Sunday, 19 August 2012

गजल

बाल गजल-६

बाबू गेलखिन्ह बटुआ खोंसने कॉपी अनला जा दोकान तक
अपना में कनफुस्की हेतै पेंसिम-रबर के ओरियान तक


वन टू हंड्रेड एकसँ सौ तक ए-बी-सी-डी संग-संगे ककहरा
तइ परसँ दऽ देलैथ पहाड़ा देखा लीखकऽ बीस कान तक


अदहा-छिदहा ए-बी-सी-डी गलतिये-सलती अ-आ लिखलहुं
उंटा-सुंटा गिनती लिखलों कहुना-कहुना आनि धियान तक
घसल मिटौना भऽ गेल खपटी छील कगजिया ठुंठ बनेलौं
तैयो आगू मोन पड़ल नञि पुड़ल पहाड़ा सात कान तक
भइया रउ कॉपी भरतै तऽ फाइड़ लेबय भरलाहा पन्ना
नाह बना कागतके खेलबै अंगना ओलतीसँ दलान तक
हमरासँ नञि जीत सकै छैं देखिहैन्ह तोरा हरा देबौ हम
हम जहाज बना कागतके फुर्र-दनि उड़ि जेबै चान तक


ऐसँ तऽ नेनपन छल नीमन "नवल" पैघ हम व्यर्थे भेलौं
आबतऽ सच्चो के जहाज नै पहुंचै नेनपन के उड़ान तक


*आखर-२३ (तिथि- ११.०७.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

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