Wednesday, 1 August 2012

गजल


गजल

घर उजारै बाला कहीं बेघर नै भ जाइ
हया राखि के रहू कहीं हेहर नै भ जाइ

उठैत धुआँ में निधोक अहाँ स्वांस लैत छी
आगि लागि कहीं छाउर सगर नै भ जाइ

दिनक इजोर में साधु बनि रहय बला
रातिक रूप में कहीं उजागर नै भ जाइ

मउल साजि माथ पर बौरल सभ गोट
प्रकृतिक निरसल तरुअर नै भ जाइ

सत बजबाक ककरो साहस नै रहल
चुप्प रहि देखैत कहीं पाथर नै भ जाइ

कखन धरि कात रहि बहलैब मोन के
कहीं मनुक्खक वर्ग सँ बाहर नै भ जाइ

राजीव चिकरि सब के कहय छै सगरो
सम्हरू आबहूँ कहीं निशाचर नै भ जाइ

सरल वार्णिक वर्ण -१६

राजीव रंजन मिश्र


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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों