एखनो कोना क छी नहि जनेलौं हम
छोरि नेहक आन नहि धन कमेलौं हम
मोन खोखरलक हमर जे दुनू हाथे
ओकरो हँसि-हँसि क संगी बनेलौं हम
फूल सगरो छोरि काँटे किए बिछलौं
ई करेजा जानि कोना लगेलौं हम
मान राखब लेल मुँहपर हँसी अनलौं
ओ तँ बुझलनि धर्म अप्पन गमेलौं हम
टूटलै सगरो करेजा जखन ‘मनु’केँ
कहि गजल ताड़ी मगन भय चढ़ेलौं हम
(बहरे कलीब, मात्राक्रम 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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