Thursday, 22 December 2011

गजल


आकाश बड्ड छै शांत, भरिसक बिहाडि आबै छै।
ओंघरैत सब एहि मे बलौं ओहार ओढाबै छै।

पोछि दियौ झहरैत नोर अहाँ निशब्द आँखिक,
आँखिक नोर थीक लुत्ती झट सँ आगि लगाबै छै।

चिन्है छै सब ओकरा कतेक स्वाँग रचेतै आब,
तखनो ओ सभ केँ बिपटा बनि नाच देखाबै छै।

नंगटे भेल छै तखनो कुर्सीक मोह नै छूटल,
कुर्सीक इ सौख ओकरा किछ सँ किछ कराबै छै।

रोकि सकै छै कियो नै, सागर मे जौं उफान एलै,
परतारै लेल देखियौ माटिक बान्ह बनाबै छै।
--------------- वर्ण १८ -----------------

1 comment:

  1. रोकि सकै छै कियो नै, सागर मे जौं उफान एलै,
    परतारै लेल देखियौ माटिक बान्ह बनाबै छै।बड सुन्दर कहलौं ओम बाबु!

    ReplyDelete

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों