Friday, 9 December 2011

गजल

भाइ आब हमहूँ   लिखब अपन फूटल कपारपर
जेना ई  भात-दालि तीमन ओकर उपर अचारपर

सोन सनक घर-आँगन  स्वर्ग सन हमर परिवार
छोड़ि एलहुँ देश अपन  दू-चारि टकाक बेपारपर

कनिको आटा नहि एगो जाँता नहि करछु कराही नहि
नून-मिरचाइ आनि लेलहुँ सभटा पैंच-उधारपर

चिन्हलक नै केओ नै जानलक तूअर बनि रहलहुँ
गेलहुँ ई अपन माटि-पानि छोड़ि दोसरक द्वारपर

हम कमेलौं घर ओ भरलक हमर खोपड़ी खालिए
आब बैसल मनुकनैए   बरखामे चुबैत चारपर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१)

@ जगदानन्द झा ‘मनु’

4 comments:

  1. एही गजल लिखै में सम्पूर्ण योगदान छैन -आशीष अनचिन्हारजी व् गजेन्द्र ठाकुरजी कए,दुनु गोते कए सादर धन्यवाद |

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  2. बाह- बाह,
    मनुजी बहुत बढियां अपनेक ई गज़ल लागल .बास्तव में मानव कए सोचबाक लेल ई प्रेरित कर्तैंह .
    पुनह धन्यवाद अहि लेल जए अपने मातृभाषाक लेल किछु समय लगावैत छी .

    अपनेक,
    जे.एस. चौधरी

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  3. मनु जी ! बहुत सुन्दर गजल लिखलहुँ अछि !पढिकय मोन प्रशन्न भS गेल !

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  4. हार्दिक धन्यवाद, जटाशंकरजी आ अनिलजी |

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों