Tuesday, 10 July 2012

गजल

वेदरदिया नहि दरदिया जानै हमर
टाकासँ जुल्मी प्रेमकेँ गानै हमर

सदिखन जरैए मन विरहकेँ आगिमे
तैयो पिया नहि किछु दरद मानै हमर

साउन बितल घुरियो कs नै एला पिया
नहि खीच हुनका प्रेम लग  आनै हमर   

बरखा खुबे बरिसय तँ  गरजय बदरबा
छतिया दगध भेलै हिया कानै हमर

बसला पिया 'मनु' दूर बड परदेशमे
झरकल हिया कनिको तँ  नहि मानै हमर

(बहरे रजज, मात्रा क्रम - २२१२ तीन-तीन बेर सभ पाँतिमे)

@ जगदानन्द झा ‘मनु’

2 comments:

  1. कमाल का लिखते हैं आप।
    बड नीक लागल।

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  2. सादर धन्यवाद मनोज जी, जे अपने केँ हमर गजल नीक लागल

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों