो करता तँ ओहन समयमे जखन की गजल पूर्णरूपेण विकसित भ' क' देखार भ' जाएत तखन। मुदा प्रारम्भिक कालमे तँ स्वयं एक गजलकारकेँ दोसर गजलकारक चर्चा कर' पड़तन्हि, आलोचना आ समीक्षा कर' पड़तन्हि तखने आनो आलोचक सभ गजलपर लिखबाक प्रयास करता। जँ प्रारम्भिके कालमे अहाँ सोचि लेबै मात्र हमरे गजल चर्चा योग्य दोसरक नै तखन अहाँ गजल लीखू की आन कोनो विधा ओकर विकास नै हएत।  मात्र पुरने गजलकार सभमे एहन बेमारी छै से नै नव गजलकार सभ सेहो ऐ बेमारीकेँ पोसने छथि। नवमे देखी तँ चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदिमे आलोचना-समालोचना-समीक्षा लिखबाक प्रतिभा छनि मुदा ओकरा उपयोग नै करै छथि। आब हमरा लग ई प्रश्न अछि जे जँ ई सभ केकरो चर्च नै करथिन्ह तँ हिनका लोकनिक चर्च के करत। आब ई सभ जरूर कहता जे हम सभ स्वानतः सुखाय रचना करै छी तँए हमर  समीक्षाक कोनो जरूरति नै मुदा हमरो बूझल अछि, हुनको बूझल छन्हि आ सभकेँ बूझल छै जे साहित्यकार केखनो स्वानतः सुखाय रचना नै करै छै। केकरो ने केकरो लेल ओ रचना जरूर रचै छै.................खास क' एहन समयमे जखन की हरेक रचनाकार अपना आपकेँ प्रगतिशील आ जनवादी घोषित करै अछि। हमरा बुझने कथित स्वानतः सुखाय बला रचना जनवादी आ प्रगतिशील भैए नै सकैए। कारण प्रगतिशील आ जनवादी रचना जनता लेल लिखल जाइ छै स्वानतः सुखाय लेल नै। हमरा बुझने आने विधाकार जकाँ प्रारम्भिक दौरमे गजलकारकेँ गजलक दिशा बनाब' पडतै। हँ बादमे बहुत सम्भव जे आनो विधाकार सभ गजल आलोचनापर हाथ चलाबथि मुदा शुरू तँ गजलकारेकेँ कर' पड़तै।  सभ नव-पुरान गजलकारकेँ ऐ दिशामे सोचबाक चाही। हरेक पोथीमे नीक वा खराप रहै छै मुदा जँ चर्चे नै करबै तँ ओ सोंझा कोना आएत। हमरा जनैत एक गजलकार द्वारा दोसर गजलकारक आलोचना नै करबाक परंपरा जे सियाराम झा सरस जी द्वारा शुरू कएल गेल तकरा चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, अमित मिश्र आदि नीक जकाँ बढ़ा रहल छथि। आ अंततः ई भविष्य लेल खतरनाक साबित हएत। मुदा ओमप्रकाश जी हमर कथनक अपवाद छथि। ओ जतबा मनोयोगसँ अपन गजल लीखै छथि ततबा मनोयोगसँ ओ दोसरक गजल पढ़ि ओकर आलोचना समीक्षा करै छथि। हमरा जनैत ओमप्रकाश जी मैथिली गजलक पहिल आलोचक-समालोचक-समीक्षक छथि ( बहरयुक्त कालखण्ड बला )। चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदि ओमप्रकाश जीसँ प्रेरणा ल' क' कमसँ कम बर्खमे एकटा गजल पोथीक आलोचना लिखथि तँ मैथिली गजल नीक दिशामे आबि जाएत। नव गजलकारकेँ बहुत बेसी दायित्व लेब' पड़तन्हि तखने गजलक दिशा सही हेतै। आ जँ गजलक दिशा सही भेलै तँ बूझू जे गजलकारक दिशा सेहो सही भ' गेलै। ओना हम ई जरूर कह' चाहब जे हरा लोकनि ऐ बहसमे समय नै बरबाद करी जे के आलोचना केलाह आ के नै केला। जे भेलै से भेलै मुदा आबसँ शुरू भ' जेबाक चाही।
आब हमरा लोकनि आबी बाबा बैद्यनाथ जीक कृतिपर। कृति थिक गजल आ तँए हम एकरा तीन भागमे बाँटब--
१) व्याकरण पक्ष २) भाषा पक्ष, आ ३) भाव पक्ष
तँ पहिले देखी व्याकरण पक्ष। ऐ संग्रहक कोनो गजलमे वर्णवृत नै अछि। मने पूरा-पूरी ई संग्रह बेबहर गजल संग्रह थिक। किछु उदहारण देखू। पहिने ऐ संग्रहक पहिल गजलक मतला आ तकर बाद ओकर दोसर शेर देखू----
एक बेर फेरु नजरि शरण हम आयल छी
२१२-१२२-१२-१२२२२२
वा २१२-१२-२२१२-१२२२२२
सौंसे संसारसँ हम सदति सताएल छी
२२२२२२-१२-१२२२
वा २२२२११-२२१-१२२२

ई छल मतला आ एकर दूनू तरहें होमए बला मात्रा क्रम अहाँ सभहँक सामनेमे अछि। कहबाक मतलब जे मतलामे वर्णवृत नै अछि। आब कने एही गजलक दोसर शेर देखी---
सभ दिन हम मोह निशामे सूतल रहलौं
२२२११-२२२२२२२
व्यर्थ-जंजालमे हम जन्म गमायल छी
२१२२-१२२२-११२२२
वा २१-२२१२२१२-१२२२
तँ हरा लोकनि ई देखि रहल छी जे गजलमे वर्णवृत नै अछि मने गजल बहर युक्त नै अछि।
आ ई हालति प्रायः तीसो गजलमे अछि। कोनो गजलक कोनो शेरक दुन्नू पाँतिमे तँ वर्णवृत आबि जाइए मुदा ओकर आगू-पाछू बलामे नै। जेना एकटा उदाहरण देखू। ई उनतीसम गजलक मतला थिक--
भोर भागल जेना दूपहर देखि कs
२१२२-२२२-१२२-११
गाम गामो ने रहलै शहर देखि कs
२१२२-२२२-१२२-११
तँ हमरा लोकनि ई देखलहुँ जे ऐ मतलामे तँ वर्णवृत अछि। मुदा एही गजलक आगूक शेर देखू---
आयत गरमी जखन नहि पानियें पड़त
२२२२-१२२२-१२-१२
हेतै खेती ने छुच्छे नहर देखि कs
२२२२२२२-१२२-१२
आब अहाँ सभ अपने बूझि सकै छिऐ जे गड़बड़ी कत' छै। संग्रहक तीसो गजलमे ई बेमारी छै। किछु लोक कहि सकै छथि जे भ' सकैए जे शाइर ओहि समयमे हिन्दी गजलमे प्रचलित मात्रिक छन्दमे लिखने हेता। तँ हमर कहब जे मात्रिक छन्द गजलक छन्द होइते नै छै आ दोसर गप्प जे ओ उदाहरणमे देल शेरक मात्राकेँ जोड़ि ईहो देखि लेथु जे मात्रिक छै की नै।
व्याकरणमे मात्र बहरे ( वर्णवृते ) नै होइ छै काफिया आ रदीफ सेहो होइत छै। ऐ संग्रहक रदीफ ठीक अछि ( कारण रदीफ अपरिवर्तित होइ छै तँए --) । ऐ संग्रहक अधिकांश काफिया ठीक अछि मात्र किछुए काफिया गलत अछि। आ हमरा बुझैत ओइ समय ( १९८९क ) केर हिसाबसँ ई बहुत बड़का उपल्बधि अछि। जखन की आइ २०१३मे एहन स्थिति अछि जे गजलपर एतेक चर्चाक बादों महान गजलकार सभ काफिया एहन सरल वस्तुमे गलती करै छथि। हमरा हिसाबें बाबा बैद्यनाथ जी ऐ लेल बधाइ केर पात्र छथि। आब देखी किछु गलत काफियाक सूची जे ऐ संग्रहमे अछि---
दोसर गजलक मतला---
झगड़ा कियै बझल छै गामक सिमानपर
पहरा कोना लगयबै लोकक इमानपर
ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें  काफिया भेल--- " इ " स्वरक संग "मानपर"। मुदा एकर बाद आन-आन शेर सभमे क्रमशः " गुमानपर ", " जानपर", "पुरानपर " ," दलानपर " , " कुरानपर ", " नादान पर", " तूफानपर" आ "कृपाणपर" अछि। (जँ ऐ गजलमे पर विभक्ति नै रहतै तँ काफिया ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें  काफिया होइतै--- " इ " स्वरक संग "मान" संगे-संग जँ मतलामे "सिमानपर" केर बाद जँ " जानपर" आबि जइतै तखन ऐ गजलक सभ काफिया एकदम्म सही भ' जइतै। आब हमरा विश्वास अछि जे गजलक जानकारक संग पाठक सभ सेहो बुझि गेल हेता जे गड़बड़ी कत' छै )| ठीक इएह गड़बड़ी ऐ संग्रहक गजल संख्या 16,13,19 आ 27मे सेहो अछि। तहिना गजल संख्या दसकेँ देखू। ई गजल बिना रदीफक अछि ( बिना रदीफकेँ तँ गजल भ' सकैए मुदा बिना काफियाक नै )---

पहिल शेर अछि--
क्यो एकरा दयौक नहि टोक
ई अछि बहिरा ओ अछि बौक
आन शेरक काफिया अछि--झोंक, थोक, नोक, आलोक आदि। काफिया शास्त्रक हिसाबें टोक केर काफिया, थोक, नोक, आलोक , आदि। मुदा ऐ शेरमे टोक केर काफिया अछि बौक जे की गलत अछि।
आब आबी कने ऐ संग्रहक भाषा पक्षपर। भाषा तँ ऐ संग्रहक मैथिली थिक मुदा गजल संख्या ६मे काफिया बैसाब' के चक्करमे एहनो काफिया ल' लेलथि जे की हिन्दीक क्रिया अछि आ मैथिलीमे मान्य नै अछि। गजल संख्या ६ केर मतला देखू---

बन्धुवर कोन बाट दुनियाँ  जा रहल छै
सत्य कानय झूठ कीर्तन गा रहल छै
ऐ गजलक आन शेरक काफिया सभ अछि-- पा, खा, छा, बा ( मूँह बा ), आ ....
आब ई देखू जे एतेक हिन्दी क्रियामेसँ मात्र टूइएटा क्रिया मैथिलीमे मान्य छै-- जा एवं खा। बाद बाँकी एखन धरि मान्य नै छै। हमरा हिसाबें अग्राह्य हिन्दी क्रियाकेँ प्रयोग करब भाषाकेँ दूषित करबाक चेष्टा अछि। तथाकथित प्रगतिशील गजलकार नरेन्द्र एही प्रकारक भाषाक प्रयोग करै छथि आ ऐ लेल हम ने बाबा बैद्यनाथ जीक समर्थन करै छी आ ने नरेन्द्र जीक। हँ, एतबा कहबामे हमरा कोनो संकोच नै जे नरेन्द्र जी अपन १००मेसँ ९५टा गजलमे एहन भाषा प्रयोग करै छथि तँ बाबा बैद्यनाथ १००मेसँ १टामे। ओना ऐ ठाम ई जानब रोचक हएत जे एहन काफियाक प्रयोग करब अनुचित नै छै बशर्ते की भाषा बदलि जेबाक चाही। जँ नरेन्द्र जी वा बाबा बैद्यनाथ जी ऐ काफिया सभहँक प्रयोग अपन गामक वा पड़ोसी गामक मैथिलीक जोलहा रूपमे गजल लीखि करथि तँ ई काफिया सभ बिल्कुल सही होइत। हम बाबा बैद्यनाथ जीक उपरमे लेल गेल गजल संख्या ६क मतलाकेँ ऐ रूपमे देखा रहल छी---
भाइ केन्ने दुनियाँ जा रहलइय'
साँच कानै झुट्ठा गा रहलइय'
( आन शेर पाठकक कल्पनापर छोड़ल जाइए)
आब अहाँ अपने अनुभव क' सकै छिऐ जे काफिया तँ वएह हिन्दीक छै मुदा फिट एवं प्रवाहपूर्ण भ' गेल छै। शाइरकेँ मात्र बस एतबा देखबाक छै। नै तँ भाषाकेँ दूषित होइत देरी नै लागत। जँ ऐ काफिया सभहँक प्रयोग मैथिली क जोलहा रूपमे वा चंपारण, मुज्जफरपुर, सीतामढ़ी, बेगूसराय, वैशाली एँ झारखंड बाल मिथिला क्षेत्रक भाषाक संग करबै तँ गजलक कल्याण सेहो हेतै आ मैथिलीक सेहो। भाषाक सम्बन्धमे एकटा आर गप्प ऐ संग्रहक अधिकांश गजलमे मैथिलीक चलंत रूप ( मने गाम-घरमे बाज' बला रूप ) प्रयोग भेल अछि जे की मैथिली गजल लेल शुभ अछि। हँ, एतेक अपेक्षा हम बाबा बैद्यनाथ जीसँ जरूर केने छलहुँ जे ओ पूर्णियाक छथि तँ हुनक रचनामे पूर्णियामे बाजल जाइत मैथिलीक स्वरूप रहत । जँ ऐ अधारपर देखी ई संग्रह कने हमरा निराश केलक ( ई हमर व्यतिगत आलोचना अछि, गजलक व्याकरणसँ फराक देखल जाए एकरा )। जेना की उपरे इंगित क' चुकल छी जे गजलकार स्वयं शब्दमे विभक्ति सटेबाक पक्षमे छथि आ हमरा हिसाबें ई मैथिलीक लेल नीक। आ अन्तमे आउ ऐ संग्रहक भाव पक्षपर। मैथिली साहित्यमे " भाव " सभसँ सस्ता छै। जकरा देखू से भाव केर नाङरि पकड़ि साहित्यिक वैतरणी पार करै छथि। तँए ऐ संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष उन्नत अछि। आ ऐ पक्षपर हमर कोनो कथन नै रहत। कारण जखन सभ पक्ष हमहीं कहि देब तखन तँ पाठकक रूचि खत्म भ' जेबाक डर रहत तँए पाठक संग आन सभ गोटासँ अनुरोध जे बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " नामक गजल संग्रह पठथि आ अपन-अपन विचार देथि। जिनका ई पोथी कोनो कारणवश नै उपल्बध भ' रहल छनि से ऐ लिंकपर जा क' एकर पी.डी.एफ फाइल डाउनलोड क' एकरा पठथि https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Pahra_Iman_Par.pdf?attachauth=ANoY7cqrLAai8QAw-5s2DKPbDbL7tkHkNm21JzW7JHpvcnMWa4eUTBj1upJeipTdGs5Ktg9FNASU7n1e23fURUkX_RGJ71_vvSGXUY_jCYzAoJL4WNpIi5YRY-krxar5gRQH8bbqGR7PJznA3E4jjZ3p_n8mZob_0_evLolQsqCFMQFI0tK9CAQplBo3fiCIwMurjrvuSmUoaMS3fj98oxyqnZnnb65L3iOIQwe3rykiAnOw3nyPYQA%3D&attredirects=0 । ई डाउनलोड बिल्कुल फ्री अछि मने साहित्यमे प्रयोग होमए बला " भाव "सँ बहुत बेसी सस्ता।
कने रुकू, जे गोटा भाव लेल तरसैत हेता तिनका लेल मात्र किछु शेर हम  देखाबए चाहब ( उनतीसम गजलक आठम शेर )
राति-दिन बउआ खाली कमेन्ट्री सुनए
कियैक पढ़तै क्रिकेटक लहर देखि कs
ऐ शेरकेँ पढ़ू आ तखनुक संग एखुनका समयकेँ देखू। कोनो फर्क नै भेलैए। पहिने रेडियोमे बैट्री नै देल जाइ छलै क्रिकेटक समयमे आब केबल लाइन कटबा देल जाइ छै। पढ़ाइपर क्रिकेटक की असर छै से एकै शेरमे देखा गेल छथि शाइर। पढ़ाइए किए ई क्रिकेट तँ आन छोट-छोट खेलकेँ सेहो नाश क' देलक। शाइर ऐ शेरक माध्यमे सेहो धेआन दिअबैत छथि। एही प्रकारक ज्वलंत मुद्दा सभकेँ बाबा बैद्यनाथ अपन गजलमे लेने छथि जे की आन शाइरक गजलमे दुलर्भ अछि। भाव केर ऐ चर्चामे ११म गजलक अंतिम शेर कहने बिना पूरा नै हएत---
कहियो जँ मोन पड़य अप्पन अतीत जीवन
बस आँखि मूनि दूनू कनियें लजा लिय
ऐ शेरकेँ पढ़ू आ एकर मतलब निकालू। झटहा फेकेलै कहीं आ लगलै कहीं। इएह भेलै गजलत्व जकरा बारेमे कहल जाइ छै जे गजलक शेर सीधा करेजमे लगै छै। जँ एकैसम गजलकेँ देखी तँ निश्चित रूपसँ ई बाल गजल अछि ( बाल गजल रहितों व्यस्क लेल ओतेबे प्रासंगिक अछि ) आ ओजपूर्ण सेहो अछि-

छोड़ू अपन कपटकेँ आ उदार बनू भैया
गाँधी सुभाष नेहरुक अवतार बनू भैया
अइ संग्रहमे श्रृंगार रसक गजल सेहो अछि जे की पाठकक लेल छोड़ल जाइए। तँ आसा अछि जे आब अहाँ सभ जरूर एकरा पढ़बै।

गजल

नेताक भेषमें सभ कामचोर छैक
तामससँ लोक देशक तेँ अघोर छैक

चुल्हा गरीबके दिन राति छैक बन्द
जे छैक भ्रष्ट घर ओकर इजोर छैक

ककरा करत भरोसा आम लोक आब
निच्चा अकान उप्पर घूसखोर छैक

चाही विकास चाही नै विनाश आब
जनताक ठोरपर मचिगेल शोर छैक

आलोचना करत 'कुन्दन' कतेक आर
जे चोर ओकरे मुँह एत जोर छैक

221+212+221+2121

© कुन्दन कुमार कर्ण

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शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

गजल

कियो घिरनी सन बना गेल हमरा
अपन आँचरपर नचा गेल हमरा

गरीबक नोरसँ सरापसँ धनी छै
बुझू ई गप्पे लजा गेल हमरा

जरब डिबिया सन छलै मोनमे ई
मुदा अधरतिये मिझा गेल हमरा

सुखाइत पोखरि तँ बाजल इनारसँ
मनुख असगर पी सुखा गेल हमरा

तँ ओ मरि गेलाक बादे कहत किछु
भरोसक सीमा जिया गेल हमरा

12222+122+122 हेरक पाँतिमे

अपने एना अपने मूँह-19

मास फरवरी २०१३मे कुल ५५टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
ओमप्रकाश जीक २टा गजल आ एकटा आलोचना आएल।
अमित मिश्र जीक कुल ३३टा पोस्टमे-- १४ टा हुनक अपने अवाजमे गाएल गजलक वीडियो अछि। ४टा रुबाइ अछि आ १५टा गजल अछि।
सुमित मिश्र जीक ८टा पस्टमे--७टा गजल आ १टा बाल गजल अछि।
जगदानंद झा मनु जीक १टा बाल गजल,  १टा गजल आ आ १टा रुबाइ अछि।
प्रदीप पुष्प आ बालमुकुन्द पाठक जीक १-१टा गजल आएल।
आशीष अनचिन्हारक ६टा पोस्टमे-- २टा गजल, ३टा सम्मान सम्बन्धी घोषणा आ १टा अपने एना अपने मूँहसँ सम्बन्धित पोस्ट अछि।
ऐ मासमे प्रदीप पुष्प जी बहर युक्त गजलकारक रूपमे चिन्हित कएल गेलाह।

मार्चमे कुल ५१टा पोस्ट भेल जाहिमे--
२१टा पोस्टमे २१टा विडियो अछि जैमे शाइरक अपन अवाजमे अपने गजल गाएल अछि।
जगदानंद झा मनु जीक ५टा पोस्टमे ४टा गजल आ १टा भक्ति गजल अछि।
सुमित मिश्र जीक ५टा पोस्टमे ४टा गजल आ १टा भक्ति गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक ३टा पोस्टमे २टा सम्मान सम्बन्धी घोषणा आ १टा गजल अछि।

अप्रिल मासमे कुल ८टा पोस्ट भेल जैमे--
अमित मिश्र केर ४टा पोस्टमे ४टा गजल आ १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
जगदानंद झा मनु के २टा पोस्टमे १-१टा गजल आ भक्ति गजल अछि।
सुमित मिश्र केर १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।

मइ मासमे कुल ९टा पोस्ट भेल जैमे--
जगदानंद झा मनुक जीक ३टा पोस्टमे २टा बक्ति गजल आ १टा गजल आएल।
कुन्दन कुमार कर्ण केर २टा पोस्टमे २टा गजल अछि।
बालमुकुन्द पाठक केर २टा पोस्टमे २टा गजल अछि।
अमित मिश्र केर २टा पोस्टमे २टा रुबाइ अछि।

मास जूनमे कुल २४टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---
पंकज चौधरी नवल श्री जीक १७टा पोस्ट भेल जाहिमे १५टा गजल आ २टा बाल गजल अछि।
कुन्दन कुमार कर्ण, अमित मिश्र आ बालमुकुन्द पाठकक २-२टा गजल अछि।
जगदानंद झा मनु जीक १टा गजल अछि।

जुलाइ मासमे कुल ६टा पोस्ट भेल जाहिमे ---                                                                                           कुन्दन कुमार कर्ण जीक २टा गजल अछि आ आशीष अनचिन्हारक ४टा पोस्टमे २टा गजलकार परिचय श्रृंखला आ २टा गजल अछि।

अगस्त मासमे मात्र १टा पोस्ट भेल जे की अमित मिश्र द्वारा भेल आ जैमे १टा गजल अछि।

सितम्बर मासमे कुल ८टा पोस्ट भेल जैमे--
अमित मिश्र जीक ३टा पोस्टमे ३टा गजल, ओमप्रकाश जीक २टा पोस्टमे २टा गजल, आ राम कुमार मिश्र, जगदानंद झा मनु, एवं कुन्दन कुमार कर्ण जीक १-१टा पोस्टमे १-१टा गजल अछि।
ऐ मासमे रामकुमार मिश्र जी नव गजलकारक रूपनमे चिन्हित भेलाह।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

गजल

गजल - तीन

जिनगीक बाट पर कांट गरबे करत
दरदक टीस सं करेज जरबे करत

जिनगी मे भेटत बसंत केर मधुवन
पतझर केर पात मुदा झरबे करत

जिनगी मे जितब हजार मगर तगमा
हरब​ऽक​ जोगार दुनिया करबे करत

मेहनति  केर घाम सं पाटि लेब जिनगी
सफलता केर बखारी त भरबे करत

कर्मठ बनल रहबै जौ सदिखन ‘राम’
दरिद्रता केर दानव त मरबे करत

(सरल वार्णिक बहर​) वर्ण - १६
© राम कुमार मिश्र



बुधवार, 25 सितंबर 2013

गजल

भूख छल प्रेमक भूखले रहि गेलहुँ
याह सोचिक हम टूटले रहि गेलहुँ

एक ओकर खातिर बनल सभ बैरी
सभसँ जिनगी भरि छूटले रहि गेलहुँ

पटकि देलक घैला जकाँ हिय एना
जाहि कारण हम फूटले रहि गेलहुँ

भरल प्रेमक कोठी, परल खाली छै
प्रेम बिन ओकर लूटले रहि गेलहुँ

कुन्दनक बखरा परल नीरस जिनगी
शोक संगे नित जूटले रहि गेलहुँ

२१२२ २२१२ २२२

© कुन्दन कुमार कर्ण

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रविवार, 15 सितंबर 2013

गजल

जे केयो करै छै काम
तकरे लोक लै छै नाम

जकरा संग छै ईमान
चर्चा तकर छै सबठाम

जे केलक मरम बुझि कर्म
से नै रहल छै बेकाम

कथनीमें भरोसा कोन
करणीमें रहै छै दाम

कहबी कुन्दनक छी याह
किछु छै खास, किछु छै आम

२२२१ (मफऊलात)
सब पाँतिमें दू बेर

© कुन्दन कुमार कर्ण
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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

गजल

हम गजल कोना कहू भीड़मे रसगर
सगर मुँह बेने मनुख भेसमे अजगर

पाइ घोटाला हबालाक खाएकेँ
रोग छै सबकेँ पकरने किए कसगर

बहिन माए भाइ बाबू अपन कनियाँ
सब तकै सम्बन्धमे दाम ली जथगर

गामकेँ बेटा परेलै शहर सबटा
खेत एकोटा रहल आब नै चसगर

छै बिकाइ प्रेम दू-दू टका मोले
रीत ‘मनु’केँ नै लगै छै कनी जसगर

(बहरे कलील, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-१२२२)

जगदानन्द झा ‘मनु’    

गजल



गजल – दू



गाम छोड़ति हम कैन गेलउ

बाम भेलइ दिन जैन गेलउ



नेह टूटल सब बन्धु छूटल

भाग भूटल हम मैन गेलउ



माटि पावन हम छोड़ि आयल

प्रीति  माहुर हम सैन गेलउ



साग बारिक फल फूल बारिक

फेर​ पायब हम ठैन गेलउ



‘राम’ गामक रस छोड़ि आयल

फेर आयब हम ठैन गेलउ



सभ पैत में आखर - १२ आ मात्रा - १६

तिथि: १३/०९/२०१३

© राम कुमार मिश्र

गजल

गजल-1.68

राति छै बेसी बचल कम जाम* छै
हमर नोरक दाम ओकर नाम छै

राजनीतक उठल बिर्रो देश भरि
जे छलै दायाँ बुझू से बाम छै

घाव टिभकै खूब चिट्ठी खोलिते
पस हियामे भरल नेहक दाम छै

गारि पढ़ियो वा अहाँ लाठी धरू
देशकेँ चक्का रहल बस जाम छै

आँखिमे छै भोर सोहावन "अमित"
बाँहिमे बान्हल नविन सन गाम छै

*दारू
2122-2122-212
अमित मिश्र

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

गजल

आइ किछु मोन पडलै फेरसँ किए
भाव मोनक ससरलै फेरसँ किए

टाल लागल लहासक खरिहानमे
गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए

आँखि खोलू, किए छी आन्हर बनल
नोर देशक झहरलै फेरसँ किए

चान शोभा बनै छै गगनक सदति
चान नीचा उतरलै फेरसँ किए

"ओम" जिनगी अन्हारक जीबै छलै
प्राण-बाती पजरलै फेरसँ किए
(दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)
(फाइलातुन-फऊलुन-मुस्तफइलुन) - १ बेर प्रत्येक पाँतिमे

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

गजल

गजल-1.67
तरेगण लाख छै तैयौ नगर अन्हार रहिते छै
बरू छै भीड़ दुनियाँमे मनुख एसगर चलिते छै

सजल छै आँखिमे सपना नदी नाला हरित धरती
जकर बेटा सुखी ओ माइक श्रृंगार सजिते छै

गजब छै रीत दुनियाँ केर मरने राख धरि फेकै
मुदा सदिखन सभक मनमे अमिट सन यादि बसिते छै

अहा वा आह धरि बाजब अहाँ आ बाट निज पकड़ब
अहींकेँ हास्य अभिनयमे हमर संसार जरिते छै

सगर छै खेल आखरकेँ हँसाबै आ कनाबै छै
कतौ टुटिते हिया छै आ कतौ नव नेह रचिते छै

अमित मिश्र

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

गजल

कहियो तँ हमर घरमे चान एतै
नेनाक ठोर बिसरल गान गेतै

निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल
सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै

मानक गुमान धरले रहत एतय
नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै

सुर ताल मिलत जखने सभक ऐठाँ
क्रान्तिक बिगुलसँ गुंजित तान हेतै

हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ
छोडब किया, कियो की दान देतै

(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)
(मुस्तफइलुन-मफाईलुन-फऊलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर

रविवार, 25 अगस्त 2013

गजल

गजल-1.66
एक ठोप प्रेम चलते तड़पैत छी
मान तोहर चित्र नोरसँ पोछैत छी

प्रीतकेँ पकड़ब सहज नै आँखिसँ बुझू
सत हियाकेँ हाथ लेने हँकमैत छी

आइ बदलल सन लगै छै दुषित हवा
एक जोड़ा मोर तन-मन मिलबैत छी

सोन सन जीवन निशामे मातल रहय
तेँ उधारी माँगि दुख पिबैत छी

धातुकेँ सोना तँ बनबै छै आगिये
तेँ सिनेहक आगिमे तन जड़बैत छी

बहरे जदीद
2122-2122-2212
अमित मिश्र

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

गजल

भरल साओनमें नहि सताउ सजनी
किया छी दूर, लग आबिजाउ सजनी

बरसि रहलै गरजि मेघ अंगनामें
अहाँ सेहो हमर संगमें भीजऽ आउ सजनी

पहिरके वस्त्र हरिअर शरीरमें प्रिय
हरितके संग सावन मनाउ सजनी

पियासल मोनमें, जरल एहि तनमें
ठरल नेहक अपेक्षा जगाउ सजनी

अहाँ छी हमर, हम बलम छी अहाँकें
हियामें रुप हमरे सजाउ सजनी

मिलनके आश पूरा कऽ लिअऽ प्रियतमसँ
मधुर मिलनक समय नहि लजाउ सजनी

अपन जानिकऽ अहाँ कुन्दनक हियापर
हँसीके तीर ठोरसँ चलाउ सजनी

१२२ २१२ २१२ १२२

© कुन्दन कुमार कर्ण
www.facebook.com/kundan.karna

सोमवार, 29 जुलाई 2013

गजल



ओकर हाथसँ छूल अछि देह
सदिखन गम गम फूल अछि देह

प्रेमक उच्चासन मिलन छैक
दू टा घाटक पूल अछि देह

कोना चलि सकतै गुजर आब
देहक तँ प्रतिकूल अछि देह

गेन्दा सिंगरहार छै मोन
चम्पा ओ अड़हूल अछि देह

ऐठाँ अनचिन्हार चिन्हार
सभ देहक समतूल अछि देह



मात्रा क्रम-222-2212-21 हरेक पाँतिमे

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

गजल

ठण्डा गरम एक रङ्ग प्रेम भेने
सभहँक बदलि जाइ ढ़ङ्ग प्रेम भेने

दुनियाँ तँ दुनियाँ मुदा देखू चरित्तर
मोनो अपन करत तङ्ग प्रेम भेने

केओ चलत भिन्न सदिखन भाइ तैओ
लगबे करत सभ तँ सङ्ग प्रेम भेने

हमरा तँ भेटल मुदा ओ देखलक नै
प्राणी होइत अछि अपङ्ग प्रेम भेने



कमसँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही.. मुदा अगिला शेर निकलि नै रहल अछि

गजलकार परिचय शृखंला भाग-39




कुन्दन कुमार कर्ण:


जहाँ धरि हमर जानकारी अछि कुंदन कुमार कर्ण नेपालक पहिल शाइर छथि जे की अरबी बहरमे गजल कहि रहल छथि। ( संपादक -अनचिन्हार आखर )



नाम : कुन्दन कुमार कर्ण
पिता : श्री शुशिल लाल कर्ण
माता : भारती कर्ण
जन्मतिथि : 23 Dec, 1988
जन्मस्थान : गा.वि.स. जमुनीमधेपुरा, वार्ड नं.-8, पोस्ट : राजविराज, जिला- सप्तरी, नेपाल
मूल वृति : नेपाल सरकारक नोकरीहारा (गृह-मन्त्रालय अन्तर्गत)
शिक्षा :
स्नातक (ब्यवस्थापन) : त्रिभुवन विश्वविद्यालय, श्री महेन्द्र बिन्देश्वरी बहुमुखी क्याम्पस, राजविराज
स्नातकोत्तर (ब्यवस्थापन) : र्इन्दिरा गान्धी खुला विश्वविद्यालय, नव दिल्ली (अध्ययनरत)
रूचिकs क्षेत्र : साहित्य, गीत, संगीत, अध्ययन, उदघोषण



हिनक किछु शब्दह हिनकहि शब्दमे---

हम एकटा सामान्य मध्यम वर्ग परिवारसँ छी । परिवारमें बाबू जी आ माय सहित हमरासँ छोट दू भाइ छैक । कनियेटासँ साहित्य, गीत, संगीतमें हमर रूचि रहि आएल छैक । हमर पहिल मैथिली कविता 'अभिनव' नामक मैथिली साहित्यिक द्वैमासिक पत्रिकामें अक्टुबर, 2003 में प्रकाशित भेलए । हम मैथिली गजल 2005 सँ लिखकें प्रारम्भ केलौं मुदा आधिकारिक रूपसँ पहिलबेर नेपालक पहिल पत्रिका(सरकारी पत्रिका) 'गोरखापत्र'में 18 सितम्बर, 2012 में प्रकाशित भेलए । अभिनयकें क्रममें मैथिली कवि परिषद, राजविराजद्वारा सञ्चालित एकटा कार्यक्रम अन्तर्गत नेपालक सात जिला : मोरंग, सुनसरी, सप्तरी, सिराहा, धनुषा, महोत्तरी आ सर्लाहीकs विभिन्न ठाममें सडक नाटकमें सहभागी भs अभिनय केलौं । वर्तमान समयमें कार्यव्यस्तता रहितौ समय निकालिकs गजल रचना करैत छी । मैथिली गजलकें लोप्रियताके लेल गजलप्रित पूर्ण रूपेन समर्पित फेसबुकपर मैथिली गजल एवं शेर-ओ-शायरी सम्बन्धि 'मैथिली गजल भंडार' नामक एकटा समूह आ ओहि नामसँ एकटा पेज संचालनकs मैथिली गजलसँ सम्बन्धित विभिन्न काममें लागल रहैत छी । एहि क्रममें फेसबुकपर आशिष अनचिन्हार जीसँ भेट भेलए । ओ हमरा अनचिन्हार आखरसँ जोडलखिन जाहिसँ हमरा गजल रचना सम्बन्धी आर ज्ञान भेटलए तेँ हम हुनक आभारी छी । संगे आशिष जीसँ जानकारी भेटल जे अरबी बहरमें गजल रचना कयनिहार हम नेपाल पहिल मैथिल गजलकार छी । र्इ सुनिकs हम बहुत खुशी भेलौं आ गजल रचना करs लेल हमरा एकटा नव उमंग आ उत्प्रेरणाके प्राप्ति भेलए ।

बुधवार, 3 जुलाई 2013

गजल

२१२ ११२१२ १२२२

दर्द हियक अहांसँ कहब हम कोना
चोट नेहसँ भरल सहब हम कोना

छोडि असगर जखन दूर रहबै प्रिय
भावमें बिन मिलन बहब हम कोना

ठोरपर चमकैत नव हँसिक मोती
दूर रहिक अहांसँ गहब हम कोना

संग जे नहि देबए अहाँ हमरा
आगु जीवनमें बरहब हम कोना

कहि रहल अछि गजलमें हियसँ 'कुन्दन'
बिन अहाँ प्रिय आब रहब हम कोना

© कुन्दन कुमार कर्ण
www.facebook.com/kundan.karna

सोमवार, 1 जुलाई 2013

गजलकार परिचय शृखंला भाग-38

पंकज चौधरी "नवलश्री"

प्रस्तुत अछि हिनक परिचय हिनकहि शब्दमे---

माएक नाउ : श्रीमती वन्दना देवी [गृहणी]
बाबूजीक नाउ : श्री भागेश्वर चौधरी [लोक स्वास्थ्य अभियंत्रणा विभाग (बिहार सरकार)मे कार्यरत]
जीवनसंगिनी : मनीषा चौधरी [स्नातक (प्रतिष्ठा), बी.एड.]
जन्मतिथि : 11-09-1980
जन्मस्थान : राजनगर (मधुबनी,  मिथिला)
निवासी : गाम एवं पत्रालय- सुगौना (चौधरी पट्टी)
प्रखण्ड - राजनगर,
जिला-मधुबनी, मिथिला

शिक्षा :
प्रारंभिक  : सेंट एंड्र्यूज स्कूल, भागलपुरसँ
माध्यमिक  : अनूप उच्च विद्यालय, भटसिमरीसँ
अंतर-स्नातक : यू पी वर्मा महाविद्यालय, मुंगेरसँ (विज्ञान विषयक संग)
स्नातक : रामकृष्ण महाविद्यालय, मधुबनीसँ (वाणिज्य विषयमे प्रतिष्ठा)

सम्प्रति आइ. सी. ए. आइ. (नव दिल्लीसँ) सी. ए. (फाइनल) आ आइ. सी. एस. आइ. (नव दिल्लीसँ) सी. एस. (फाइनल)मे अध्ययनरत। संगहिं एकटा निजी कम्पनीमे प्रबंधक (वित्त एवं कर) पदपर कार्यरत।        

रुचि : 
साहित्यिक गतिविधि, संगीत, अध्ययन-अध्यापन

साहित्यक क्षेत्रमे पहिल डेग :

पारिवारिक पृष्ठभूमिमे साहित्य कतहु नै छल। अंतर-स्नातक विज्ञानसँ आ स्नातक वाणिज्यसँ रहल मुदा तइयो साहित्य आ संगीत प्रति अनुराग सभदिन बनल रहल। चिट्ठी लिखबाक स'ख शुरुएसँ रहल। चिट्ठी सभके आकर्षक बनेबाक उद्देश्ये ओहिमे तुकबन्दीक किछु पांति सभ सेहो जोड़य लगलहुँ। आरम्भमे कविता, शायरी, कथा आ गीत प्रति प्रमुख आकर्षण रहल। अन्तर-स्नातकमे रही त' पहिल (हिन्दी भाषामे) कविता लिखने रही। तदुपरान्त निरंतर किछु-किछु लिखबाक प्रयास करैत रहलहुँ। कॉपीक आगाँक पन्ना दिससँ शैक्षणिक आ पाछाँ दिससँ साहित्यिक गतिविधि निरंतर चलैत रहल। ओहि समयावधिमे भरिसके कोनो एहन कॉपी छल होएत जाहिमे पाछाँ दिससँ किछु पन्ना पर तुकबन्दीक मोसि नहि टघरेने होए।

मैथिलीमे रचनाक आरम्भ :

आरंभिक शिक्षा भागलपुरसँ भेल मुदा घ'रक वातावरण सभदिन मैथिलीमयी रहल। धिया-पुतामे मैथिली-संस्कारक संचरण होइत रहए, एहि कारणें माए-बाबूजी शहरमे रहितो परिवारमे संवादक माध्यम मैथिलीए बनने रहलनि। नेनपनेसँ मैथिली प्रति हमरा बड्ड स्नेह रहल मुदा अंतर-स्नातक पूरा होए धरि रचनाक मादे मैथिलीमे किछु विशेष नै केलहुँ। स्नातक-अवधिमे मैथिली प्रति प्रेम जागल। आ से एना जागल जे हिन्दीमे लिखब बन्न भ' गेल। वर्ष 2001मे पहिल मैथिली कविता "माए मैथिली छथि आह्वान करैत" लिखलहुँ जे वर्ष 2012मे “मिथिमीडिया” आ “मैथिली दर्पण”सँ प्रकाशित सेहो भेल।

गजलकार रूपमे स्थान आ सामान :

वर्ष 2012 हमर लेखनी लेल विशिष्ट रहल। वर्षारंभमे मुखपोथीसँ जुड़लहुँ। मार्चमे आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरजी जहन "विदेह" समूहसँ जोड़लन्हि त' साहित्यक कएक टा अमूल्य रत्न सभसँ भेंट भेल। तदुपरान्त आशीष अनचिन्हार जी "अनचिन्हार आखर"सँ जुड़बा लेल हकारलन्हि। ओना त' रचना हम मुखपोथी, विदेह आ अनचिन्हार आखरसँ जुड़बासँ पहिलेहो करैत रही मुदा जँ "गजलकार" रूपमे हमरा स्थान आ सम्मान भेटल अछि त'  श्रेय हम निःसंकोच "विदेह" आ "अनचिन्हार आखर"कें देब। अनचिन्हार आखर  आ आशीष अनचिन्हारजीसँ गजलक मादे बहुत किछु सिखबाक-बुझबाक लेल भेटल। विशेष क' गजलक व्याकरण पक्षमे। मार्च 2012सँ  निरन्तर लिखैत रहलहुँ आ पाठकवर्गसँ सुझाव आ सहयोगक अपेक्षे "मुखपोथी" आ "अनचिन्हार आखर"पर परसैत रहलहुँ। रचनाकार आ पाठक लोकनिक अपूर्व सहयोग आ समर्थन भेटल। प्रोत्साहनसँ आर मेहनति करबाक लेल मनोबल भेटैत रहल।

विदेह आ अनचिन्हार आखरसँ जुड़लाक एक्के मास बाद अनचिन्हार आखर द्वारा प्रायोजित “गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" (बाल-गजल श्रेणी) सम्मानक पहिल चरण (मास अप्रैल 2012) लेल हमर एकटा बाल-गजल चयनित भेल। तदुपरान्त मास दिसंबर 2012 (पहिल चरण) लेल हमर एकटा गजल सेहो चुनल गेल। वर्ष-2012 लेल "गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" (गजल श्रेणीमे) सम्मान सेहो भेटल। मुख्य चयनकर्ता श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल" जीक प्रोत्साहन आ आशीष भेटल। संगहि एहि सम्मानक बाल-गजल श्रेणीमे श्रीमती प्रीती ठाकुरजी हमर बाल-गजलकें सराहलन्हि आ एकरा "तेसर स्थान"पर रखलन्हि।    

"विदेह" आ "अनचिन्हार आखरसँ" जुडलाक बाद पहिने "सरल-वार्णिक बहर" आ तदुपरांत "अरबी बहर"मे सेहो बहुत रास गजल कहलहुँ। आइ धरि लगभग सवा-सए गजल (गजल, बाल-गजल, भक्ति-गजल आ हजल मिला कँ) कहि चुकल छी आ लगभग 10-12 टा गजलकें पूर्ण रूप देब शेष अछि। एहि पाछाँ हमर मेहनति जे हो मुदा साहित्यिक संगी आ मार्गदर्शक लोकनिक सहयोग आ सुझाव सेहो महत्वपूर्ण अछि। एहि सहयोगक बिना एतेक आगाँ बढ़ब सहज नै।  

रचनाक प्रकाशन/प्रसारण/संकलन :
गजलक अलावा कविता, गीत, कथा, आलेख, रुबाई, हाइकू आदि सेहो लिखैत रहलहुँ अछि मुदा रचनामे गजलक बहुलता रहल अछि। मुखपोथीक अलावा बहुत रास गजल, कविता, गीत, कथा, आलेख पत्र-पत्रिका (विदेह-इ पत्रिका, मिथिमीडिया, श्री-मिथिला, मैथिली दर्पण, मिथिलांचल-टुडे, स्मारिका आदि)मे  सेहो छपैत रहल अछि। अगस्त 2012मे हमर एकटा हजल "हौ दैव किएक विआह केलहुँ …" जनकपुर (नेपाल) एफ.एम. (रेडियो)सँ प्रसारित सेहो भेल। कार्यक्रमक संचालक आदरणीय धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक बड्ड प्रोत्साहन भेटल। आदरणीय "तारानन्द वियोगी" जीक सुझाव आ भाइ "रौशन चौधरी" जीक सहयोगसँ अपन रचना सभके एकठाम समेटबा आ सरियेबाक उद्देश्यसँ नवम्बर 2012मे  "www.aanjur.in"नाउसँ एकगोट जालवृत सेहो बनवेलहुँ। जालवृतक माध्यमे सेहो बहुत रास प्रोत्साहन भेटल।

धन्यवाद ज्ञापन :
साहित्य आ संस्कार दुनु क्षेत्रमे हमर जे अर्जन अछि तकर पूर्ण श्रेय हम अपन माए-बाबूजी-भाए-बहिनकें देबए चाहब। संगहि गुरु श्री मुनीन्द्र नाथ मिश्र आ श्री जीवेश्वर चौधरी सदिखन पथप्रदर्शक रूपमे आशीष दैत रहलनि अछि। साहित्यिक बाटमे सेहो किछु एहन सखा आ मार्गदर्शक (गजेन्द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, चन्दन झा, राजीव रंजन मिश्र, अमित मिश्र, मनु भाइ, ओम प्रकाश झा, मिहिर झा, गुंजनश्री, आदि) सभ भेटलन्हि जनिका बिनु सभ बेमानी, सभकिछु सुन्ना। ऋणी छी पाठक लोकनिक जे अपन व्यस्त जीवन-शैलीसँ समय निकालि हमर रचना सभ पढ़लनि आ समुचित प्रोत्साहन आ मार्गदर्शन केलन्हि। संगहि आभार ओहि सभ व्यक्ति/संस्था प्रति जे हमर रचना सभके प्रकाशन/प्रसारण योग्य बुझलन्हि।





रविवार, 30 जून 2013

गजल

गजल-1.65

जगमे तँ सब दोषी मुदा दोष नै दी
नाँगर कहै आँगन बहुत टेढ़ छै जी

टूटल महल फाटल वसन सी सकब हम
कोना कऽ फाटल कोढ़ टूटल हिया सी

छै शहर भरिमे गजब डर आइ पसरल
कानै हवा लागैछ फेरो जरल धी

सबकेँ कहै छी चोर सब ठाम घपला
छथि चोर सजनी अपन बाजू करब की

ऐना सदति देखैत छी आ सजै छी
निज मोनमे यौ भाइ देखै कहाँ छी

टाका बनल छै काल सुखमे "अमित" के
छै रीत एहन पाइ खातिर मरै छी

2212-2212-2122
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.64

दरद नुकाएब बहुत कठिन छै
नोर सुखाएब बहुत कठिन छै

खूब जलन जीवनमे हो मगर
आगि लगाएब बहुत कठिन छै

बदलल युगमे बदलल छै नजरि
लाज बचाएब बहुत कठिन छै

लोक सगर पूरि रहल छै मुदा
सपन पुराएब बहुत कठिन छै

आगि मिझाओत 'अमित' महलकेँ
द्वेष मिझाएब बहुत कठिन छै

2112-2112-212
अमित मिश्र

शुक्रवार, 28 जून 2013

गजल

गजल-६०

प्राण टांगल रहत सजना पाती लिखब
नेह बान्हल रहत सजना पाती लिखब

जा क' परदेस जुनि हमरा बिसरब अहाँ
आश लागल रहत सजना पाती लिखब

बाट जोहब अहाँके बनि जोगन पिया
नैन थाकल रहत सजना पाती लिखब

स्वागतक लेल चौकठि ओगरने रहब
हार गांथल रहत सजना पाती लिखब

आंखि काजर सजल केशो गुहने रहब
ठोढ़ रांगल रहत सजना पाती लिखब

दिन अहाँ बिन हमर रहतै रूसल दुखी
राति जागल रहत सजना पाती लिखब

देशमे छी  " नवल "  चाहे परदेसमे
मोन तागल रहत सजना पाती लिखब  

*फाइलातुन+मफाईलुन+मुस्तफइलुन / मात्रा क्रम : २१२२-१२२२-२२१२
(तिथि-२३.०६.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५९

लाजसँ लाल भेलौं अहाँ
आँचरिमे नुकेलौं अहाँ

सुनु धड़कै करेजा कते
सोझसँ कात भेलौं अहाँ

लाजसँ लोल दबने मुदा
आंखिसँ बाजि गेलौं अहाँ

कारी आंखि काजर सजल
जानसँ मारि देलौं अहाँ

सुनि "नवलक"  सिनेहक गजल
जगके छोड़ि एलौं अहाँ

 >बहरे मुक्तबिज/मात्रा क्रम :२२२१+२२१२
(तिथि:२२.०६.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५८

नव बरखमे नव प्रतिज्ञा हम करै छी अहूँ करू
देहक सभ दुर्गुणक ह्त्या हम करै छी अहूँ करू

लोभक लोमड़ि द्वेषक दैता चुगली निंदा रीत भेलै
सभ कुरीतिक शुरू अवज्ञा हम करै छी अहूँ करू

निर्धनता अज्ञानक पसरल कारी राति डेराओन
जान-दीपसँ दूर अन्हरिया हम करै छी अहूँ करू

मैथिल छी त' मैथिली बाजू लाज किए संकोच कथीक
माए मैथिलीक मानक रक्षा हम करै छी अहूँ करू

मिथिलाक ओ गौरव पुनि चलू "नवल" आपस आनी
वैदेहीक सभ पूड़ सेहन्ता हम करै छी अहूँ करू

>आखर - २० / (तिथि: १४.०४.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५७

कौआ जँ कोइली बनि कूकत के कुचरत के देत सनेश
सभके मोजर सभक खगता अपना मे छै सभ विशेष

परतर गाम-शहरमे की अपन-अपन शोभा सभके
जतए रही से कर्मभूमि थिक देश कथी आ की परदेस

ठाढ़ केने छी हृदयक सीमा नेहक बखरा बाँट केलहुँ
अपने नै आनो सभ थूकत अपनामे जँ करब कलेश          

क छोडू कर्त्तव्य बिसरलहुँ  "अ" पढ़लौं अधिकार अबैए
कर्मठतामे सभसँ पाछू अगुआ बनि जे दए उपदेश  

एक चुनावक खेल छै सभटा एक बेर बस कुर्सी चाही
एक घोटाला हमरो नामे हमहूँ रंकसँ बनब नरेश

एहन व्यवस्था देख रहल छी लोकतंत्रमे आब "नवल"
ककरो भूखे अंतरी सटकल किओ करैए खूब निंघेष  

>आखर - २२ (तिथि: १५.०३.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५६

लोभ छोडू द्वेष भागत
नेह बाँटू नीक लागत

सच जँ बाजब मान भेटत
फूसिकें सभ लोल दागत

मैथिली भाषा अपन अछि
मैथिलक बड़ पैघ तागत

एकता मैथिल जँ राखब
सुतल मिथिला फेर जागत

फेर हँसती मैथिली माँ
नवल नव-विश्वास जागत

*फाइलातुन+फाइलातुन /  मात्राक्रम-२१२२+२१२२
(तिथि-१३.०३.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

गजल

गजल-५५

माथसँ घोघ ससरल जाए
चन्ना लाजहि सकुचल जाए

कजरायल नैना मधुशाला
मातल मोन बह्सल जाए

रूपक जालमे ओझराएल
बाट बटोही बिसरल जाए

माथक टिकुली ठोढ़क लाली
देखि अयना चनकल जाए

हाथक चूड़ी कंगना खनकै
सौंस करेजा दरकल जाए

आंखिसँ पीलौं "नवल" नेह जे
सगरो देह पसरल जाए          

 >आखर-११ (तिथि-२५.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५६

लोभ छोडू द्वेष भागत
नेह बाँटू नीक लागत

सच जँ बाजब मान भेटत
फूसिकें सभ लोल दागत

मैथिली भाषा अपन अछि
मैथिलक बड़ पैघ तागत

एकता मैथिल जँ राखब
सुतल मिथिला फेर जागत

फेर हँसती मैथिली माँ
नवल नव-विश्वास जागत

*फाइलातुन+फाइलातुन /  मात्राक्रम-२१२२+२१२२
(तिथि-१३.०३.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

गजल


गजल-५५
 
माथसँ घोघ ससरल जाए 
चन्ना लाजहि सकुचल जाए 
 
कजरायल नैना मधुशाला 
मातल मोन बह्सल जाए 
 
रूपक जालमे ओझराएल 
बाट बटोही बिसरल जाए 
 
माथक टिकुली ठोढ़क लाली 
देखि अयना चनकल जाए 
 
हाथक चूड़ी कंगना खनकै 
सौंस करेजा दरकल जाए
 
आंखिसँ पीलौं "नवल" नेह जे
सगरो देह पसरल जाए            
 
 >आखर-११ (तिथि-२५.०२.२०१३) 
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५४

अनकर कहल मानब कते
खा-खा ठेस कानब कते

बस किछु दिनक जिनगी त' नै
दिन जिनगीक गानब कते

छोडू पुरनका राग सभ
ऐ सिट्ठीसँ र'स छानब कते

बिनु साधनक की साधना
थूकसँ सातु सानब कते

चाही अपन अधिकार जे
माँगू "नवल' ठानब कते

>बहरे मुक्तबिज/मात्रा क्रम : २२२१-२२१२
(तिथि-१७.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५३

जे बुड़िबक छल अलबत यौ
तकरे भेटल बहुमत यौ

जनता फेर ठकेलै सभ
गेलै व्यर्थहि जनमत यौ

धन जनताक लुटा रहलै
जनतो छै चुप सहमत यौ

शोषण पाँच बरख चलतै
जनता कानत कलपत यौ

धर्मक दैत दुहाई ओ
जे नहि धर्मसँ अवगत यौ

नेता बनल कतेको कहि
दुर्दिन देशक बदलत यौ

लागै गप्प "नवल" एहन
टिटही टेकल पर्वत यौ

*मफऊलातु + मफाईलुन / मात्राक्रम-२२२१+१२२२
(तिथि-१३.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५२

मिथिलोमे रहल नै बास मैथिलीकें
टूटल जा रहल छै आश मैथिलीकें

कहियो मैथिली नै हिचकि-हिचकि कानल
देखू पलटि सभ इतिहास मैथिलीकें

चन्दा अमर यात्री सदति सभ शरणमे
विद्यापति सनक छल दास मैथिलीकें

सभके ठाम देलौं भेल मान सभके
भेटल अछि किए वनवास मैथिलीकें

बाजब-पढ़ब सदिखन मैथिली लिखब हम
जागत "नवल" पुनि विश्वास मैथिलीकें

>मात्रा क्रम : २२२१+२२२१+२१२२
(तिथि: ०५.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

गजल

गजल-५१

एलै घोर कलयुग हरत अन्हार के
सभटा बदलि गेलै नियम संसारकें

पछ्बा रीत अबिते भेल सभकिछु खतम
चरित्र के हनन आ पतन संस्कारकें

साहित्येसँ छै शोभा समाजक अपन
साहित्यक त' काजे सृजन श्रृंगारकें

बिलटत सभ कला सेहो कलाकार सन
भेटत मान जाधरि नै कलाकारकें

मायसँ मोह आ ने मातृभूमिसँ मुदा
सभ बैसल करू गप अपन अधिकारकें

बाजब "नवल" हमहूँ बेर एतै जहन
सय सोनारकें आ एक लोहारकें

>बहरे कबीर/मात्रा क्रम : २२२१+२२२१+२२१२
(तिथि: ०२.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री

गजल

गजल-५०

जिनगी भरि बस व्यर्थक चिंता
मरितहुँ लागल स्वर्गक चिंता

अन्नक खगल छै निर्धन चिंतित
करए धनिकहो अर्थक चिंता

पहिलुक भेटिते दसकें ललसा
दस पुरिते शुरू शतकक चिंता

बहुअक छथि बिआहल सभ मारल
काँचकुमारकें घटकक चिंता

आशा फ'रक सभके छै लागल
ककरो "नवल" नै कर्मक चिंता

*मात्रा क्रम: २२२+१२२+२२२
(तिथि-३१.०१.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-४९

हुनका संग लिअ' बढू आगाँ जे छथि अभियानक पक्षमे
चलू करै छी नव पहल पुनि नव-क्रांतिक उपलक्षमे

नमन करैत छी हुनका जे संग चलथि बनि सहभागी
हुनको भ्रम के दूर करब जे सभ छथि ठाढ़ विपक्षमे

चलू करी अनुपालन हुनकर जे छथि ज्ञानक अगुआ
पछुवाएल छथि जे अज्ञाने तनिको आनब समकक्षमे

कर्मठ छै जे कर्मभूमिमे हारत-जीतत हएत सफल
ओ की जानै मोल एकर जे बस गप छाँटै सूतल कक्षमे

"नवल" नाच नै आबै जकरा तकरा लै सभ अंगने टेढ़
घुरबाक लूरि ने जकरा से त्रुटि तकबे करतै अक्षमें

*आखर-२२ (तिथि-३०.०१.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-४८

प्रीत बनि क' हियामे रहबे करब हम
बनि नेह शोणितमे बह्बे करब हम

वेग मोडू बसातक हमर पएर छोडू
बसातक संगे-संग बहबे करब हम

किए बिसरैमे लागल छी हमरा अनेरे
छाँह बनि अहाँ संग रहबे करब हम

नै बुझलहुँ अहीं त' दोख अनकर कथी
ई तिरस्कारक तीर सहबे करब हम
       
छै किछु दिन लेल जिनगी तकर मोहे की
रेतीक भवन बनि ढहबे करब हम
       
मिठ लागत की क'रू तकर परवाह नै
जे सच छै उचित छै कहबे करब हम

अहाँ घोंटी गरल बूझि की पीबी सुधा कहि
"नवल" नेह-छाल्ही त' मह्बे करब हम

*आखर-१६ (तिथि: २८.०१.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

बाल गजल

बाल गजल-२४

दू टा बस सोहारी चाही
माँ कम्मे तरकारी चाही

पुरना छिपलीमे नै खेबौ
हमरो नवका थारी चाही

हमहूँ जेबै इसकुल बाबू
पूरा सभ तैयारी चाही

हाटसँ आनू पोथी-बस्ता
मौजा-जूता कारी चाही

इसकूलक जलखैमे हलुआ
पूरी आ तरकारी चाही

छीटब बीया गाछो रोपब
आँगन लग फुलवारी चाही

"नवल"सँ नै हम लट्टू माँगब
हमरो कठही गाड़ी चाही

 >मात्रा क्रम : आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे          
(तिथि-२२.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

बाल गजल


बाल गजल-२३

दीदी जँ चढ़ि गेल कनहा-गाछी चट द' रूसल कोरा लए
चुल्लरि भेटिते दोसर बहन्ना कानल आब कटोरा लए 

झिल्ली-कचरी घिरनी-फुकना बाबू गेलनि हाटसँ आनए
साइकिलक घंटी बजिते दौगल दलान पर झोड़ा लए 

बैसल सभ झोड़ा घेरने अपन-अपन अनमाना लेल 
जे अनूप से बाँटि क' खेलक बँझि गेल मारि अंगोरा लए         
    
आँगन नीपल अरिपन पाड़ल आइ फेर छै पूजामानी 
आसन परमे त' पंडितजी बैसल ओ औनेलै बोरा लए 

घड़िघंटा आ शंख बाजि गेल चौरठ आ परसादी भेटतै 
"नवल" नञि लेतै एकटा लड्डू मुँह फुलेलक जोड़ा लए           

*आखर-२२ (तिथि-१४.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री" 

सोमवार, 24 जून 2013

गजल

गजल

हम हाल की कहौँ आब बेहाल अछि
बड्ड कठिनसँ बीतल ई साल अछि

जानि नै मृत्यु हाएत केहन हमर
जीबैत जिनगी बनल जंजाल अछि

भ्रष्ट्राचारक गप्प जुनि करु भाइ यौ
नेता अफसर घूसलऽ नेहाल अछि

खूब मजा करु जा धरि अछि जिनगी
काल्हि लऽ जेबाले बैसल उ काल अछि

साँच बाजनिहार नै अछि कोनो ठाम
यौ फूसिक व्यापारमे बड्ड माल अछि

कलपै कानै भीतरे भीतर 'मुकुन्द'
प्रेममे सभक होएत ई हाल अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 14
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

जहियासँ अपन घर नाहि अछि
तहियासँ केकरो डर नाहि अछि

मोनक बात केकरा कहब आब
ऐहि ठाम कियौ हमर नाहि अछि

वियोगे हमतऽ कलपौँ असगर
अहाँ पर कोनो असर नाहि अछि

सास-पूतोहमे कलह मचल छै
बाँकी ऐहिसँ कोनो घर नाहि अछि

माँग बढ़ल दहेजक चहुँ दिस
आदर्श वियाहक वर नाहि अछि

सभ ठाम दंगा पसरल 'मुकुन्द'
शीश सहित कोनो धड़ नाहि अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

रविवार, 23 जून 2013

गजल

गजल @ कुन्दन कुमार कर्ण
 

जीनगी एक वरदान छी
र्इश्वरक देलहा दान छी


सोच राखू नम्हर मोनमें
जीनगी सुनर सम्मान छी

हटिक नै, डटिक जियबै जखन
जीनगी तखन गूमान छी


खेल बूझब जखन एकरा
जीनगी तखन आसान छी

कर्म पथपर चलू नित समय
कर्म मानवक पहिचान छी

बाट बाटपर बूझी चलू
जीनगी एकटा ज्ञान छी

कथन 'कुन्दन' कहैछै अपन
जीनगी दू दिनक चान छी


२१२-२१२-२१२ (फाइलुन-तीन बेर)
बहरे-मुतदारिक
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मंगलवार, 4 जून 2013

गजल

गजल
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नजरिमें नजरि तऽ मिलाक देखू
दीप नेहके तऽ जराक देखू

दिल अखन कली अछि प्रिय अहाँकें
ओ कली अहाँ तऽ खिलाक देखू

चेहरा अहाँक चमैक जेतै
आँखिमें अहाँ तऽ बसाक देखू

दोहराक भेटत नहि जवानी
मोनमें उमंग जगाक देखू

बरसि पडत सावन जीनगीमें
हमर लेल रूप सजाक देखू

२१२-१२११२-१२२
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© कुन्दन कुमार कर्ण

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रविवार, 2 जून 2013

गजल

हम जँ पीलहुँ शराबी कहलक जमाना

टीस नहि दुख करेजक बुझलक जमाना

 

भटकलहुँ बड्ड   भेटेए नेह  मोनक

देख मुँह नहि करेजक सुनलक जमाना

 

छल कपारक लिखल ई कोना कहू की

आँखि रहितो हमर सुख छिनलक जमाना

 

नहि हमर दोख नहि ककरो आर कहियौ

देख हारैत हमरा   हँसलक जमाना

 

दर्द भेटल बुझब नहि ‘मनु’केँ कनी छल

आन अनकर कखन दुख जनलक जमाना

 

(बहरे असम, मात्राक्रम  2122-1222-2122)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

सोमवार, 27 मई 2013

रविवार, 19 मई 2013

गजल

अछि जँ ई जिनगी  प्रेम केनाइ सीखू

डर बिसरि जगमे दुख मिटेनाइ सीखू

 

काल्हिकेँ नै कोनो भरोसा बचल अछि

आइ सभकेँ  अप्पन बनेनाइ सीखू

 

जीवनक सुख दुख बाट दू छैक बुझलौं

दूबटीयापर हँसि क  गेनाइ सीखू

 

राग मनमे प्रेमक जगाबैत सगरो

आँखि सबहक सोझाँ उठेनाइ सीखू

 

‘मनु’ अछुत छै अपने किए मानने छी

डाह बिसइर छाती लगेनाइ सीखू

 

(बहरे खफीक, मात्राक्रम  2122-2212-2122) 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 

शुक्रवार, 17 मई 2013

रुबाइ

रुबाइ-168

दस बर्षक नेना काज करै होटलमे
भोजन लेल बीछै कचरा फेकलमे
मजदूरक लेल दिवस की आ राति की?
सदिखन दर्दक समय जिनगी घोकलमे

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गुरुवार, 16 मई 2013

गजल

गजल

रौद आ बिहाड़िसँ जे लड़ल अछि एहि ठाम
ओतबे गाछ पैघ भऽ बचल अछि एहि ठाम

भूखल छथि राति दिन जाहि लेल गरीब यौ
किनको खरिहानमे सड़ल अछि एहि ठाम

एहि टेक्निकल युगमे बी ए केने हाएत की
एम ए कऽ गाम गाम पड़ल अछि एहि ठाम

जे विपत्तिमे धैर्य राखि लागल अछि काजमे
ओ नभमे चान बनि सजल अछि एहि ठाम

भ्रष्टाचारी शासनमेँ बीकल सरकारी सीट
चुप्पी मारि लोक घरे सूतल अछि एहि ठाम

गेल युग श्रवणकेँ माँ बापक कोनो मोले नै
बूढ़ पूराण पूतसँ डरल अछि एहि ठाम

सरल वार्णिक बहर ,आखर 17
© "बाल मुकुन्द" ।।

गजल

गजल

मिललौँ अपन चानसँ भेल पुलकित मोन
बीतल पहर विरहक भेल हर्षित मोन

छल आँखि सागर ताहिसँ सुनामी उठल
बहलौँ तकर वेगसँ भेल विचलित मोन

बाजल तँ जेना बुझु फूल झहरल मुखसँ
ठोरक मधुर गानसँ भेल शोभित मोन

ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल
पायलक सुनते स्वर भेल जीबित मोन

प्रीतक तराजू पर तौललौँ धन अपन
विरहक दिया जड़ते भेल पीड़ित मोन

बहरे सलीम ,मात्राक्रम २२१२ २२२१ २२२१
© बाल मुकुन्द पाठक

सोमवार, 13 मई 2013

गजल


गजल
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मोनके बात कहि दिअ
प्रेमके संग बहि दिअ

दिल हमर अखन खाली
ताहिमें प्रिय रहि दिअ

मीठगर चोट नेहक 
कनि अहाँ प्रिय सहि दिअ

ठोरपर हँसिक मोती
हँसि हँसिक प्रिय गहि दिअ

भावना हमर लिअ बुझि
दर्द मधुरसन नहि दिअ
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फायलुन्-फाइलातुन्.
२१२-२१२२

© लेखक - कुन्दन कुमार कर्ण
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सोमवार, 6 मई 2013

गजल

कनी हमरो बजा दिअ माँ  
अपन दर्शन करा दिअ माँ

कते आशा लगोने छी
अपन चाकर बना दिअ माँ

जनम भरि बनि टुगर रहलहुँ
सिनेहक निर चटा दिअ माँ   

जँ हम नेना अहाँकेँ छी
अलख मनमे जगा दिअ माँ

सुखेलै नोर जरि आँखिक
चरण ‘मनु’केँ दखा दिअ माँ   

(बहरे हजज, मात्रा क्रम – १२२२-१२२२)
जगदानन्द झा ‘मनु’ 

रविवार, 5 मई 2013

रुबाइ

रुबाइ-169
तूँ प्रेम करै छें वा जादू- टोना
तूँ मोहलें करेजक सबटा कोणा
हम तेजब प्राण अहुरिया काटि, सुन
बनबें जँ नै अमितक आँगनक सोना

गुरुवार, 2 मई 2013

रुबाइ

रुबाइ-168

दस बर्षक नेना काज करै होटलमे
भोजन लेल बीछै कचरा फेकलमे
मजदूरक लेल दिवस की आ राति की?
सदिखन दर्दक समय जिनगी घोकलमे

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों