मंगलवार, 30 जुलाई 2013

गजल

भरल साओनमें नहि सताउ सजनी
किया छी दूर, लग आबिजाउ सजनी

बरसि रहलै गरजि मेघ अंगनामें
अहाँ सेहो हमर संगमें भीजऽ आउ सजनी

पहिरके वस्त्र हरिअर शरीरमें प्रिय
हरितके संग सावन मनाउ सजनी

पियासल मोनमें, जरल एहि तनमें
ठरल नेहक अपेक्षा जगाउ सजनी

अहाँ छी हमर, हम बलम छी अहाँकें
हियामें रुप हमरे सजाउ सजनी

मिलनके आश पूरा कऽ लिअऽ प्रियतमसँ
मधुर मिलनक समय नहि लजाउ सजनी

अपन जानिकऽ अहाँ कुन्दनक हियापर
हँसीके तीर ठोरसँ चलाउ सजनी

१२२ २१२ २१२ १२२

© कुन्दन कुमार कर्ण
www.facebook.com/kundan.karna

सोमवार, 29 जुलाई 2013

गजल



ओकर हाथसँ छूल अछि देह
सदिखन गम गम फूल अछि देह

प्रेमक उच्चासन मिलन छैक
दू टा घाटक पूल अछि देह

कोना चलि सकतै गुजर आब
देहक तँ प्रतिकूल अछि देह

गेन्दा सिंगरहार छै मोन
चम्पा ओ अड़हूल अछि देह

ऐठाँ अनचिन्हार चिन्हार
सभ देहक समतूल अछि देह



मात्रा क्रम-222-2212-21 हरेक पाँतिमे

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

गजल

ठण्डा गरम एक रङ्ग प्रेम भेने
सभहँक बदलि जाइ ढ़ङ्ग प्रेम भेने

दुनियाँ तँ दुनियाँ मुदा देखू चरित्तर
मोनो अपन करत तङ्ग प्रेम भेने

केओ चलत भिन्न सदिखन भाइ तैओ
लगबे करत सभ तँ सङ्ग प्रेम भेने

हमरा तँ भेटल मुदा ओ देखलक नै
प्राणी होइत अछि अपङ्ग प्रेम भेने



कमसँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही.. मुदा अगिला शेर निकलि नै रहल अछि

गजलकार परिचय शृखंला भाग-39




कुन्दन कुमार कर्ण:


जहाँ धरि हमर जानकारी अछि कुंदन कुमार कर्ण नेपालक पहिल शाइर छथि जे की अरबी बहरमे गजल कहि रहल छथि। ( संपादक -अनचिन्हार आखर )



नाम : कुन्दन कुमार कर्ण
पिता : श्री शुशिल लाल कर्ण
माता : भारती कर्ण
जन्मतिथि : 23 Dec, 1988
जन्मस्थान : गा.वि.स. जमुनीमधेपुरा, वार्ड नं.-8, पोस्ट : राजविराज, जिला- सप्तरी, नेपाल
मूल वृति : नेपाल सरकारक नोकरीहारा (गृह-मन्त्रालय अन्तर्गत)
शिक्षा :
स्नातक (ब्यवस्थापन) : त्रिभुवन विश्वविद्यालय, श्री महेन्द्र बिन्देश्वरी बहुमुखी क्याम्पस, राजविराज
स्नातकोत्तर (ब्यवस्थापन) : र्इन्दिरा गान्धी खुला विश्वविद्यालय, नव दिल्ली (अध्ययनरत)
रूचिकs क्षेत्र : साहित्य, गीत, संगीत, अध्ययन, उदघोषण



हिनक किछु शब्दह हिनकहि शब्दमे---

हम एकटा सामान्य मध्यम वर्ग परिवारसँ छी । परिवारमें बाबू जी आ माय सहित हमरासँ छोट दू भाइ छैक । कनियेटासँ साहित्य, गीत, संगीतमें हमर रूचि रहि आएल छैक । हमर पहिल मैथिली कविता 'अभिनव' नामक मैथिली साहित्यिक द्वैमासिक पत्रिकामें अक्टुबर, 2003 में प्रकाशित भेलए । हम मैथिली गजल 2005 सँ लिखकें प्रारम्भ केलौं मुदा आधिकारिक रूपसँ पहिलबेर नेपालक पहिल पत्रिका(सरकारी पत्रिका) 'गोरखापत्र'में 18 सितम्बर, 2012 में प्रकाशित भेलए । अभिनयकें क्रममें मैथिली कवि परिषद, राजविराजद्वारा सञ्चालित एकटा कार्यक्रम अन्तर्गत नेपालक सात जिला : मोरंग, सुनसरी, सप्तरी, सिराहा, धनुषा, महोत्तरी आ सर्लाहीकs विभिन्न ठाममें सडक नाटकमें सहभागी भs अभिनय केलौं । वर्तमान समयमें कार्यव्यस्तता रहितौ समय निकालिकs गजल रचना करैत छी । मैथिली गजलकें लोप्रियताके लेल गजलप्रित पूर्ण रूपेन समर्पित फेसबुकपर मैथिली गजल एवं शेर-ओ-शायरी सम्बन्धि 'मैथिली गजल भंडार' नामक एकटा समूह आ ओहि नामसँ एकटा पेज संचालनकs मैथिली गजलसँ सम्बन्धित विभिन्न काममें लागल रहैत छी । एहि क्रममें फेसबुकपर आशिष अनचिन्हार जीसँ भेट भेलए । ओ हमरा अनचिन्हार आखरसँ जोडलखिन जाहिसँ हमरा गजल रचना सम्बन्धी आर ज्ञान भेटलए तेँ हम हुनक आभारी छी । संगे आशिष जीसँ जानकारी भेटल जे अरबी बहरमें गजल रचना कयनिहार हम नेपाल पहिल मैथिल गजलकार छी । र्इ सुनिकs हम बहुत खुशी भेलौं आ गजल रचना करs लेल हमरा एकटा नव उमंग आ उत्प्रेरणाके प्राप्ति भेलए ।

बुधवार, 3 जुलाई 2013

गजल

२१२ ११२१२ १२२२

दर्द हियक अहांसँ कहब हम कोना
चोट नेहसँ भरल सहब हम कोना

छोडि असगर जखन दूर रहबै प्रिय
भावमें बिन मिलन बहब हम कोना

ठोरपर चमकैत नव हँसिक मोती
दूर रहिक अहांसँ गहब हम कोना

संग जे नहि देबए अहाँ हमरा
आगु जीवनमें बरहब हम कोना

कहि रहल अछि गजलमें हियसँ 'कुन्दन'
बिन अहाँ प्रिय आब रहब हम कोना

© कुन्दन कुमार कर्ण
www.facebook.com/kundan.karna

सोमवार, 1 जुलाई 2013

गजलकार परिचय शृखंला भाग-38

पंकज चौधरी "नवलश्री"

प्रस्तुत अछि हिनक परिचय हिनकहि शब्दमे---

माएक नाउ : श्रीमती वन्दना देवी [गृहणी]
बाबूजीक नाउ : श्री भागेश्वर चौधरी [लोक स्वास्थ्य अभियंत्रणा विभाग (बिहार सरकार)मे कार्यरत]
जीवनसंगिनी : मनीषा चौधरी [स्नातक (प्रतिष्ठा), बी.एड.]
जन्मतिथि : 11-09-1980
जन्मस्थान : राजनगर (मधुबनी,  मिथिला)
निवासी : गाम एवं पत्रालय- सुगौना (चौधरी पट्टी)
प्रखण्ड - राजनगर,
जिला-मधुबनी, मिथिला

शिक्षा :
प्रारंभिक  : सेंट एंड्र्यूज स्कूल, भागलपुरसँ
माध्यमिक  : अनूप उच्च विद्यालय, भटसिमरीसँ
अंतर-स्नातक : यू पी वर्मा महाविद्यालय, मुंगेरसँ (विज्ञान विषयक संग)
स्नातक : रामकृष्ण महाविद्यालय, मधुबनीसँ (वाणिज्य विषयमे प्रतिष्ठा)

सम्प्रति आइ. सी. ए. आइ. (नव दिल्लीसँ) सी. ए. (फाइनल) आ आइ. सी. एस. आइ. (नव दिल्लीसँ) सी. एस. (फाइनल)मे अध्ययनरत। संगहिं एकटा निजी कम्पनीमे प्रबंधक (वित्त एवं कर) पदपर कार्यरत।        

रुचि : 
साहित्यिक गतिविधि, संगीत, अध्ययन-अध्यापन

साहित्यक क्षेत्रमे पहिल डेग :

पारिवारिक पृष्ठभूमिमे साहित्य कतहु नै छल। अंतर-स्नातक विज्ञानसँ आ स्नातक वाणिज्यसँ रहल मुदा तइयो साहित्य आ संगीत प्रति अनुराग सभदिन बनल रहल। चिट्ठी लिखबाक स'ख शुरुएसँ रहल। चिट्ठी सभके आकर्षक बनेबाक उद्देश्ये ओहिमे तुकबन्दीक किछु पांति सभ सेहो जोड़य लगलहुँ। आरम्भमे कविता, शायरी, कथा आ गीत प्रति प्रमुख आकर्षण रहल। अन्तर-स्नातकमे रही त' पहिल (हिन्दी भाषामे) कविता लिखने रही। तदुपरान्त निरंतर किछु-किछु लिखबाक प्रयास करैत रहलहुँ। कॉपीक आगाँक पन्ना दिससँ शैक्षणिक आ पाछाँ दिससँ साहित्यिक गतिविधि निरंतर चलैत रहल। ओहि समयावधिमे भरिसके कोनो एहन कॉपी छल होएत जाहिमे पाछाँ दिससँ किछु पन्ना पर तुकबन्दीक मोसि नहि टघरेने होए।

मैथिलीमे रचनाक आरम्भ :

आरंभिक शिक्षा भागलपुरसँ भेल मुदा घ'रक वातावरण सभदिन मैथिलीमयी रहल। धिया-पुतामे मैथिली-संस्कारक संचरण होइत रहए, एहि कारणें माए-बाबूजी शहरमे रहितो परिवारमे संवादक माध्यम मैथिलीए बनने रहलनि। नेनपनेसँ मैथिली प्रति हमरा बड्ड स्नेह रहल मुदा अंतर-स्नातक पूरा होए धरि रचनाक मादे मैथिलीमे किछु विशेष नै केलहुँ। स्नातक-अवधिमे मैथिली प्रति प्रेम जागल। आ से एना जागल जे हिन्दीमे लिखब बन्न भ' गेल। वर्ष 2001मे पहिल मैथिली कविता "माए मैथिली छथि आह्वान करैत" लिखलहुँ जे वर्ष 2012मे “मिथिमीडिया” आ “मैथिली दर्पण”सँ प्रकाशित सेहो भेल।

गजलकार रूपमे स्थान आ सामान :

वर्ष 2012 हमर लेखनी लेल विशिष्ट रहल। वर्षारंभमे मुखपोथीसँ जुड़लहुँ। मार्चमे आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरजी जहन "विदेह" समूहसँ जोड़लन्हि त' साहित्यक कएक टा अमूल्य रत्न सभसँ भेंट भेल। तदुपरान्त आशीष अनचिन्हार जी "अनचिन्हार आखर"सँ जुड़बा लेल हकारलन्हि। ओना त' रचना हम मुखपोथी, विदेह आ अनचिन्हार आखरसँ जुड़बासँ पहिलेहो करैत रही मुदा जँ "गजलकार" रूपमे हमरा स्थान आ सम्मान भेटल अछि त'  श्रेय हम निःसंकोच "विदेह" आ "अनचिन्हार आखर"कें देब। अनचिन्हार आखर  आ आशीष अनचिन्हारजीसँ गजलक मादे बहुत किछु सिखबाक-बुझबाक लेल भेटल। विशेष क' गजलक व्याकरण पक्षमे। मार्च 2012सँ  निरन्तर लिखैत रहलहुँ आ पाठकवर्गसँ सुझाव आ सहयोगक अपेक्षे "मुखपोथी" आ "अनचिन्हार आखर"पर परसैत रहलहुँ। रचनाकार आ पाठक लोकनिक अपूर्व सहयोग आ समर्थन भेटल। प्रोत्साहनसँ आर मेहनति करबाक लेल मनोबल भेटैत रहल।

विदेह आ अनचिन्हार आखरसँ जुड़लाक एक्के मास बाद अनचिन्हार आखर द्वारा प्रायोजित “गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" (बाल-गजल श्रेणी) सम्मानक पहिल चरण (मास अप्रैल 2012) लेल हमर एकटा बाल-गजल चयनित भेल। तदुपरान्त मास दिसंबर 2012 (पहिल चरण) लेल हमर एकटा गजल सेहो चुनल गेल। वर्ष-2012 लेल "गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" (गजल श्रेणीमे) सम्मान सेहो भेटल। मुख्य चयनकर्ता श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल" जीक प्रोत्साहन आ आशीष भेटल। संगहि एहि सम्मानक बाल-गजल श्रेणीमे श्रीमती प्रीती ठाकुरजी हमर बाल-गजलकें सराहलन्हि आ एकरा "तेसर स्थान"पर रखलन्हि।    

"विदेह" आ "अनचिन्हार आखरसँ" जुडलाक बाद पहिने "सरल-वार्णिक बहर" आ तदुपरांत "अरबी बहर"मे सेहो बहुत रास गजल कहलहुँ। आइ धरि लगभग सवा-सए गजल (गजल, बाल-गजल, भक्ति-गजल आ हजल मिला कँ) कहि चुकल छी आ लगभग 10-12 टा गजलकें पूर्ण रूप देब शेष अछि। एहि पाछाँ हमर मेहनति जे हो मुदा साहित्यिक संगी आ मार्गदर्शक लोकनिक सहयोग आ सुझाव सेहो महत्वपूर्ण अछि। एहि सहयोगक बिना एतेक आगाँ बढ़ब सहज नै।  

रचनाक प्रकाशन/प्रसारण/संकलन :
गजलक अलावा कविता, गीत, कथा, आलेख, रुबाई, हाइकू आदि सेहो लिखैत रहलहुँ अछि मुदा रचनामे गजलक बहुलता रहल अछि। मुखपोथीक अलावा बहुत रास गजल, कविता, गीत, कथा, आलेख पत्र-पत्रिका (विदेह-इ पत्रिका, मिथिमीडिया, श्री-मिथिला, मैथिली दर्पण, मिथिलांचल-टुडे, स्मारिका आदि)मे  सेहो छपैत रहल अछि। अगस्त 2012मे हमर एकटा हजल "हौ दैव किएक विआह केलहुँ …" जनकपुर (नेपाल) एफ.एम. (रेडियो)सँ प्रसारित सेहो भेल। कार्यक्रमक संचालक आदरणीय धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक बड्ड प्रोत्साहन भेटल। आदरणीय "तारानन्द वियोगी" जीक सुझाव आ भाइ "रौशन चौधरी" जीक सहयोगसँ अपन रचना सभके एकठाम समेटबा आ सरियेबाक उद्देश्यसँ नवम्बर 2012मे  "www.aanjur.in"नाउसँ एकगोट जालवृत सेहो बनवेलहुँ। जालवृतक माध्यमे सेहो बहुत रास प्रोत्साहन भेटल।

धन्यवाद ज्ञापन :
साहित्य आ संस्कार दुनु क्षेत्रमे हमर जे अर्जन अछि तकर पूर्ण श्रेय हम अपन माए-बाबूजी-भाए-बहिनकें देबए चाहब। संगहि गुरु श्री मुनीन्द्र नाथ मिश्र आ श्री जीवेश्वर चौधरी सदिखन पथप्रदर्शक रूपमे आशीष दैत रहलनि अछि। साहित्यिक बाटमे सेहो किछु एहन सखा आ मार्गदर्शक (गजेन्द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, चन्दन झा, राजीव रंजन मिश्र, अमित मिश्र, मनु भाइ, ओम प्रकाश झा, मिहिर झा, गुंजनश्री, आदि) सभ भेटलन्हि जनिका बिनु सभ बेमानी, सभकिछु सुन्ना। ऋणी छी पाठक लोकनिक जे अपन व्यस्त जीवन-शैलीसँ समय निकालि हमर रचना सभ पढ़लनि आ समुचित प्रोत्साहन आ मार्गदर्शन केलन्हि। संगहि आभार ओहि सभ व्यक्ति/संस्था प्रति जे हमर रचना सभके प्रकाशन/प्रसारण योग्य बुझलन्हि।





रविवार, 30 जून 2013

गजल

गजल-1.65

जगमे तँ सब दोषी मुदा दोष नै दी
नाँगर कहै आँगन बहुत टेढ़ छै जी

टूटल महल फाटल वसन सी सकब हम
कोना कऽ फाटल कोढ़ टूटल हिया सी

छै शहर भरिमे गजब डर आइ पसरल
कानै हवा लागैछ फेरो जरल धी

सबकेँ कहै छी चोर सब ठाम घपला
छथि चोर सजनी अपन बाजू करब की

ऐना सदति देखैत छी आ सजै छी
निज मोनमे यौ भाइ देखै कहाँ छी

टाका बनल छै काल सुखमे "अमित" के
छै रीत एहन पाइ खातिर मरै छी

2212-2212-2122
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.64

दरद नुकाएब बहुत कठिन छै
नोर सुखाएब बहुत कठिन छै

खूब जलन जीवनमे हो मगर
आगि लगाएब बहुत कठिन छै

बदलल युगमे बदलल छै नजरि
लाज बचाएब बहुत कठिन छै

लोक सगर पूरि रहल छै मुदा
सपन पुराएब बहुत कठिन छै

आगि मिझाओत 'अमित' महलकेँ
द्वेष मिझाएब बहुत कठिन छै

2112-2112-212
अमित मिश्र

शुक्रवार, 28 जून 2013

गजल

गजल-६०

प्राण टांगल रहत सजना पाती लिखब
नेह बान्हल रहत सजना पाती लिखब

जा क' परदेस जुनि हमरा बिसरब अहाँ
आश लागल रहत सजना पाती लिखब

बाट जोहब अहाँके बनि जोगन पिया
नैन थाकल रहत सजना पाती लिखब

स्वागतक लेल चौकठि ओगरने रहब
हार गांथल रहत सजना पाती लिखब

आंखि काजर सजल केशो गुहने रहब
ठोढ़ रांगल रहत सजना पाती लिखब

दिन अहाँ बिन हमर रहतै रूसल दुखी
राति जागल रहत सजना पाती लिखब

देशमे छी  " नवल "  चाहे परदेसमे
मोन तागल रहत सजना पाती लिखब  

*फाइलातुन+मफाईलुन+मुस्तफइलुन / मात्रा क्रम : २१२२-१२२२-२२१२
(तिथि-२३.०६.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५९

लाजसँ लाल भेलौं अहाँ
आँचरिमे नुकेलौं अहाँ

सुनु धड़कै करेजा कते
सोझसँ कात भेलौं अहाँ

लाजसँ लोल दबने मुदा
आंखिसँ बाजि गेलौं अहाँ

कारी आंखि काजर सजल
जानसँ मारि देलौं अहाँ

सुनि "नवलक"  सिनेहक गजल
जगके छोड़ि एलौं अहाँ

 >बहरे मुक्तबिज/मात्रा क्रम :२२२१+२२१२
(तिथि:२२.०६.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५८

नव बरखमे नव प्रतिज्ञा हम करै छी अहूँ करू
देहक सभ दुर्गुणक ह्त्या हम करै छी अहूँ करू

लोभक लोमड़ि द्वेषक दैता चुगली निंदा रीत भेलै
सभ कुरीतिक शुरू अवज्ञा हम करै छी अहूँ करू

निर्धनता अज्ञानक पसरल कारी राति डेराओन
जान-दीपसँ दूर अन्हरिया हम करै छी अहूँ करू

मैथिल छी त' मैथिली बाजू लाज किए संकोच कथीक
माए मैथिलीक मानक रक्षा हम करै छी अहूँ करू

मिथिलाक ओ गौरव पुनि चलू "नवल" आपस आनी
वैदेहीक सभ पूड़ सेहन्ता हम करै छी अहूँ करू

>आखर - २० / (तिथि: १४.०४.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५७

कौआ जँ कोइली बनि कूकत के कुचरत के देत सनेश
सभके मोजर सभक खगता अपना मे छै सभ विशेष

परतर गाम-शहरमे की अपन-अपन शोभा सभके
जतए रही से कर्मभूमि थिक देश कथी आ की परदेस

ठाढ़ केने छी हृदयक सीमा नेहक बखरा बाँट केलहुँ
अपने नै आनो सभ थूकत अपनामे जँ करब कलेश          

क छोडू कर्त्तव्य बिसरलहुँ  "अ" पढ़लौं अधिकार अबैए
कर्मठतामे सभसँ पाछू अगुआ बनि जे दए उपदेश  

एक चुनावक खेल छै सभटा एक बेर बस कुर्सी चाही
एक घोटाला हमरो नामे हमहूँ रंकसँ बनब नरेश

एहन व्यवस्था देख रहल छी लोकतंत्रमे आब "नवल"
ककरो भूखे अंतरी सटकल किओ करैए खूब निंघेष  

>आखर - २२ (तिथि: १५.०३.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५६

लोभ छोडू द्वेष भागत
नेह बाँटू नीक लागत

सच जँ बाजब मान भेटत
फूसिकें सभ लोल दागत

मैथिली भाषा अपन अछि
मैथिलक बड़ पैघ तागत

एकता मैथिल जँ राखब
सुतल मिथिला फेर जागत

फेर हँसती मैथिली माँ
नवल नव-विश्वास जागत

*फाइलातुन+फाइलातुन /  मात्राक्रम-२१२२+२१२२
(तिथि-१३.०३.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

गजल

गजल-५५

माथसँ घोघ ससरल जाए
चन्ना लाजहि सकुचल जाए

कजरायल नैना मधुशाला
मातल मोन बह्सल जाए

रूपक जालमे ओझराएल
बाट बटोही बिसरल जाए

माथक टिकुली ठोढ़क लाली
देखि अयना चनकल जाए

हाथक चूड़ी कंगना खनकै
सौंस करेजा दरकल जाए

आंखिसँ पीलौं "नवल" नेह जे
सगरो देह पसरल जाए          

 >आखर-११ (तिथि-२५.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५६

लोभ छोडू द्वेष भागत
नेह बाँटू नीक लागत

सच जँ बाजब मान भेटत
फूसिकें सभ लोल दागत

मैथिली भाषा अपन अछि
मैथिलक बड़ पैघ तागत

एकता मैथिल जँ राखब
सुतल मिथिला फेर जागत

फेर हँसती मैथिली माँ
नवल नव-विश्वास जागत

*फाइलातुन+फाइलातुन /  मात्राक्रम-२१२२+२१२२
(तिथि-१३.०३.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

गजल


गजल-५५
 
माथसँ घोघ ससरल जाए 
चन्ना लाजहि सकुचल जाए 
 
कजरायल नैना मधुशाला 
मातल मोन बह्सल जाए 
 
रूपक जालमे ओझराएल 
बाट बटोही बिसरल जाए 
 
माथक टिकुली ठोढ़क लाली 
देखि अयना चनकल जाए 
 
हाथक चूड़ी कंगना खनकै 
सौंस करेजा दरकल जाए
 
आंखिसँ पीलौं "नवल" नेह जे
सगरो देह पसरल जाए            
 
 >आखर-११ (तिथि-२५.०२.२०१३) 
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५४

अनकर कहल मानब कते
खा-खा ठेस कानब कते

बस किछु दिनक जिनगी त' नै
दिन जिनगीक गानब कते

छोडू पुरनका राग सभ
ऐ सिट्ठीसँ र'स छानब कते

बिनु साधनक की साधना
थूकसँ सातु सानब कते

चाही अपन अधिकार जे
माँगू "नवल' ठानब कते

>बहरे मुक्तबिज/मात्रा क्रम : २२२१-२२१२
(तिथि-१७.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५३

जे बुड़िबक छल अलबत यौ
तकरे भेटल बहुमत यौ

जनता फेर ठकेलै सभ
गेलै व्यर्थहि जनमत यौ

धन जनताक लुटा रहलै
जनतो छै चुप सहमत यौ

शोषण पाँच बरख चलतै
जनता कानत कलपत यौ

धर्मक दैत दुहाई ओ
जे नहि धर्मसँ अवगत यौ

नेता बनल कतेको कहि
दुर्दिन देशक बदलत यौ

लागै गप्प "नवल" एहन
टिटही टेकल पर्वत यौ

*मफऊलातु + मफाईलुन / मात्राक्रम-२२२१+१२२२
(तिथि-१३.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-५२

मिथिलोमे रहल नै बास मैथिलीकें
टूटल जा रहल छै आश मैथिलीकें

कहियो मैथिली नै हिचकि-हिचकि कानल
देखू पलटि सभ इतिहास मैथिलीकें

चन्दा अमर यात्री सदति सभ शरणमे
विद्यापति सनक छल दास मैथिलीकें

सभके ठाम देलौं भेल मान सभके
भेटल अछि किए वनवास मैथिलीकें

बाजब-पढ़ब सदिखन मैथिली लिखब हम
जागत "नवल" पुनि विश्वास मैथिलीकें

>मात्रा क्रम : २२२१+२२२१+२१२२
(तिथि: ०५.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

गजल

गजल-५१

एलै घोर कलयुग हरत अन्हार के
सभटा बदलि गेलै नियम संसारकें

पछ्बा रीत अबिते भेल सभकिछु खतम
चरित्र के हनन आ पतन संस्कारकें

साहित्येसँ छै शोभा समाजक अपन
साहित्यक त' काजे सृजन श्रृंगारकें

बिलटत सभ कला सेहो कलाकार सन
भेटत मान जाधरि नै कलाकारकें

मायसँ मोह आ ने मातृभूमिसँ मुदा
सभ बैसल करू गप अपन अधिकारकें

बाजब "नवल" हमहूँ बेर एतै जहन
सय सोनारकें आ एक लोहारकें

>बहरे कबीर/मात्रा क्रम : २२२१+२२२१+२२१२
(तिथि: ०२.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री

गजल

गजल-५०

जिनगी भरि बस व्यर्थक चिंता
मरितहुँ लागल स्वर्गक चिंता

अन्नक खगल छै निर्धन चिंतित
करए धनिकहो अर्थक चिंता

पहिलुक भेटिते दसकें ललसा
दस पुरिते शुरू शतकक चिंता

बहुअक छथि बिआहल सभ मारल
काँचकुमारकें घटकक चिंता

आशा फ'रक सभके छै लागल
ककरो "नवल" नै कर्मक चिंता

*मात्रा क्रम: २२२+१२२+२२२
(तिथि-३१.०१.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-४९

हुनका संग लिअ' बढू आगाँ जे छथि अभियानक पक्षमे
चलू करै छी नव पहल पुनि नव-क्रांतिक उपलक्षमे

नमन करैत छी हुनका जे संग चलथि बनि सहभागी
हुनको भ्रम के दूर करब जे सभ छथि ठाढ़ विपक्षमे

चलू करी अनुपालन हुनकर जे छथि ज्ञानक अगुआ
पछुवाएल छथि जे अज्ञाने तनिको आनब समकक्षमे

कर्मठ छै जे कर्मभूमिमे हारत-जीतत हएत सफल
ओ की जानै मोल एकर जे बस गप छाँटै सूतल कक्षमे

"नवल" नाच नै आबै जकरा तकरा लै सभ अंगने टेढ़
घुरबाक लूरि ने जकरा से त्रुटि तकबे करतै अक्षमें

*आखर-२२ (तिथि-३०.०१.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-४८

प्रीत बनि क' हियामे रहबे करब हम
बनि नेह शोणितमे बह्बे करब हम

वेग मोडू बसातक हमर पएर छोडू
बसातक संगे-संग बहबे करब हम

किए बिसरैमे लागल छी हमरा अनेरे
छाँह बनि अहाँ संग रहबे करब हम

नै बुझलहुँ अहीं त' दोख अनकर कथी
ई तिरस्कारक तीर सहबे करब हम
       
छै किछु दिन लेल जिनगी तकर मोहे की
रेतीक भवन बनि ढहबे करब हम
       
मिठ लागत की क'रू तकर परवाह नै
जे सच छै उचित छै कहबे करब हम

अहाँ घोंटी गरल बूझि की पीबी सुधा कहि
"नवल" नेह-छाल्ही त' मह्बे करब हम

*आखर-१६ (तिथि: २८.०१.२०१३)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

बाल गजल

बाल गजल-२४

दू टा बस सोहारी चाही
माँ कम्मे तरकारी चाही

पुरना छिपलीमे नै खेबौ
हमरो नवका थारी चाही

हमहूँ जेबै इसकुल बाबू
पूरा सभ तैयारी चाही

हाटसँ आनू पोथी-बस्ता
मौजा-जूता कारी चाही

इसकूलक जलखैमे हलुआ
पूरी आ तरकारी चाही

छीटब बीया गाछो रोपब
आँगन लग फुलवारी चाही

"नवल"सँ नै हम लट्टू माँगब
हमरो कठही गाड़ी चाही

 >मात्रा क्रम : आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे          
(तिथि-२२.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

बाल गजल


बाल गजल-२३

दीदी जँ चढ़ि गेल कनहा-गाछी चट द' रूसल कोरा लए
चुल्लरि भेटिते दोसर बहन्ना कानल आब कटोरा लए 

झिल्ली-कचरी घिरनी-फुकना बाबू गेलनि हाटसँ आनए
साइकिलक घंटी बजिते दौगल दलान पर झोड़ा लए 

बैसल सभ झोड़ा घेरने अपन-अपन अनमाना लेल 
जे अनूप से बाँटि क' खेलक बँझि गेल मारि अंगोरा लए         
    
आँगन नीपल अरिपन पाड़ल आइ फेर छै पूजामानी 
आसन परमे त' पंडितजी बैसल ओ औनेलै बोरा लए 

घड़िघंटा आ शंख बाजि गेल चौरठ आ परसादी भेटतै 
"नवल" नञि लेतै एकटा लड्डू मुँह फुलेलक जोड़ा लए           

*आखर-२२ (तिथि-१४.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री" 

सोमवार, 24 जून 2013

गजल

गजल

हम हाल की कहौँ आब बेहाल अछि
बड्ड कठिनसँ बीतल ई साल अछि

जानि नै मृत्यु हाएत केहन हमर
जीबैत जिनगी बनल जंजाल अछि

भ्रष्ट्राचारक गप्प जुनि करु भाइ यौ
नेता अफसर घूसलऽ नेहाल अछि

खूब मजा करु जा धरि अछि जिनगी
काल्हि लऽ जेबाले बैसल उ काल अछि

साँच बाजनिहार नै अछि कोनो ठाम
यौ फूसिक व्यापारमे बड्ड माल अछि

कलपै कानै भीतरे भीतर 'मुकुन्द'
प्रेममे सभक होएत ई हाल अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 14
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

जहियासँ अपन घर नाहि अछि
तहियासँ केकरो डर नाहि अछि

मोनक बात केकरा कहब आब
ऐहि ठाम कियौ हमर नाहि अछि

वियोगे हमतऽ कलपौँ असगर
अहाँ पर कोनो असर नाहि अछि

सास-पूतोहमे कलह मचल छै
बाँकी ऐहिसँ कोनो घर नाहि अछि

माँग बढ़ल दहेजक चहुँ दिस
आदर्श वियाहक वर नाहि अछि

सभ ठाम दंगा पसरल 'मुकुन्द'
शीश सहित कोनो धड़ नाहि अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

रविवार, 23 जून 2013

गजल

गजल @ कुन्दन कुमार कर्ण
 

जीनगी एक वरदान छी
र्इश्वरक देलहा दान छी


सोच राखू नम्हर मोनमें
जीनगी सुनर सम्मान छी

हटिक नै, डटिक जियबै जखन
जीनगी तखन गूमान छी


खेल बूझब जखन एकरा
जीनगी तखन आसान छी

कर्म पथपर चलू नित समय
कर्म मानवक पहिचान छी

बाट बाटपर बूझी चलू
जीनगी एकटा ज्ञान छी

कथन 'कुन्दन' कहैछै अपन
जीनगी दू दिनक चान छी


२१२-२१२-२१२ (फाइलुन-तीन बेर)
बहरे-मुतदारिक
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मंगलवार, 4 जून 2013

गजल

गजल
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नजरिमें नजरि तऽ मिलाक देखू
दीप नेहके तऽ जराक देखू

दिल अखन कली अछि प्रिय अहाँकें
ओ कली अहाँ तऽ खिलाक देखू

चेहरा अहाँक चमैक जेतै
आँखिमें अहाँ तऽ बसाक देखू

दोहराक भेटत नहि जवानी
मोनमें उमंग जगाक देखू

बरसि पडत सावन जीनगीमें
हमर लेल रूप सजाक देखू

२१२-१२११२-१२२
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© कुन्दन कुमार कर्ण

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रविवार, 2 जून 2013

गजल

हम जँ पीलहुँ शराबी कहलक जमाना

टीस नहि दुख करेजक बुझलक जमाना

 

भटकलहुँ बड्ड   भेटेए नेह  मोनक

देख मुँह नहि करेजक सुनलक जमाना

 

छल कपारक लिखल ई कोना कहू की

आँखि रहितो हमर सुख छिनलक जमाना

 

नहि हमर दोख नहि ककरो आर कहियौ

देख हारैत हमरा   हँसलक जमाना

 

दर्द भेटल बुझब नहि ‘मनु’केँ कनी छल

आन अनकर कखन दुख जनलक जमाना

 

(बहरे असम, मात्राक्रम  2122-1222-2122)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

सोमवार, 27 मई 2013

रविवार, 19 मई 2013

गजल

अछि जँ ई जिनगी  प्रेम केनाइ सीखू

डर बिसरि जगमे दुख मिटेनाइ सीखू

 

काल्हिकेँ नै कोनो भरोसा बचल अछि

आइ सभकेँ  अप्पन बनेनाइ सीखू

 

जीवनक सुख दुख बाट दू छैक बुझलौं

दूबटीयापर हँसि क  गेनाइ सीखू

 

राग मनमे प्रेमक जगाबैत सगरो

आँखि सबहक सोझाँ उठेनाइ सीखू

 

‘मनु’ अछुत छै अपने किए मानने छी

डाह बिसइर छाती लगेनाइ सीखू

 

(बहरे खफीक, मात्राक्रम  2122-2212-2122) 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 

शुक्रवार, 17 मई 2013

रुबाइ

रुबाइ-168

दस बर्षक नेना काज करै होटलमे
भोजन लेल बीछै कचरा फेकलमे
मजदूरक लेल दिवस की आ राति की?
सदिखन दर्दक समय जिनगी घोकलमे

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गुरुवार, 16 मई 2013

गजल

गजल

रौद आ बिहाड़िसँ जे लड़ल अछि एहि ठाम
ओतबे गाछ पैघ भऽ बचल अछि एहि ठाम

भूखल छथि राति दिन जाहि लेल गरीब यौ
किनको खरिहानमे सड़ल अछि एहि ठाम

एहि टेक्निकल युगमे बी ए केने हाएत की
एम ए कऽ गाम गाम पड़ल अछि एहि ठाम

जे विपत्तिमे धैर्य राखि लागल अछि काजमे
ओ नभमे चान बनि सजल अछि एहि ठाम

भ्रष्टाचारी शासनमेँ बीकल सरकारी सीट
चुप्पी मारि लोक घरे सूतल अछि एहि ठाम

गेल युग श्रवणकेँ माँ बापक कोनो मोले नै
बूढ़ पूराण पूतसँ डरल अछि एहि ठाम

सरल वार्णिक बहर ,आखर 17
© "बाल मुकुन्द" ।।

गजल

गजल

मिललौँ अपन चानसँ भेल पुलकित मोन
बीतल पहर विरहक भेल हर्षित मोन

छल आँखि सागर ताहिसँ सुनामी उठल
बहलौँ तकर वेगसँ भेल विचलित मोन

बाजल तँ जेना बुझु फूल झहरल मुखसँ
ठोरक मधुर गानसँ भेल शोभित मोन

ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल
पायलक सुनते स्वर भेल जीबित मोन

प्रीतक तराजू पर तौललौँ धन अपन
विरहक दिया जड़ते भेल पीड़ित मोन

बहरे सलीम ,मात्राक्रम २२१२ २२२१ २२२१
© बाल मुकुन्द पाठक

सोमवार, 13 मई 2013

गजल


गजल
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मोनके बात कहि दिअ
प्रेमके संग बहि दिअ

दिल हमर अखन खाली
ताहिमें प्रिय रहि दिअ

मीठगर चोट नेहक 
कनि अहाँ प्रिय सहि दिअ

ठोरपर हँसिक मोती
हँसि हँसिक प्रिय गहि दिअ

भावना हमर लिअ बुझि
दर्द मधुरसन नहि दिअ
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फायलुन्-फाइलातुन्.
२१२-२१२२

© लेखक - कुन्दन कुमार कर्ण
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सोमवार, 6 मई 2013

गजल

कनी हमरो बजा दिअ माँ  
अपन दर्शन करा दिअ माँ

कते आशा लगोने छी
अपन चाकर बना दिअ माँ

जनम भरि बनि टुगर रहलहुँ
सिनेहक निर चटा दिअ माँ   

जँ हम नेना अहाँकेँ छी
अलख मनमे जगा दिअ माँ

सुखेलै नोर जरि आँखिक
चरण ‘मनु’केँ दखा दिअ माँ   

(बहरे हजज, मात्रा क्रम – १२२२-१२२२)
जगदानन्द झा ‘मनु’ 

रविवार, 5 मई 2013

रुबाइ

रुबाइ-169
तूँ प्रेम करै छें वा जादू- टोना
तूँ मोहलें करेजक सबटा कोणा
हम तेजब प्राण अहुरिया काटि, सुन
बनबें जँ नै अमितक आँगनक सोना

गुरुवार, 2 मई 2013

रुबाइ

रुबाइ-168

दस बर्षक नेना काज करै होटलमे
भोजन लेल बीछै कचरा फेकलमे
मजदूरक लेल दिवस की आ राति की?
सदिखन दर्दक समय जिनगी घोकलमे

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रविवार, 14 अप्रैल 2013

गजल


माँ शारदे वरदान दिअ
हमरो हृदयमे ज्ञान दिअ

हरि ली सभक अन्हार हम
एहन इजोतक दान दिअ

सुनि दोख हम कखनो अपन
दुख नै हुए ओ कान दिअ

गाबी अहीँकेँ  गुण सगर
सुर कन्ठ एहन तान दिअ

बुझि पुत्र ‘मनु’केँ माँ अपन
कनिको हृदयमे स्थान दिअ

(बहरे रजज, मात्रा क्रम - २२१२-२२१२)
जगदानन्द झा ‘मनु’

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

गजल

गजल-1.61

मृत्युक दयासँ किछु पल हँसि कऽ जीबै छै
पैंचा लऽ साँस, दिन सुख दुखसँ काटै छै

छै शेर घरहिंमे बलगर निडर बुधिगर
बाहर निकलि कुकुरकें देख भागै छै

ओझाक फेरमे जनता झड़कि रहलै
ज्ञानक किताब शाइत घून चाटै छै

सासुरक लेल केलक हवण निज इच्छा
तखनो बहुत धियाकें वैह मारै छै

जुनि आँखि आब देखैयौ अहाँ ककरो
नेना सगर भरल बंदूक राखै छै

छै पूछ मात्र ओकर एहि दुनियाँमे
जे जेब काटि बड खैरात बाँटै छै

मुस्तफइलुन-मफाईलुन-मफाईलुन
2212-1222-1222
अमित मिश्र

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

गजल

गजल-15

गणितक ओझराएल हिसाब छी हम
सुधि नहि रहल कोनो शराब छी हम

शोणित बहाबै लड़ि कऽ अपनेमे सब
दुखसँ छटपटाइत तेजाब छी हम

एक एक आखरमे अनन्त भाव अछि
बुझै सब अनचिन्हार किताब छी हम

पाथरसँ बस चोटक आशा करै छी
काँटमे फूलाएल एगो गुलाब छी हम

निर्लज्ज भऽ गेल जमाना कनिको लाज नै
बिसरि गेल हमरा की खराब छी हम

चलि रहल देखू आब कागजेपर देश
"सुमित" की कहतै एतऽ जबाब छी हम

वर्ण-15
सुमित मिश्र
करियन, समस्तीपुर

रविवार, 7 अप्रैल 2013

गजल

गजल-1.60

अम्बरमे जते तरेगण पसरल छै
ओते जनम धरि दुनू प्रेमी रहबै

ने अधलाह करब ककरो जग भरिमे
हमरो संग सब किओ नीके करतै

हँसि हँसि झाँपने कते दर्दक सागर
असगरमे नयनसँ शोणित बनि बहतै

मंगल अमर उधम भगतक जोड़े की
नव इतिहास रचि युवे अमरो बनतै

भाषा प्रीत केर जानै छी केवल
दोसर भाव "अमित" नै विचलित करतै

2221-2122-222

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.58

काटल तँ तोहर आब पानि नै माँगत
तूँ भाग्य यदि हेबें बिमुख तँ के जीयत

लाठी पटकि मीता करत जँ लतमर्दन
नेनपनमे संगीक मोह नै छूटत

सकपंज छी चिमनी बनल जँ मुँह मनुखक
निज संग आनो के तँ असमय मारत

नै मरल छै बेमार मात्र शासन छै
आन्हर बनल पुतला तँ कोर्टमे टूटत

अलबत्त लागै छै मनुख बदलि गेलै
रौदा सहै जे आब कारमे पाकत

मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-मफाईलुन
2212-2212-1222
अमित मिश्र

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

गजल


घोड़ा जखन कोनो भऽ नाँगड़ जाइ छै
कहि ओकरा मालिक झटसँ दै बाइ छै

माए बनल फसरी तँ बाबू बोझ छथि
नव लोक सभकेँ लेल सभटा पाइ छै

घर सेबने बैसल मरदबा छै किए 
चिन्हैत सभ कनियाँक नामसँ आइ छै

कानूनकेँ रखने बुझू ताकपर जे
बाजार भरिमे ओ कहाइत भाइ छै

खाए कए मौसी हजारो मूषरी
बनि बैसलै कोना कऽ बड़की दाइ छै

पोसाकमे नेताक जिनगी भरि रहल
जीतैत मातर देशकेँ ‘मनु’ खाइ छै

(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२ तीन तीन बेर) 
जगदानन्द झा ‘मनु’                

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हजल

हजल-7

झाड़ू उठा मारलनि बेलन चला मारलनि
कोना कहब अपने मुँहे, करछुल धिपा मारलनि

खगता तँ दूधक मुदा दोकानमे सठल छल
ओ देख पाउडर दूधक नऽह गड़ा मारलनि

बासी बचल खीर हमरे लेल राखल सदति
मिसियो जँ छूटल तँ ओ चेरा उठा मारलनि

साड़ी कते कीन फेकत माँझ आँगन नचा
हम सैंत नै सकल तें घेंटी दबा मारलनि

जे पीब लेलौं कने ओ झाड़ि देलनि नशा
हम रंग लगबौं तँ ओ दाँते धसा मारलनि

ने हम बचब ने बचत सड़ि गेल हमरे गजल
कनियाँ हमर कलमपर नैना चला मारलनि

मुस्तफइलुन-फाइलुन
2212-212 दू बेर
बहरे-बसीत

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.59

छुट्टा साँढ़ सन किए छिछियाइत छी
अनकर खेतमे किए घुसियाइत छी

लागै चोट बड हँसी सन झटहा खा
आनक शोकमे किए ठिठियाइत छी

भरि भरि फूसि सगर पिचकारी मारै
बुझने बिनु कथा किए पतियाइत छी

भ्रष्टाचार हमर नेंतसँ जनमल अछि
तें पहिने अहाँ कहाँ सरियाइत छी

जनते लोकतंत्रमे राजा रहतै
अपने राज्यमे किए भसियाइत छी

2221-2122-222
अमित मिश्र

मंगलवार, 26 मार्च 2013

हजल

हजल-7

झाड़ू उठा मारलनि बेलन चला मारलनि
कोना कहब अपने मुँहे, करछुल धिपा मारलनि

खगता तँ दूधक मुदा दोकानमे सठल छल
ओ देख पाउडर दूधक नऽह गड़ा मारलनि

बासी बचल खीर हमरे लेल राखल सदति
मिसियो जँ छूटल तँ ओ चेरा उठा मारलनि

साड़ी कते कीन फेकत माँझ आँगन नचा
हम सैंत नै सकल तें घेंटी दबा मारलनि

जे पीब लेलौं कने ओ झाड़ि देलनि नशा
हम रंग लगबौं तँ ओ दाँते धसा मारलनि

ने हम बचब ने बचत सड़ि गेल हमरे गजल
कनियाँ हमर कलमपर नैना चला मारलनि

मुस्तफइलुन-फाइलुन
2212-212 दू बेर
बहरे-बसीत

अमित मिश्र

सोमवार, 25 मार्च 2013

गजल



आइ सगरो गाममे हाहाकार छै
मचल एना ई किए अत्याचार छै

आँखि मुनने बोगला बैसल भगत बनि
खून पीबै लेल कोना तैयार छै

देखतै के केकरा आजुक समयमे
देशकेँ सिस्टम तँ अपने बेमार छै

देखते मुँह पाइकेँ कोना मुँह मोरलक
मांगि नै लेए खगल सभ बेकार छै

भरल भिरमे एखनो धरि एसगर छी
केकरो मनपर ‘मनु’क नै अधिकार छै

(बहरे जदीद, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-२२१२)
जगदानन्द झा ‘मनु’        

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

गजल

गजल-1.57

नै ककरोसँ कखनो फसल झगड़ा रहितै
यदि जगमे बनल नै नेह भाषा रहितै

नै डरतै महल शीशाक, पाथर लऽग जा
यदि सब नेउँमे मजगूत ईटा रहितै

चहुँ दिश भेटितै कननी दरद आ विरहिन
सभक प्रेमिका भागसँ जँ राधा रहितै

आधा ज्ञान सदिखन बनल घातक दुश्मन
सब बनितै अपन घट भरल पूरा रहितै

बीच्चे सड़कपर नवजात तन नै रहितै
यदि मिसियो बचल माएक ममता रहितै

2221-2221-2222
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.57 नै ककरोसँ कखनो फसल झगड़ा रहितै यदि जगमे बनल नै नेह भाषा रहितै नै डरतै महल शीशाक, पाथर लऽग जा यदि सब नेउँमे मजगूत ईटा रहितै चहुँ दिश भेटितै कननी दरद आ विरहिन सभक प्रेमिका भागसँ जँ राधा रहितै आधा ज्ञान सदिखन बनल घातक दुश्मन सब बनितै अपन घट भरल पूरा रहितै बीच्चे सड़कपर नवजात तन नै रहितै यदि मिसियो बचल माएक ममता रहितै 2221-2221-2222 अमित मिश्र

बुधवार, 20 मार्च 2013

गजल

गजल-14

छी दूर मुदा आँखिमे रहू प्रिय
आबि कऽ सपनामे जगबू प्रिय

नै दिन नै राति बुझै मनवाँ
आब विरहक दर्द सहू प्रिय

फागुन मास रंगीन छै दुनियाँ
अहाँ बेरंग किए छी कहू प्रिय

सुन्न लागै अपन घर आँगन
आयब कहिया सेहो लिखू प्रिय

आबि गेल फगुआ कतऽ छी अहाँ
मिसियो भरि रंग लगाबू प्रिय

बाट अहींके बाट तकैत अछि
"सुमित" कहै झटसँ आबू प्रिय

वर्ण-12
सुमित मिश्र
करियन, समस्तीपुर

मुइलहा चाममे दरद नै होइ छै-मैथिली गजल


रविवार, 17 मार्च 2013

रुबाइ


रुबाइ-166


झूकल आँखि एना करेज ढहल जेना

दुख गेलौं बिसरि अनमन बनलौं नेना

नेहक शरबतक सुआद जे बता देलौं

मिझबै छी पियास आब जेना-तेना

गजल

गजल-1.56

आउ बनबी घर एहन प्रिये
सदति बाजै जतऽ कंगन प्रिये

डरसँ भेले छै पात सब पियर
जखन एलै पतझड़ सन प्रिये

लोक चैनसँ नै बैस सकत जतऽ
बूझि लिअ ओतै बन्हन प्रिये

अपन लाजसँ सजबू अपन भवन
काटि लेबै मिल जीवन प्रिये

छूटि जेतै लाठी करसँ सगर
जोड़ जग भरिकें आँगन प्रिये

दावपर लागल अछि कलम "अमित"
द्रोह बनि आ तूँ सावन प्रिये

2122-2212-12
अमित मिश्र

अमित मिश्र जीक गजल हुनक अपने अवाजमे-32


अमित मिश्र जीक गजल, हुनक अपने अवाजमे-31


अमित मिश्र जीक गजल, हुनक अपने अवाजमे-30


अमित मिश्र जीक गजल, हुनक अपने अवाजमे-29


शनिवार, 16 मार्च 2013

गजल

गजल-1.55

राति जेना जेना जुआन भेल गेलै
चान तेना तेना पुरान भेल गेलै

रोजगारक आटासँ जखन बनल रोटी
गाम घरमे तखनसँ लवाण भेल गेलै

रहब भारी छै इज्जनसँ अनोन जगमे
हम तँ रहलौ तैयो कटान भेल गेलै

मौलबी पण्डित राम आ खुदाक नामसँ
ठाढ़ सगरो लूटिक मचान भेल गेलै

भरल छल ताशक महलमे हवा सिनेहक
तें तँ सहि झन्झा बड गुमान भेल गेलै

रूप एहन ऐना लजा रहल मिलनपर
रातिरानी सेहो हरान भेल गेलै

घुरत घरमे नेनपन हँसत जखन नेना
आब "अमितक" घर नव विहान भेल गेलै

2122-2212-1-2122

अमित मिश्र

रुबाइ

रुबाइ-165

तोड़ी पियर पसरल सगर बाध अनन्त
मोनक उपवन धरि धूरि एलै बसन्त
नव रंग संग खेल रहल होली वसुधा
हे राम नै होइ कखनो नेहक अन्त

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

गजल

गजल-13

नवका रंगमे रंगा रहल छै
अपनों लोकसँ डेरा रहल छै

बिसरि जाऊ सब बाग बगीचा
सबटा सपना उड़ा रहल छै

माँटि बनल आब गरदा देखू
अप्पन जिनगी जड़ा रहल छै

कतऽ छै कल-कल निर्मल धारा

छोड़ि संग सब पड़ा रहल छै

मोन कलपै छै समय देख कऽ
नीर नैन आब चोरा रहल छै

"सुमित" चाहत प्रेम सदिखन
डोरि सिनेहक जोड़ा रहल छै

वर्ण-12
सुमित मिश्र
करियन,समस्तीपुर

गुरुवार, 14 मार्च 2013

गजल

हे राम बसु मनमे हमर
ई प्राण धरि तनमे हमर

सदिखन अहीँक ध्यानमे
नै मन बसै धनमे हमर

प्रभु दरसकेँ आशासँ ई
भटकैट मन बनमे हमर

एतेक मन चंचल किए
प्रभु रहथि कण कणमे हमर

हे राम ‘मनु’पर करु दया
नै मन बहै छनमे हमर

(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२-२२१२)
जगदानन्द झा ‘मनु’        

गजल


पासी भाइ ठोरमे ताड़ी लगा दे हमरा
हम छी मरल आब तोंही सभ जिया दे हमरा

देशक तंत्र भेल छै मजगूत कोना मानू
जनता केर दुख हटा ई सभ बुझा दे हमरा

हम डिबिया बनब कने तों आबि जो फनिगा बनि
आ जरि मरि क' आब सोहागिन बना दे हमरा

सुरजो आब गानि रहलै टका चुप्पे चुप्प
नै अन्हार रहत ऐठाँ जरा दे हमरा

अनचिन्हार कानि रहलै हमर मरलापर
चचरीपरसँ आब तों सभ उठा दे हमरा



मात्रा क्रम---२२२१--२१२२--१२२--२२ हरेक पाँतिमे

बुधवार, 13 मार्च 2013

मंगलवार, 12 मार्च 2013

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-28


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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों