शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गजल



टूटल फूटल चेहरा छै
हारल थाकल चेहरा छै

झड़कल सनकेँ कर्म हेतै
झाँपल झाँपल चेहरा छै

कनियेँ छूलहुँ ठोर ओकर
गमकल गमकल चेहरा छै

पाथर फेकू सभ विचारक
जमकल जमकल चेहरा छै

खुब्बे पड़लै मोन हमरा
बिसरल बिसरल चेहरा छै

सभ पाँतिमे 2222+2122 मात्राक्रम अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 24 नवंबर 2014

गजल



अगम अथाह छथि नेताजी
विकट बताह छथि नेताजी

बचा बचा कऽ जानो लेलथि
असल बिखाह छथि नेताजी

दवाइ संग टीका राखब
कने कटाह छथि नेताजी

अहाँ कनी किए चाहै छी
सुलभ सलाह छथि नेता जी

विकास लेल अपने देखथि
लगै कनाह छथि नेताजी

सभ पाँतिमे 12+12+12222 मात्राक्रम अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 23 नवंबर 2014

गजल

की जिनगीमे आउ की दूर जाउ
बिनु मतलबकेँ राति दिन नै सताउ

बोली मिठगर सन अहाँ बाजि फेर
हमरा प्रेमक जालमे नै फँसाउ

आगूमे देखाक मुस्की अपार
पाछूमे सदिखन छुरा नै चलाउ

सुच्चा अछि जँ प्रेम साँचे अहाँक
सब किछु बुझि हमरे हियामे सजाउ

राखू नित कुन्दन जँका शुद्ध मोन
बस झूठक कखनो हँसी नै हँसाउ

मात्राक्रम : 2222-21-221-21

© कुन्दन कुमार कर्ण

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

गजल

पहिल बेर दू गजला कहबाक प्रयास केलहुँ अछि। देखल जाए--



कुरता सौंसे पसरल छै
झगड़ा सौंसे पसरल छै

गाछक पातक आ फूलक
चरचा सौंसे पसरल छै

जीबछ कोशी बागमती
कमला सौंसे पसरल छै

मंदिर मस्जिद गिरजा हो
भगता सौंसे पसरल छै

दिल्ली भेटत बाटेपर
पटना सौंसे पसरल छै

खादी भागल काते कात
चरखा सौंसे पसरल छै

बेंगक टर टर सुनि सुनि कऽ
बरखा सौंसे पसरल छै

पानिसँ बेसी मटिया तेल
धधरा सौंसे पसरल छै

मंझा चाहै गुड्डी तँइ
धागा सौंसे पसरल छै

ताड़ी लबनी पासी भाइ
चिखना सौंसे पसरल छै

सीता जनमै एकै गो
रामा सौंसे पसरल छै

पाचक भागै दूरे दूर
कर्ता सौंसे पसरल छै

चोरी लूट डकैतीके
खतरा सौंसे पसरल छै

छिटलहुँ खाद मुदा तैयो
खखरा सौंसे पसरल छै

लोटा थारी बाटी चुप्प
तसला सौंसे पसरल छै

सूदिक सुख मूरे जानै
कर्जा सौंसे पसरल छै

अनचिन्हारक संगे संग
फकड़ा सौंसे पसरल छै


जकरा मारल मरलहुँ से
पुछलक तोरा मारल के

मूनल रहतौ आँखि हमर
तइ के बदला हमरो दे

देलक चिन्हासी प्रेमक
कहबे करबे खिस्सा गे

श्वासक आसक विश्वासक
टूटल अत्मा तोंहू ले

बाड़ी झाड़ी छोड़ल हम
उर्सी कुर्सी भेटल जे


सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल छै। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु सेहो छूटक तौरपर अछि। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत व्याकरणानुसार दीर्घ मानल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि। 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

अपने एना अपने मूँह-31

अनचिन्हार आखरपर http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/  अक्टूबरमे कुल 18 टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
कुन्दन कुमारक कर्णजीक कुल 4टा पोस्टमे 3टा गजल ओ 1टा भक्ति गजल अछि।
अमित मिश्र ओ जगदानंद झा मनुजीक 2-2टा पोस्टमे 2--2टा गजल आएल।
आशीष अनचिन्हारक कुल 10 टा पोस्टमे 6टा गजल, 1टा अपने एना अपने मूँह, 1टा हजल, 1-1टा बाल ओ भक्ति गजल अछि।

बुधवार, 19 नवंबर 2014

गजल


देह धधकि धधकि जाइ छै
मोन बहकि बहकि जाइ छै

बोल गमकि गमकि जाइ छै
नेत महकि महकि जाइ छै

भात रमकि रमकि जाइ छै
दालि लहकि लहकि जाइ छै

गाछ छमकि छमकि जाइ छै
पात चहकि चहकि जाइ छै

खेत लसकि लसकि जाइ छै
पेट सनकि सनकि जाइ छै


सभ पाँतिमे 21+12+12+212 मात्राक्रम आ 11 वर्ण अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 16 नवंबर 2014

गजल

गजल-2.50

हम रही अहाँ रही आर किछु नव बात हो
हम कही अहाँ सुनी आर किछु नब बात हो

जे कहब कहू मुदा तौल लिअ निज बोलकेँ
जे कहब, कहब सही आर किछु नव बात हो

भेद-भाव आइ तजि ठाढ़ एकहिँ मंचपर
प्रीतकेँ बहै नदी आर किछु नव बात हो

सफ हो सभक हिया साफ हो छवि लोककेँ
फड़य गाछ जनु कली आर किछु नव बात हो

बात बातपर हँसय सब हँसय धरती सगर
हो दरद सगर कमी आर किछु नव बात हो

2121-21-2212-2212

शनिवार, 15 नवंबर 2014

गजल


हमरा शराब चाही मुदा आँखिसँ
कनियें हिसाब चाही मुदा आँखिसँ

गेंदा बहुत चमेली बहुत हमरा लग
तैयो गुलाब चाही मुदा आँखिसँ

बाजल बिला कऽ चलि जाइ छै अन्तह
तँइ सभ जबाब चाही मुदा आँखिसँ

मानल गजल पसरि गेल छै तैयो
गजलक किताब चाही मुदा आँखिसँ

हारल छलहुँ तँए मानि लेबै सभ
हमरा हियाब चाही मुदा आँखिसँ

सभ पाँतिमे 2212+122+1222 मात्राक्रम अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

गजल

अपन मोनक कहल मारि बैसल छी
छलै खिस्सा लिखल फाडि बैसल छी

हँसी हुनकर हमर मोनमे गाडल
करेजा अपन हम हारि बैसल छी

पढू भाषा नजरि बाजि रहलै जे
किए हमरा अहाँ बारि बैसल छी

सिनेहक बूझलौं मोल नै कहियो
अहाँ गर्दा जकाँ झारि बैसल छी

जमाना कहल मानैत छी सदिखन
कहल "ओम"क अहाँ टारि बैसल छी
- ओम प्रकाश
मफाईलुन-फऊलुन-मफाईलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

गजल

कानैत आँखिक आगिमे जरल आकाशक शान छै
बेथा करेजक लहकि गेलै, सभक झरकल मान छै

बैसल रहै छी प्रभुक दरबारमे न्यायक आसमे
हम बूझलौं नै बात, भगवान ऐ नगरक आन छै

सदिखन रहैए मगन अपने बुनल ऐ संसारमे
चमकैत मोनक गगनमे जे विचारक ई चान छै

आसक दुआरिक माटि कोडैत रहलौं आठो पहर
सुनगैत मोनक साज पर नेहमे गुंजित गान छै

सूखल मुँहक खेती सगर की कहू धरती मौन छै
मुस्की सभक ठोरक रहै यैह "ओम"क अभिमान छै
- ओम प्रकाश
दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ,
मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

गजल

छूटल हाथ
फूटल माथ

अपने संग
करबै लाथ

बहसल मोन
आबू नाथ

पेटक लेल
गोबर पाथ

छथि बकलेल
भूपतिनाथ

सभ पाँतिमे 2221 मात्राक्रम अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

गजल

ओकरा देखिते देह अपने सिहरि जाइ छै
आगि नेहक हियामे तखन यौ पजरि जाइ छै

मारि कनखी दए छै जखन ताकि अनचोकमे
डेग अपने हमर ओकरा दिस ससरि जाइ छै

ओ हँसै छै त एना बुझाइत रहल बागमे
फूल जेना गुलाबक लजाइत झहरि जाइ छै

चानकेँ देखिते रातिमे चेहरा ओकरे
झिलमिलाइत हमर आँखिमे सजि उतरि जाइ छै

लाख लड़की करै छै हमर आब पाछू मुदा
छोडि सभकेँ बहकि ओकरेपर नजरि जाइ छै

प्रेम कुन्दन हए छै अहीना बुझा से रहल
एहने जालमे मोन सुधि बुधि बिसरि जाइ छै

बहरे-मुतदारिक

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

मनक भीतर माटिक प्रेम काबा सन
लगैए ई दूर भय गर्म आबा सन

दियावाती भेल नै चौरचन भेलै
मनोरथ भसि गेल ताड़ीक डाबा सन

अपन अँगने छोरि एलहुँ सगर हित हम
फरल दुश्मन एतए बड्ड झाबा सन

करेजामे दर्द गामक बसल एना
बिलोका बनि ओ तँ चमकैत लाबा सन

पिया बैसल  दूर परदेशमे  'मनु' छथि
विरहमे हम छी हुनक बनल बाबा सन

(मात्रा क्रम : १२२२-२१२२-१२२२)
जगदानन्द झा 'मनु'

रविवार, 9 नवंबर 2014

गजल



कमसँ कम एकौटा फूल दे गे मलिनियाँ
नीक नै अपने समतूल दे गे मलिनियाँ

राखि ले गेंदा बेली चमेली गुलाबो
बस हमर कोंढ़ी अड़हूल दे गे मलिनियाँ

घाटपर बैसल हम बाट जोहै छी तोहर
थरथराइत देहक पूल दे गे मलिनियाँ

राहु शनि मंगल बुध केतु वशमे मुदा तों
प्रेम सनकेँ ग्रह अनुकूल दे गे मलिनियाँ

आम संगे महुआ महुआ संग आमे टा झूलै
एहने सन झूलाझूल दे गे मलिनियाँ

सभ पाँतिमे 2122+222+122+122 मात्राक्रम अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

गजल

बाल गजल

गेलै उक्पाती बुढ़िया बाड़ीमे
लगले रहलै तेल हुनक लाठीमे

हमरा लोकनि फैलसँ कड़ुगर झँसगर
बड़ सनगर भक्का खेलहुँ गाछीमे

चोरक हल्ला सुनलहुँ सभहँक मूँहे
ताला आनि लगा देलहुँ काँपीमे

बथुआ खुब्बे नीक लगैए तैयो
धेआन हमर बसिया खेसारीमे

हमरा हेलब चुभकब नीक लगैए
पोखरिमे नालामे की नालीमे

सभ पाँतिमे 222+222+222+2 मात्राक्रम अछि
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

गजल



करेज बेचै छी राति भरि
पिआर देखै छी राति भरि

मिटा कऽ चलि गेलै रंग रूप
निशान हेरै छी राति भरि

इयाद हुनकर बस सोन सन
करोट फेरै छी राति भरि

बसात पसरल चारू दिसा
सुगंध घेरै छी राति भरि

सिनेह हुनकर भेटल जते
तते उकेरै छी राति भरि

सभ पाँतिमे 12-122-2212 मात्रक्रम अछि
दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक तौरपर अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 3 नवंबर 2014

गजल

एहि हारल आदमीकेँ हालचाल नै पुछू
दर्द सुनिते जाइ बढि तेहन सवाल नै पुछू

मारि किस्मत गेल कखनो खेल खेलमे लटा
घर घरायल नित बिपतिमे कोन काल नै पुछू

संग अपनो नै जरूरतिकेँ समय कतहुँ रहल
केलकै कोना कखन के आल टाल नै पुछू

बाट जिनगीकेँ रहल जे डेग डेगपर दुखद
बीत कोना गेल ई पच्चीस साल नै पुछू

के मरै छै एत यौ कुन्दन ककर इयादमे
लोक लोकक खीच रहलै आब खाल नै पुछू

मात्राक्रम: 2122-2122-2121-212

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना
स्वीकारू सभ केओ हमर ई सनेश शुभकामना

माए बाबू संगी बहिन भाइ जे कतहुँ रहल अछि
चाहे केओ परदेश या दूर देश शुभकामना

घरमे लक्ष्मीकेँ आगमन होइ सुखसँ जिनगी सजै
प्रेमक सौगातसँ जन समर्पित अशेष शुभकामना

वैभवमे नित होइत रहै वृद्धि शान्ति घर-घर रहै
मठ मन्दिरमे हम दैत छी दीप लेश शुभकामना

पावन अवसरपर आइ कुन्दन हृदयसँ दैत सभकेँ
शुभ संध्यामे पूजैत लक्ष्मी गणेश शुभकामना

मात्राक्रम: 22222-2122-121-2212

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

हमरासँ प्रिय नै रूसल करू
बेगरता मोनक बूझल करू

बनि नेहक सुन्नर सन फूल नित
मोनक बगियामे फूलल करू

जखने देखै छी हमरा कतहुँ
तखने हँसि लगमे रूकल करू

जीवन संगी हमरे मानि जुनि
आत्मामे बैसा पूजल करू

काइल की हेतै मालूम नै
एखन कुन्दनमे डूबल करू

मात्राक्रम : 2222-22212

© कुन्दन कुमार कर्ण

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

गजल

भक्ति गजल

बितलै खरना एलै साँझक बेरा उठलै ढ़ाकी गे
माथे सोभै सूपक संगे सुंदर पथिया मौनी गे

पबनैतिन सभ चलली घाटक दिस नहुँ नहुँ सम्हर सम्हरि
साँझक बेरा झलफल कनकन हहरै सभहँक छाती गे

हाथे हाथ सजल अरघक नरियर तैपर राखल दीपो
घाटे घाट सजल केरा भुसबा संगे तरकारी गे

कोशी साजल हाथी मातल छै तैपर ठकुआ राखल
सभ घूमै चारू दिस गीतो गाबथि बहिना काकी गे

भेलै भिनसरबा सिहकै पछबा बड़ सोचथि पबनैतिन
नै देलथि दरशनमा राना मैया हम बड़ पापी गे

आबो तँ उगह हो आदित भेलै बड़ देर अबेर कुबेर
नाम उचारथि अरघी हाथ अरघ लेने सभ साँती गे

करिते गोहारि किरिन फुटलै उठलै लाली पुरुबक दिस
माँगै पबनैतिन सुख नैहर सासुर बेटा बेटी गे

भेलै परना गेलै सभ घाटो लागै सून उदासल
घाटक दूभि कहै अबिअह परुकाँ रहतौ खुशहाली गे

सभ पाँतिमे 222+222+222+222+222 अछि
दूटा अलग-अलग लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।
छठम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु फाजिल लेबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

गजल



उधारक बेर हमहीं रहबै
हिसाबक बेर हमहीं रहबै

रहै जजमान कतबो किनको
प्रसादक बेर हमहीं रहबै

सबूतक ढेरपर नाचत सभ
फसादक बेर हमहीं रहबै

पिया देतै भने अमरित ओ
पियासक बेर हमहीं रहबै

कियो बनबे करत सिंदूर
पिठारक बेर हमहीं रहबै

सभ पाँतिमे 1222+122+22 मात्राक्रम अछि।

अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत हिसाबें दीर्घ मानल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

गजल

बाल गजल

दिवाली एलै धम धम धम
फटक्का फूटै बम बम बम

जरै डिबिया सभहँक आँगन
करै दरबज्जा चम चम चम

खतम भेलै फुलझरियो से
बहन्ना करही कम कम कम

किनेबै चकरी जेबी भरि
जरेबै खाली हम हम हम

सभ पाँतिे 1222-2222 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

गजल



जाल झटपट खसैए पानिमे
माछ छटपट करैए पानिमे

हाथमे हाथ लागै नीक बड़
हाथ लटपट लगैए पानिमे

माटिपर जे सिनेहक धार छै
तकरे खटपट कहैए पानिमे

आम छै काँच पाकल डम्हरस
टूटि भटभट खसैए पानिमे

बोल जक्कर बिकेलै घाटपर
आब पटपट बजैए पानिमे

सभपाँतिमे 2122+122+212 मात्राक्रम अछि
तेसर शेरक दोसर पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

गजल

दुदुसिया आ सूपक भाँटा सन लोकक लेल ई हजल अछि।--


हजल

हमरो कहने जे हम तोरे संग छियौ
हुनको कहने जे हम तोरे संग छियौ

हुनका दमपर जे केलक किछु से बुझलक
सगरो कहने जे हम तोरे संग छियौ

देखि रहल छी हुनक बदलब भोरे भोर
साँझो कहने जे हम तोरे संग छियौ

छथि एहन परतापी जे घर एलनि चोर
तकरो कहने जे हम तोरे संग छियौ

ठकलक अनका संगे अपनो अत्माकेँ
अपनो कहने जे हम तोरे संग छियौ

सभ पाँतिमे एगारह टा दीर्घ अछि।

तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक अधारपर अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

गजल



नै हेतौ तोहर निबाह गे कनियाँ
दुनियाँ छै बड़का कटाह गे कनियाँ

जेबीकेँ गर्मी रहै नै दुनियामे
नै हो एते गौरबाह गे कनियाँ

भेलौ तोरा रोग बस धनौंधीके
संबंधो सभ लेभराह गे कनियाँ

खाली साढ़े तीन हाथके धरती
अनचिन्हारे छौ गबाह गे कनियाँ

निरगुण अनचिन्हार गाबि रहलै बड़
छै चलती बेरक उछाह गे कनियाँ

सभपाँतिमे 22+2221+2122+2मात्राक्रम अछि
दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

गजल

गजल-2.40

हमरा घुटि घुटि कऽ मरनाइ सिखा दिअ
बस हमरा प्रेम करनाइ सिखा दिअ

काजक बोझसँ उदासी बढ़ि रहलै
हँसि हँसि जिनगी सुधरनाइ सिखा दिअ

मोनक अन्हार मेटायब कठिन नै
ज्ञानक बाती लऽ जरनाइ सिखा दिअ

ताकत लिअ अपन अधिकारक खातिर
सब विघ्नसँ आब लड़नाइ सिखा दिअ

जा धरि चलतै अपन अभिनय ता धरि
दुख तजि सुख सबसँ हरनाइ सिखा दिअ

2222-1221-122

गजल

एमरीक पूजा जोड़ पकरने छै
गाम गाम मैयाकेँ पसारने छै

एक दोसरामे होड़ छैक लागल
सभक बुद्धिकेँ के आबि जकरने छै

पाठ माइकसँ छकरैत आँखि मुनि सभ
अपन घरक माएकेँ तँ बिसरने छै

एक कोणमे छथि चूप मूर्त मैया
लोक नाच गाजा  भाँग दकरने छै

'मनु' किछो जँ  बाजल आँखि खोलि कनिको
लोक ओकरेपर गाल छकरने छै

(मात्रा क्रम : २१-२१-२२/२१-२१-२२)
© जगदानन्द झा 'मनु'   

गजल

कुटीमे आइ साँवरिया आबि गेलै

करेजक तार सभ सोहर गाबि गेलै

 

पिया बुझि कय हमर मोनक दर्द मिसियो

कतेको दुख  अपन हँसिते दाबि गेलै

 

हुनक मुस्कीसँ सगरो दुनियाक सम्पति

हृदय सबटा हमर छनमे पाबि गेलै

 

बनेलहुँ हम अपन जे हुनका सजनमा

जिला भरि केर लोकक मुँह बाबि गेलै

 

बसल छल मोन मंदिरमे ‘मनु’ जिनक छबि

हुनक हियकेँ हमर विनती भाबि गेलै

 

(बहरे करीब, मात्राक्रम 1222-1222-2122)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

गजल

ब्रम्हसँ बेसी छागर उताहुल
हाथसँ बेसी आँचर उताहुल

मोन बहकि गेलै कोहबरमे
ठोरसँ बेसी आखर उताहुल

प्रेम मिलनमे नै छोट नमहर
धारसँ बेसी सागर उताहुल

घोघ कहैए एना सजू जे
दोगसँ बेसी बाहर उताहुल

रूप हुनक अनचिन्हारे सनकेँ
आँखिसँ बेसी काजर उताहुल

सभपाँतिमे 21+1222+2122 मात्राक्रम अछि।
मक्तामे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि
"ब्रम्हसँ बेसी छागर उताहुल" ई एकटा मैथिली लोकोक्ति अछि।

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

गजल

मोन एखनो पारै छी अहीँकेँ
बाट एखनो ताकै छी अहीँकेँ

भावमे बहकि हम संगी सभक लग
बात एखनो बाजै छी अहीँकेँ

आब नै रहल कोनो हक अहाँपर
जानितो गजल गाबै छी अहीँकेँ


दीप जे जरा गेलहुँ नेहकेँ से
नित इयादमे बारै छी अहीँकेँ

प्रेम भेल नै कहियो बूढ कुन्दन
साँस साँसमे चाहै छी अहीँकेँ

मात्राक्रम : 212-1222-2122

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

हियामे उमंगक अगबे लहर छै
बुझा गेल ई त प्रेमक असर छै

धरकि अछि रहल धरकन बड्ड जोरसँ
रहल आब किछु नै बाँकी कसर छै

मजा एहि जादूकेँ खूब अनुपम
सजा मीठ सनकेँ जेना जहर छै

गजल पर गजल कहलहुँ ओकरा पर
मुदा बादमे बुझलहुँ बेबहर छै

पहिल बेर कुन्दन ई बात जानल
किए प्रेम सुच्चा जगमे अमर छै

मात्राक्रम : 122-122-22-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

गजल

बड़का बड़का दाबी छै
हम पंडित ओ पापी छै


हपसै सभ निकगर भोजन
हमरे लागल जाबी छै

हम्मर नूआ सस्ता सन
हुनकर नूआ दामी छै

खुलबे करतै ताला ई
हमरा लग ओ चाभी छै

अन्हारक संगे डिबिया
असगर बैसल बाती छै

सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

अपने एना अपने मूँह-30

सितम्बर २०१४मे अनचिन्हार आखरपर कुल ११टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--

अमित कुमार मिश्र ओ राम कुमार मिश्रजीक १-१टा पोस्टमे १-१टा गजल आएल।
कुंदन कुमार कर्णजीक ३टा पोस्टमे २टा गजल आ १टा बाल गजल आएल।
आशीष अनचिन्हारक ६टा पोस्टमे- १टा भक्ति गजल, ४ टा गजल आ १टा अपने एना अपने मूँह अछि।

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

गजल

बितलै राति भेलै भोर गे बहिना
रहि गेलै पियासल ठोर गे बहिना

आसक नामपर खेपल अपन जीबन
के पोछत हमर दुख नोर गे बहिना

रहलहुँ राति भरि उसनैत अपनाकेँ
साँचे दुखमे छै बड़ जोर गे बहिना

गुड्डी बनि छलहुँ उपरे उपर सदिखन
के तोड़लकै नेहक डोर गे बहिना

अनचिन्हार देलक किछु निशानी आ
दुनियाँ लागै बस अंगोर गे बहिना

सभ पाँतिमे 2221+2221+222 मात्राक्रम अछि,
तेसर, चारिम आ मक्तामे 1-1टा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

गजल

गजल-2.30

जतेक छल भाव हमरा लग आइ पसारि देने छी
अपन करेजासँ जनमल सब परत उघारि देने छी

गलत-सही केर झगड़ा सब ठाम पड़ल अधूरे अछि
जतेक छल फूसि लफड़ा सब आगि पजारि देने छी

खुशीक मैडल सिनेहक ओलम्पिकमे कमे भेटय
इएह कारण अपन नस-नस दुखसँ गछारि देने छी

हमर लिखल गीत हमरे काटैत रहैत अछि मीता
अपनहि घरमे अपन जीवनकेँ दुतकारि देने छी

अहाँक नैनक नशा बड बेहोश कऽ राखि देने अछि
अहाँ तँ पाथर हियाकेँ पलमे चुचकारि देने छी

1212-2122-2211-2122-2

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

गजल

अहाँ गोर हम कारी छी
मुदा एक टा प्राणी छी

सजत रूप नै हमरा बिनु
अहाँ देह हम सारी छी

रहब नै अलग कखनो जुनि
अहाँ ठोर हम लाली छी

चलत साँस नै एको छन
अहाँ माँछ हम पानी छी

कहू आर की यौ कुन्दन
अहाँ फूल हम माली छी

मात्राक्रम : 1221-2222

© कुन्दन कुमार कर्ण

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

गजल

करै छी अहाँ पर विश्वास हे मैया
कऽ दिअ ने हमर पूरा आश हे मैया

चढायब चरणपर अड़हूल नित ललका
करब हम अहीँकेँ उपवास हे मैया

हरू कष्ट जग जननी पूत बुझि हमरा
करू दर्द मोनक सभ नाश हे मैया

जियब एहि जगमे ककरा भरोसे हम
शरणमे त अप्पन दिअ बास हे मैया

रहब भक्तिमे डूबल राति दिन कुन्दन
रहत साँसमे जा धरि साँस हे मैया

मात्राक्रम : 122-122-221-222

© कुन्दन कुमार कर्ण

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

गजल

भक्ति गजल

जय दुर्गा जय काली जय भगवति जय जय
अबियौ हाली हाली जय भगवति जय जय

अड़हूलक कोंढ़ी लेने जगता भगता
मालिन संगे माली जय भगवति जय जय

सोभै लहठी नथिया टीका सेनूर
तैपर बड़का बाली जय भगवति जय जय

रुनझुन बाजल पायल हुनकर साँझहिमे
पसरल भोरक लाली  जय भगवति जय जय

खनमे ब्रम्हाणी रुद्राणी  खनमे
संहारी कंकाली जय भगवति जय जय

सभ पाँतिमे 222+222+222+22 मात्राक्रम अछि

तेसर शेरक अंतिम अक्षरकेँ संस्कृत छंद शास्त्रानुसार दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
चारिम शेरमे लयक दृष्टिसँ आर मेहनति चाही
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 29 सितंबर 2014

गजल

दुख अपने लग राखै छी
सुख सभमे हम बाँटै छी

सभकेँ बुझि अप्पन सदिखन
हँसि-हँसि जिनगी काटै छी

पापसँ रहि अलगे बलगे
धर्मक गीतल गाबै छी

मैथिल छी सज्जन छी हम
मिठगर बोली बाजै छी

कुन्दन सन गुण अछि हमरा
मिथिलाकेँ चमकाबै छी

मात्राक्रम : 2222-222

© कुन्दन कुमार कर्ण

रविवार, 28 सितंबर 2014

गजल


एम्हर नोरक टघार आँगनमे
ओम्हर सुखके पथार आँगनमे

ई तोहर ई हमर रहत बुझि ले
भेलै एहन विचार आँगनमे

की लेबै आ कतेक लेबै दाइ
देखू पसरल बजार आँगनमे

नगदी भेलै जखन कने बेसी
दौगल एलै उधार आँगनमे

सगरो दुनियाँसँ बचि कऽ एलहुँ हम
लागल कसगर लथार आँगनमे

सभ पाँतिमे 22+2212+1222 मात्राक्रम अछि

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

गजल

बीतल दिन जखन मोन पडै छै
आँखिसँ बस तखन नोर झरै छै

छोडब नै कहै संग अहाँकेँ
लग नै आउ से आब कहै छै

ओकर देलहा चोटसँ छाती
एखन धरि हमर दर्द करै छै

जिनगीमे लगा गेल पसाही
धधरामे हिया कानि जरै छै

के बूझत दुखक बात हियाकेँ
कुन्दन आब कोना कँ रहै छै

मात्राक्रम : 222-1221-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

शनिवार, 20 सितंबर 2014

गजल

ने बेटा ने पोता ने बेटी बुढ़ौतीमे
देखै छी खाली उकटा पैंची बुढ़ौतीमे

लोटा लाठी टूटल दरबज्जा चुनौटी आ
करिया कुक्कुर संगे छै दोस्ती बुढ़ौतीमे

डबरा डुबरी पोखरि झाँखरि खेत गाछी संग
चलि गेलै हम्मर सोहक पौती बुढ़ौतीमे

घुरि घुरि एना हमरा देखैए समाजक लोक
जेना फेरो हेतै घटकैती बुढ़ौतीमे

की खेबाके इच्छा अछि से कहि दिऔ झटपट
झड़कल सन संतानक अपनैती बुढ़ौतीमे


सभ पाँतिमे 222+222+222+1222 मात्राक्रम अछि
तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 15 सितंबर 2014

अपने एना अपने मूँह-29

मास अगस्त-२०१४मे अनचिन्हार आखरपर कुल १३ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--

कुन्दन कुमार कर्णजीक ३टा पोस्टमे २टा गजल आ एकटा हुनक अपने स्वरमे गाएल गजलक विडीयो अछि।
जगदानंद झा मनुजीक २टा पोस्टमे १टा गजल आ १टा भक्ति गजल अछि
अमित मिश्र आ रामकुमार मिश्रजीक १-१टा पोस्टमे १-१टा गजल अछि
गजेन्द्र ठाकुरजीक १टा पोस्टमे विदेह भाषा सम्मान संबंधी विवरण अछि।
आशीष अनचिन्हारक कुल ५टा पोस्टमे ३टा गजल, १टा भक्ति गजल आ १टा अपने एना अपने मूँह अछि

शनिवार, 13 सितंबर 2014

गजल

गजल - 11

सहसह लोकक भीड़ देखल हम
सुच्चा लोकक लेल बेकल हम​

कटुता क्रोधक उमर बढ़लै टा
नेहक देखल लाश जेकल हम​

माहुर मीझर गप्प गीजै छथि
माहुर गप्पक टीस सेकल हम

बलगर शोणित पीबि मोटेलै
अबला श्राद्धक पात फेकल हम

जीयब निकहा दिनक आशामें
आशक सिम्मर फ़ूल सेबल हम​

सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222-21-222

© राम कुमार मिश्र

गजल

"ग"सँ गंगा "ग"सँ गजल छै
आखर आखर विमल छै

"ग"सँ गीता "ग"सँ गजल छै
वेदक संगे रचल छै

"ग"सँ गाए "ग"सँ गजल छै
पाथर पाथर महल छै

"ग"सँ गायत्री रटल हम
अनका धरिकेँ बुझल छै

"ग"सँ गामा संग गाँधी
दुष्टक गर्वो टुटल छै

सभ पाँतिमे 2222+122 मात्राक्रम अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

गजल

बाल गजल


पढबै लिखबै चलबै नीक बाटसँ
आगू बढबै अपने ठोस आंटसँ

संस्कृति अप्पन कहियो छोडब नै
अलगे रहबै कूसंगत कऽ लाटसँ

फुलिते रहबै सदिखन फूल बनि नित
डेरेबै नै कोनो चोख कांटसँ

हिम्मत जिनगीमे हेतैक नै कम
चलबै आगू बाधा केर टाटसँ

बच्चा बुझि मानू कमजोर नै यौ
चमकेबै मिथिलाकेँ नाम ठाटसँ

मात्राक्रम: 2222-2221-22

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

गजल-2.28

अपनेक इतिहास लेल हम खतरनाक छी
अपनेक कथनसँ तँ हम अधसिझल सन पाक छी

कविता पढ़ू वा पढ़ू भजन गजल शायरी
आखरक मंथनसँ निकलि चुकल कटु वाक छी

निज चेतना जागले रहल चरम नीन धरि
जेतै कखन खेल पलटि बड खतरनाक छी

हमरा-अहाँमे प्रियतम फरक एतेक अछि
सुन्दर विदा छी अहाँ तँ हम हाक-डाक छी

ई जग दुखक सिन्धु अछि भरल अमित आगि धरि
चलि आउ सखि जीबि लिअ जँ नीक तैराक छी

2212-2121-212-212
अमित मिश्र

सोमवार, 1 सितंबर 2014

गजल

गहूमो नै भेलै धानक पछाति
उदासल खेतो खरिहानक पछाति

गबैए माए समदाउन उदासी
बहुत कानै सेनुरदानक पछाति

अकासक कोना कोना टेबि हम
पहुँचबै सूरज धरि चानक पछाति

बचा रखिहें कनियों अमरित गे बहिना
नै देतौ बेटा विषपानक पछाति

बिसरि जेबै जकरा तकरा तँ हम

इयादो करबै शमसानक पछाति

सभ पाँतिमे 1222+2222+12 मात्राक्रम अछि।
मतला सहित आन पाँति सभक अंतमे एकटा अतिरिक्त लघु लेबाक छूट लेल गेल अछि

शनिवार, 30 अगस्त 2014

गजल

गजल- 2.26
हम बाढ़िक मारल-झमारल छी
परजातंत्रक सुखसँ बारल छी

जुनि कोड़ब सखि भावना कहियो
स्मृतिमे पुरना लाश गाड़ल छी

ई जग हारय आबि हमरा लऽग
अपने मोनक तर्कसँ हारल छी

किछु नै हमरा लऽग किओ बाजय
सत्यवादक अवगुणसँ छारल छी

हम नै छी कवि ने गजल वक्ता
बस शब्दक धधरा पजारल छी

2222-2122-2

अमित मिश्र

Dard Monak Ahake Kahab Ham Kona

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

गजल


नै अहाँ केर बिसरी नाम हे भगवन
होइ कखनो अहाँ नै बाम हे भगवन

सुख कि भेटे  दुखे जीवनक रस्तापर
संगमे रहथि सदिखन राम हे भगवन

हम बनेलौं सिया मंदिर अपन मनकेँ
आब कतए अहाँकेँ ठाम  हे भगवन

आन नै आश कोनो बचल जीवनकेँ
अपन दर्शनकटा दिअ दाम हे भगवन

‘मनु’ अहाँकेँ करैए जोड़ि कल विनती
तोड़ि फेरसँ तँ अबियौ खाम हे भगवन

(बहरे मुशाकिल, मात्रा कर्म – २१२२-१२२२-१२२२)

© जगदानन्द झा ‘मनु’

गजल



ओम्हर लव जेहाद छलै
एम्हर लव संवाद छलै

बिहुँसल ठोर हमर तोहर
आ पसरल उन्माद छलै

गड़िए गेलै अनचोक्कहि
काँटे सन तँ इयाद छलै

पसरल जे सौंसे दुनियाँ
छोट्टे सनक फसाद छलै

खुब्बे बढ़लै प्रेम हमर
हुनकर नेहक खाद छलै

सभ पाँतिमे 22+22+22+2 मात्राक्रम अछि।
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

गजल



तुलसी चौरा के सीत हम
शंकर गौरा के गीत हम

भ्रष्टाचारक छै लागि भागि
अफसर दौरा के जीत हम

माखन मिसरी लेलहुँ अहाँ
कुक्कुर कौरा के हीत हम

चौपेतल नूआ बियहुती
सैंतल मौरा के प्रीत हम

ई बंसी छै हमरे मुदा
पोठी सौरा के मीत हम

सभ पाँतिमे 2222+2212 मात्राक्रम अछि।

दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि।

मौरा = मौर

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 24 अगस्त 2014

विदेह भाषा सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)

विदेह भाषा सम्मान
(समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)
२०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह)
२०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास)
२०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह)
२०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

गजल

वेदरदी नै बुझलक हमरो जखन
जीबू कोना जीवन झहरल तखन

घर घर अछि रावण रामक भेषमे
कतए रहती आजुक सीता अखन

दुश्मन बनि गेलै भाइक भाइ अछि
टाकामे भसिएलै कतए लखन

सुखि गेलै ममता मायक कोइखक
भदबरिया पोखरि सन भेलै भखन  

सगरो पसरल ‘मनु’ सहसह दू मुँहा
काइट नै लेए के कतए कखन     

(मात्रा क्रम – २२२-२२२-२२१२)
सुझाब आ मार्गदर्शन सादर आमंत्रित अछि        

©जगदानन्द झा ‘मनु’

सोमवार, 18 अगस्त 2014

गजल

भक्ति गजल

वसुदेवक भागसँ एलथि कन्हैया
जसुदाकेँ जागसँ एलथि कन्हैया

जै ठामक लोके छल राक्षस सनकेँ
तै ठाँ बचि नागसँ एलथि कन्हैया

गाए गोपी बँसुरी बिरदाबन आ
राधाकेँ तागसँ एलथि कन्हैया

टूटल आसक डोरी सभहँक तखने
कनियें उपरागसँ एलथि कन्हैया

वेदक नामे उपनिषदक बाटे आ
गीता बैरागसँ एलथि कन्हैया

सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि।
दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।

ओना मैथिलीमे भक्ति गजल तँ बड़ दिनसँ अछि मुदा नामाकरण जगदानंद झा मनुक कएल छनि। ई भक्ति गजल हुनके लेल। 

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।



रविवार, 10 अगस्त 2014

गजल



भोरक काग बनि कऽ कुचरल छी हम
हुनकर ठोरपर तँ बिहुँसल छी हम

ओ छथि ठाढ़ गाछ सन आँगनमे
लत्ती फत्ती सन तँ पसरल छी हम

ई जे देखलहुँ पिआसक रेघा
कनियें रुकि कऽ खूब बरसल छी हम

भिन्ने भिन्न मत मतांतर जय हो
टूटल हड्डी सन तँ छिटकल छी हम

असगर देखि आउ नै हमरा लग
अनचिन्हार लेल निहुँछल छी हम

सभ पाँतिमे 2221+2122+22मात्राक्रम अछि।
दोसर आ चारिम शेरक दोसर पाँतिमे दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि।



शनिवार, 9 अगस्त 2014

गजल

अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ
शोणित केर नोर कना देलक ओ

हमरा बिनु रहल कखनो नै कहियो
देखू आइ लगसँ भगा देलक ओ

सपना जे सजैत रहै जिनगीकेँ
सभटा पानिमे कऽ बहा देलक ओ

हम बुझलौं गुलाब जँका जकरा नित
से हमरे बताह बना देलक ओ

भेटल नै इलाज कतौ कुन्दनकेँ
एहन पैघ दर्द जगा देलक ओ

मात्राक्रम: 2221-21-12222

© कुन्दन कुमार कर्ण

सोमवार, 4 अगस्त 2014

अपने एना अपने मूँह-28



मास जुलाइ २०१४मे अनचिन्हार आखरपर कुल १३टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---

राम कुमार मिश्रजीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
कुंदन कुमार कर्णजीक २टा पोस्टमे १टा गजल आ १टा हजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक कुल ९टा पोस्टमे ५टा गजल, १टा बाल गजल, २ टा आलोचना, १टा अपने एना अपने मूँह।

गजल

गजल - 10

खेती अगता  आइ   बुझलियै
करमक झटहा आइ बुझलियै

असगर जिनगी मगन रही धरि
लोकक खगता आइ बुझलियै

अनकर तीमन नीक लगै छल​
बारिक पटुआ आइ बुझलियै

बापक टाका खूब उरेलहुँ
अप्पन बटुआ आइ बुझलियै

शहरी जिनगी मिट्ठ लगै छल​
गामक कुटिया आइ बुझलियै

सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222 21 122

© राम कुमार मिश्र

गजल

देह जखने पुरान बनल यौ
स्थान तखने दलान बनल यौ

आङ घटलै उमेर जँ बढलै
देश दुनियाँ विरान बनल यौ

सोह सुरता रहल कखनो नै
आब नाजुक परान बनल यौ

अस्त होइत सुरूज जकाँ बुझि
राज सेहो अकान बनल यौ

रीत छी याह जीवनकेँ सत
सोचि कुन्दन हरान बनल यौ

मात्राक्रम: 2122-121-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

बुधवार, 30 जुलाई 2014

गजल

सगरो सुनलहुँ ठोरे ठोर हो रामा
एलै महँगी भोरे भोरे हो रामा

सरकारक संगे हमरा लगैए जे
भगवानो छै चोरे चोर हो रामा

हँसि रहलै बइमानक संग दल बदलू
भलै जनता नोरे नोर हो रामा

चुनि चुनि खेलक माउस आब जनता लेल
बचलै खाली झोरे झोर हो रामा

अठपहरा छै मजदूरक मुदा तैयो
हमरे टूटै पोरे पोर हो रामा


सभ पाँतिमे 222+2222+1222 मात्राक्रम अछि।

चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि। 

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

गजल

कागजपर विकास लिखल छै
बस औंठा निशान बचल छै

एबे करतै कहियो ने कहियो
आसेपर अकास टिकल छै

हेतै बाँट फाँट आ बखरा
भैयारी तँ खूब जुटल छै

भुज्जा सन बनल छै ई सपना
फूटल खा कऽ काँच छुटल छै

ओ जे खून छै से तँ ऐठाँ
नोरे सन निकलि कऽ खसल छै

सभ पाँतिमे 2221+21122 मात्रकाक्रम अछि।
दोसर, तेसर, चारिम आ पाँचम शेरमे शब्दक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 27 जुलाई 2014

चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी

अपन समीक्षाक श्रृंखला लेल आइ हम रमेश कृत कथित गजल संग्रह " नागफेनी " अनने छी। चूँकि ऐ संग्रहक सभ गजल बेबहर अछि तँए ऐ गजल सभपर हमर कोनो टिप्पणी नै रहत। कारण सभ समीक्षामे वएह तर्क, वएह घोंघाउज बेर-बेर आएत। एक बेर फेर हम कही जे हमर समीक्षा वा आलोचना-समालोचनाक अधार सदिखन व्याकरण रहैत अछि कारण हरेक लेखक रचनामे भाव (भावना) तँ रहिते छै संगे-संग सभ लेखक भावना अलग-अलग होइत छै तँए हम भावक अधारकेँ स्थायी नै मानै छी।
ऐ पोथीमे लेखकक छोड़ि शिवशंकर श्रीनिवासजी भूमिका अछि मने कुल दू टा भूमिका। आ हम अपन समीक्षा लेल इएह दूनू भूमिकाकेँ चुनलहुँ अछि। एही दूनू भूमिकाक अधारपर हम तात्कालीन गजल आ ओकर रचियताक मनोवृतिकेँ उजागर करबाक प्रयास केलहुँ अछि। पहिने शिवशंकरजीक भूमिका अछि तकर बाद शाइरक मुदा हम पहिने शाइरक भूमिकाकेँ विवेचित करब तकर बादें शिवशंकरजीक भूमिकापर आएब। शाइरक भूमिकामे कुल 13टा बिंदु अछि ऐमेसँ मात्र हम पहिल,दोसर, चारिम आ पाँचम बिंदुकेँ विवेचित करब। बाद बाँकी बिंदु सभ हुनक व्यक्तिगत छनि।
बिंदु-1) "गजलक ई कृति ओहि समालोचक लोकनिकेँ समर्पित छनि, जिनका लोकनिक घोंकचि जाइत छनि नाक, गजलक नामें सुनि।“
ऐ पहिल बिंदुसँ ई नीक जकाँ बुझाइत अछि जे रमेशजी सेहो आलोचक सभकेँ बिना मापदंड देने बिना आलोचनाक उम्मेद केने छथि। मुदा हमर स्पष्ट मानब अछि जे ओइ समयक आलोचक सभ गजलक आलोचना नै कऽ कऽ गजलपर बड़का उपकार केने छथि कारण ओहि समयक 99 प्रतिशत गजल अयोग्य छल आ अछि एवं बचल 1 प्रतिशत गजल विजयनाथ झा  ओ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक अछि जिनका ई सभ गजलकार मानिते नै छथि।
बिंदु-2) "गजलक स्थापना हेतु ओकरा पक्षमे  तर्ककेँ ओतबे मथल गेल जतबा ओकरा विपक्षमे कुतर्ककेँ। तँए आब हम कए टा तथ्यकेँ नहिं दोहराबए-तेहराबए चाहैत छी जे गजल आब ओ नहिं अछि जे अपन शास्त्रीय रूपमे छल, एकरामे नवकविता बला क्लिष्टता, दुरूहता आ अ-संप्रषेणीयता आदि नकारात्मक नहि छैक, एकरामे भाव आ अभिव्यक्ति दुनू आसान आ सकारत्मक छैक, आधुनिकताक कोनो कमी नहि छैक, आब ई माशूकाक आँचर नहि अछि आ ने शाकी. शराब, जाम आदिक बंधनमे जकड़ल अछि, ई नवकविता आ पुरान कविताक बीचक रस्ता थिक, एकरा गेयधर्मिताक पैमानापर नापब पुरान कट्टरता थिक,एकर शास्त्रीय चरित्रकेँ दँतिया कऽ एकर आलोचना करब मात्र गेंग रोपब थिक, दुष्यंत कुमार, फैजसँ लऽ कऽ अदम गोंडवी धरि जे एकर नव कलेवर तरासलनि तकरा स्वीकार करबाक आब कोनो टा अधारे नहिं छेक, आदि-आदि----------|”
ऐ दोसर बिंदुसँ ई गप्प स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे आने आन कथित प्रगतिशील गजलकार जकाँ रमेशजी सेहो गजलक संबंधमे भ्रमित छथि।  ऐ बिंदुमे सभसँ आपत्तिजनक गप्प दुष्यंत कुमार, फैज अहमद फैज ओ अदम गोंडवीक संबंधमे अछि। ई तीनू गजलकार पूर्ण रूपेण शास्त्रीय गजल लिखने छथि खाली ओ सभ विषय वस्तुकेँ परिवर्तन कऽ देलखिन्ह व्याकरण ओहिना के ओहिना रहलै। मुदा मैथिलीक ई कथित प्रगतिशील सभ बिना बुझने-सुझने हिका सभकेँ प्रसंगमे आनि दै छथि जे की हिनकर सभहँक ज्ञानक सीमाकेँ देखार करैत अछि। ऐ ठाम हम किछु गजलकारक तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी जे कोना हिनकर सभहँक गजल व्याकरण ओ बहरमे अछि---
पहिने कबीर दासक एकट गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी--
बहर—ए—हजज केर ई गजल जकर लयखंड (अर्कान) (1222×4) अछि--
ह1 मन2 हैं2 इश्2, क़1 मस्2ता2ना2, ह1 मन2 को 2 हो 2, शि1 या2 री2 क्या2
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?


तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू--
बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है

यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे
यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है

नकाब उलटे हुए जब भी चमन से वह गुज़रता है
समझ कर फ़ूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है

मुनव्वर राना (घर अकेला हो गया, पृष्ठ - 37)
तक्तीअ
बहुत पानी / बरसता है / तो मिट्टी बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
न रोया कर / बहुत रोने / से छाती बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
यही मौसम / था जब नंगे / बदन छत पर / टहलते थे
1222 / 1222 / 1222 / 1222
यही मौसम / है अब सीने / में सर्दी बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
नकाब उलटे / हुए जब भी / चमन से वह / गुज़रता है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
(नकाब उलटे के अलिफ़ वस्ल द्वारा न/का/बुल/टे 1222 मानल गेल अछि)
समझ कर फ़ू / ल उसके लब / पे तितली बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
आब राहत इन्दौरी जीक ऐ गजलकेँ देखू--
ग़ज़ल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज की मुज़ाहिफ सूरत)
चरागों को उछाला जा रहा है
हवा पर रौब डाला जा रहा है

न हार अपनी न अपनी जीत होगी
मगर सिक्का उछाला जा रहा है

जनाजे पर मेरे लिख देना यारों
मुहब्बत करने वाला जा रहा है
राहत इन्दौरी (चाँद पागल है, पृष्ठ - 2४)
तक्तीअ =
चरागों को / उछाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122
हवा पर रौ / ब डाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122

न हार अपनी / न अपनी जी / त होगी
1222 / 1222 / 122
(हार अपनी को अलिफ़ वस्ल द्वारा हा/रप/नी 222 गिना गया है)
मगर सिक्का / उछाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122
जनाजे पर / मेरे लिख दे / ना यारों
1222 / 1222 / 122
मुहब्बत कर / ने वाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122

फेरसँ मुनव्वर रानाजीक एकटा आर गजलकेँ देखू--
हमारी ज़िंदगी का इस तरह हर साल कटता है
कभी गाड़ी पलटती है कभी तिरपाल कटता है

सियासी वार भी तलवार से कुछ कम नहीं होता
कभी कश्मीर कटता है कभी बंगाल कटता है
(मुनव्वर राना)
1222 / 1222 / 1222 / 1222
(मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन)
हमारी ज़िं / दगी का इस / तरह हर सा / ल कटता है
कभी गाड़ी / पलटती है / कभी तिरपा / ल कटता है

सियासी वा/ र भी तलवा/ र से कुछ कम / नहीं होता
कभी कश्मी/ र कटता है / कभी बंगा / ल कटता है
आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू--
2122 / 2122 / 2122 / 212
हो गई है / पीर पर्वत /-सी पिघलनी / चाहिए,
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए।
आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी--

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू—
1222 / 1222 / 1222 / 1222
ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में
मुसल्‍सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में

आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी--

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्‍सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्‍बी क़तारों में

अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्‍मे के सिवा क्‍या है फ़लक़ के चाँद-तारों में

र‍हे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तज़रबे से
बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में

कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्‍तहारों में.

फेर गोंडवीजीक दोसर गजल लिअ—
2122 / 2122 / 2122 / 212
भूख के एह / सास को शे / रो-सुख़न तक /ले चलो
या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो
आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी--

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जल्‍वों से वाक़िफ़ हो गयी
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्‍त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगा जल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है
तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो.

ऐ गजल सभमे छंदानुसार छूट सेहो लेल गेल छै मुदा रमेशजीक वा अन्य कोनो मैथिली गजलकार जे भ्रमवश कहै छथि जे उर्दू-हिंदीक गजलमे बहर नै छै से हुनक बेसी ज्ञानक (??????????) परिचायक अछि। चाहितों हम फैज अहमद फैज केर गजलक तक्ती नै देखा रहल छी कारण समझदार आदमी कम्मे तथ्यसँ बेसी बात बूझै छथि।

एहि शाइरक सभहँक अतिरिक्त हम निराला आ जयशंकर प्रसाद जीक गजल सेहो देखा रहल छी..........

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है

मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि--2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरे रमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। मौलाना हसरत मोहानीक गजल “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है” अही बहरमे छै जकर विवरण आगू देल जाएत। ऐठाँ ई देखू जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै। बाँचल शेर एना छै--

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये,
हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है

तरस है ये देर से आँखे गड़ी शृंगार में,
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली,
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है

ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें,
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है

जयशंकर प्रसाद

सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं
बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं

उन्हें अवकाश ही इतना कहां है मुझसे मिलने का
किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं

जो ऊंचे चढ़ के चलते हैं वे नीचे देखते हरदम
प्रफ्फुलित वृक्ष की यह भूमि कुसुमगार करते हैं

न इतना फूलिए तरुवर सुफल कोरी कली लेकर
बिना मकरंद के मधुकर नहीं गुंजार करते हैं

'प्रसाद' उनको न भूलो तुम तुम्हारा जो भी प्रेमी हो
न सज्जन छोड़ते उसको जिसे स्वीकार करते हैं


बिंदु-4) मुदा शास्त्रीयतासँ दूर भैयो कऽ गजलत्व आ गजलजन्य अनुशासन समान्यतः गजलमे कायम रहय से प्रायः जरूरी छै। फैशनपर उकड़-गजल लीखि गजलक इतिहासमे नाम घोंसियायब एकटा कुत्सित प्रयास थिक, एहन लोक नवकविते अथवा आने कोनो विधामे डंड-बैसकी करथि से प्रायः उचित। किछु तुकबंदी मिला कऽ लीखि लेब गजलक संग अ-चेतनमे कयल गेल बलात्कार थिक। एहन लोक ओना सभ विधामे थोड़ेक दिन कुथैत छथि आ पुनः अपने आप साहित्यसँ पोछा जाइत छथि। तँए एहन गजलकारक कोनो तेहन चिन्ता आलोचक नहि करथि।“
ऐ चारिम बिंदुमे रमेशजी अपन भ्रमक सीमापर पहुँचि गेल छथि।
बंधु गजलजन्य  अनुशासने के तँ गजलक शास्त्रीय रूप वा गजलक व्याकरण कहल जाइत छै। ऐ बिंदुक हिसाबें देखल जाए तँ रमेशजी अपने फैशनक नामपर गजल लिखला आ गजलक संग बलात्कार केलथि।
बिंदु-5) "गजलमे निहित सौंदर्य-बोधकेँ चीन्हब आवश्यक छैक।“
ई पाँचम बिंदु पूरा-पूरी गलत आ भ्रमयुक्त अछि। रमेशजीक हिसाबसँ "सौंदर्य-बोधकेँ चीन्हब आवश्यक छैक" मुदा हमर कहब जे जखन एकबेर "सौंदर्य-बोध" भइये गेलै तखन फेरसँ चिन्हबाक बेगरता की? सही कथन एना हेतै---“गजलमे निहित सौंदर्यकेँ चीन्हब आवश्यक छैक।“ ओनहुतो ई वाक्य हिंदीक नकल अछि।  आब बहुतों भक्त लोकनि एकरा प्रेसक गड़बड़ी कहता......................
कुल मिला कऽ देखल जाए तँ रमेशजी अपने गजलक संबंधमे ततेक ने भ्रमित छथि जे वास्तवमे ई पोथी "नागफेनी" बनि गेल अछि आ वास्तविक गजलकेँ लहुलुहान केने अछि।
शिवशंकरजीक आलेख अपेक्षाकृत नीक अछि ( ओहि समयक अन्य आलेखक मुकाबले) मुदा शिवशंकरोजी बहुत रास तथ्यपर भ्रमित छथि। प्रथमतः ओहो आन कथित प्रगतिशील गजलकार जकाँ गजलकेँ दरबारी मानै छथि जखन की गजलमे प्रयुक्त शराब, माशूक, हुस्न, इश्क आदिक परलौकिक अर्थ सेहो होइत छै आ सभ शाइर ऐ शब्द सभकेँ प्रतीकक रूपमे प्रयोग करै छथि।
दोसर जे श्रीनिवासजी कहै छथि----"गजलक अपन अनुशासन छैक, बंदिश आ सीमा छैक। ओकरा रखैत रमेशजी गजल कहबामे सफल भेला हे जे हिनक विशेषता आ सफलता दुनू थिक"......... मुदा गजलक अनुशासन की छै आ बंदिश की छै तकर जानकारी श्रीनिवासजी पाठककेँ नै दऽ रहल छथि आ ने रमेशजीक गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ कहि रहल छथि जे ऐ कारणें रमेश जीक गजलमे अनुशासन अछि।
कुल मिला कऽ ई दुन्नू आलेख भ्रमयुक्त अछि आ मैथिली गजलक वास्तविक साक्ष्यसँ बहुत दूर अछि।
ओना हमरा ई मानबामे कोनो दुविधा नै जे ऐ संग्रहक सभ रचना नीक तुकांत कविता अछि ( उपरमे साबित भऽ चुकल अछि जे ई सभ गजल नै थिक )। खास कऽ ओहि समय आन गजलकार ( तारानंद वियोगी, देवशंकर नवीन,) आदिक अपेक्षा अपन रचनामे बेसी मैथिली शब्दक प्रयोग केलह अछि जे की ऐ पोथी विशेषता अछि ऐ विशेषता दिस शिवशंकरजी इशारा सेहो केने छथि। तँ चली ऐ संग्रहक किछु रचना दिस जे की हम पाँतिक उदाहरण दऽ कऽ देखाएब--

नवम रचनाक ई पाँति  नीक अछि--

लाख लाख कोस सागर के अगम अगम जल
देख हेलवाक छौ तँ तुरंत जूटि जो

एगारहम रचनाक ई पाँति देखल जाए--
कियो केकरो पुछारि क' क' की करतै
सभ अपन-अपन दर्द के पिबैत अछि

जँ अप्रस्तुत योजना विधान देखबाक हो तँ सोलहम रचनापर आउ--

जामु आ गम्हारि केर छाह तर मे
बाँस केर कोपर सुखैल जा रहल

मानल जाइत अछि जे बाँसक छाहरि तर कोनो गाछ नमहर नै भ' सकैए कारण बाँसक प्रकृति गरम होइत छै मुदा रचनाकार एतऽ उन्टा गप्प कहि अप्रस्तुतकेँ प्रस्तुत केलाह अछि। सैतीसम रचनाक ई पाँति देखू-

की सोचय अइ देसक जनता
एक्कहि खिच्चड़ि एक्कहि हंडा

जँ 58 टा रचनामेसँ हमरा कोनो एकटा रचना चूनबाक जरूरति पड़त तँ हम 12हम रचनाकेँ ऐ संग्रहक श्रेष्ठ रचना कहब। तँ लिअ ऐ बारहम रचनाक टूटा पाँति--

सौंथ जए टा चाही तए टा छूबि लिअ
टीस मुदा ताजिन्दगी रहैत छै


तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों