भरि जनम सगरो करेजा टुटिते रहल
मोनकेँ कोना हमर सभ कुटिते रहल
जेकरा हम सोपलौं तन मन धन अपन
देहकेँ ओ हँसि क सदिखन लुटिते रहल
छल लिखल भागक हमर केहन देखियौ
मोन ई जुल्मी अछैते घुटिते रहल
पीठ पाछू सभ कियो रेतै कंठ छै
एक दोसर केर नाता छुटिते रहल
‘मनु’ सिनेहक नव कलश कतबो जोड़लौं
काँच बासन सन भहरि ई फुटिते रहल
(बहरे जदीद, मात्राक्रम 2122-2122-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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