सोमवार, 23 अप्रैल 2012

गजल

भरि जनम सगरो करेजा टुटिते रहल

मोनकेँ कोना हमर सभ कुटिते रहल

 

जेकरा हम सोपलौं तन मन धन अपन

देहकेँ ओ हँसि क सदिखन लुटिते रहल

 

छल लिखल भागक हमर केहन देखियौ

मोन ई जुल्मी अछैते घुटिते रहल

 

पीठ पाछू सभ कियो रेतै कंठ छै

एक दोसर केर नाता छुटिते रहल

 

‘मनु’ सिनेहक नव कलश कतबो जोड़लौं

काँच बासन सन भहरि ई फुटिते रहल

 

(बहरे जदीद, मात्राक्रम  2122-2122-2212)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’ 


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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों